मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के मिसिंग लिंक पर हुए भूस्खलन के बाद कई घंटों तक यातायात बाधित रहा। भूस्खलन के कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें बड़े-बड़े पत्थर मिसिंग लिंक पर गिरते हुए दिखाई दे रहे थे। इसके चलते रास्ता पूरी तरह बंद हो गया था।
कड़ी मशक्कत के बाद रास्ते को दोबारा खोल दिया गया और अब ट्रैफिक सामान्य रूप से संचालित हो रहा है। लेकिन इन वायरल वीडियो के बाद लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। आखिर मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का यह मिसिंग लिंक क्या है? इसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके क्या फायदे हैं? इसकी लागत कितनी है?
इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए जनसत्ता ने आपके लिए एक मोशन इंफोग्राफिक तैयार किया है जिसमें आपको हर जानकारी आसान और सरल भाषा में मिलेगी।
- खंडाला घाट में कई हेयरपिन मोड़ और तीव्र ढलान
- भारी ट्रकों के कारण अक्सर लंबा ट्रैफिक जाम
- मानसून में चट्टानें गिरने और भूस्खलन का खतरा
- दुर्घटना संभावित क्षेत्र, कई दुर्घटनाएं हुईं
- छुट्टियों-वीकेंड पर कई घंटे वाहन फंसना
- मुंबई-पुणे के बीच दूरी लगभग 6 किमी कम हुई
- यात्रा का समय 20–30 मिनट तक घटा
- खंडाला घाट के खतरनाक हिस्से से गुजरना लगभग खत्म
- ट्रैफिक जाम में कमी आने लगी
- भारी वाहनों की आवाजाही अधिक सुगम हुई
इसे इंजीनियरिंग का चमत्कार क्यों माना गया?
13.3 किलोमीटर में फैले मिसिंग लिंक में 1.6 किलोमीटर और 8.9 किलोमीटर की दो जुड़वां सुरंगें, दो हाई-स्पीड वायडक्ट और टाइगर वैली के ऊपर बना 183 मीटर लंबा केबल-स्टे ब्रिज शामिल है जो इसे देश का अपनी तरह का सबसे ऊंचा पुल बनाता है। लोनावला झील के लगभग 180 मीटर नीचे खोदी गई 8.9 किलोमीटर लंबी मुख्य सुरंग जिसे ऑस्ट्रिया की नई सुरंग निर्माण पद्धति का उपयोग करके बनाया गया है, दुनिया की सबसे चौड़ी सड़क सुरंगों में से एक है।
इसमें इतना समय क्यों लगा?
इंजीनियरों को सह्याद्री पहाड़ियों से होकर अस्थायी मार्ग भी बनाने पड़े। इस क्षेत्र की तेज हवाओं, घने कोहरे और भारी मानसूनी बारिश का सामना करने के लिए डिज़ाइन की गई इस परियोजना को पूरा होने में लगभग तीन दशक लग गए। दुर्घटना-बहुल्य घाट खंड के विकल्प की आवश्यकता को सबसे पहले 1995 में आरआईटीईईएस द्वारा पहचाना गया था, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के निर्माण से भी पहले।
