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टीके का टोटा क्यों? जितना दिल्ली-मुंबई के सारे लोगों को चाहिए उतना विदेश भेज चुकी है सरकार, भारत से काफ़ी बेहतर हाल वाले देशों को भी भेजी वैक्सीन

क्या वैक्सीन सबके लिए खोल देनी चाहिए? यह सवाल पूछा गया था केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण से छह अप्रैल के दिन जब कोविड का ग्राफ सीधा, दीवाल की तरह ऊंचा खड़ा हो रहा था। अफसर का जवाब थाः हमारा मकसद यह नहीं कि जो भी मांगे उसे वैक्सीन लग जाए। हमारा मकसद को उन लोगों […]

Edited By अजय शुक्ला नई दिल्ली | May 9, 2021 10:31 AM
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के बाहर कोरोना टीका की पहली खुराक पाने के लिए इंतजार करते 18+ वाले लाभार्थी। (PTI Photo)

क्या वैक्सीन सबके लिए खोल देनी चाहिए? यह सवाल पूछा गया था केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण से छह अप्रैल के दिन जब कोविड का ग्राफ सीधा, दीवाल की तरह ऊंचा खड़ा हो रहा था। अफसर का जवाब थाः हमारा मकसद यह नहीं कि जो भी मांगे उसे वैक्सीन लग जाए। हमारा मकसद को उन लोगों को वैक्सीन लगाना है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

लेकिन, विदेश मंत्रालय का सोच तो इनसे भी कई कदम आगे का था क्योंकि केंद्र की वैक्सीन मैत्री कार्यक्रम में वैक्सीन देने के लिए न तो आवश्यकता का पैमाना रखा गया था और न ही जरूरत का। बीस जनवरी को शुरू की गई इस योजना को अंततः मार्च में निलंबित किया गया। लेकिन तब तक वैक्सीन के 6.6 करोड़ डोज़, ज्यादातर कोविशील्ड दुनिया के 93 देशों को दी जा चुकी थीं। 6.6 करोड़ डोज़ इतनी होती हैं कि इनसे पूरे देश में वैक्सीनेशन का कार्यक्रम 30 दिन तक चल सकता था। और, अगर केवल मुंबई और दिल्ली की बात की जाए तो 6.6 करोड़ डोज़ से दोनों शहरों की बालिग आबादी को डबल वैक्सीन लगाई जा सकती थी। इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि वैक्सीन पाने वाले 60 प्रतिशत देश वो हैं जहां संक्रमित लोगों और मरने वालों की संख्या भारत से कम थी।

भारत ने वैक्सीन के जरिए सद्भावना संदेश दिया था। दुनिया भर ने इसकी सराहना भी की थी। लेकिन आज जब कोरोना छाती पर सवार है और वैक्सीन की किल्लत है, सवाल तो उठता ही है कि हमें दोस्ती-यारी करने में कहीं जल्दबाज़ी तो नहीं कर दी। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अफसर का कहना है कि अपने लिए स्टॉक को पक्का किए बगैर दूसरे देशों को वैक्सीन देने की जल्दबाजी करने की कोई जरूरत नहीं थी। हालांकि यह वैक्सीन कारोबारी करार और अंतर्राष्ट्रीय वैक्सीन समझौते के तहत दी गई थीं लेकिन इसके बल्क में भेजने की जरूरत न थी क्योंकि पाने वाले ज्यादातर देशों की हालत भारत से बेहतर थी। अफसर के मुताबिक हम सप्लाइ का काम टुकड़े-टुकड़े में कर सकते थे। लेकिन हमने सोचा नहीं और फरवरी मे दिल्ली व मुंबई में दूसरी लहर जोर मारने लगी। 30 मार्च आते-आते देश में दैनिक संक्रमण संख्या 70 हजार हो चुकी थी। तब तक भारत उससे ज्यादा वैक्सीन एक्सपोर्ट कर चुका था जितनी उसने देश में लगाई थीं।

17 मार्च को विदेश मंत्री जयशंकर खुश होकर बता रहे थे कि भारत में ये जो मृतक दर कम और रिकवरी रेट ज्यादा है, यह प्रधानमंत्री के नेतृत्व का नतीजा है। उन्होंने वैक्सीन मैत्री कार्यक्रम को भी सराहा। इसी के दस दिन पहले स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन कह रहे थे कि अन्य देशों के विपरीत हमारे यहां वैक्सीन की अबाध सप्लाइ है। हमारा सौभाग्य है कि हमारे पास एक वैश्विक नेता है जिसने कहा कि वैक्सीन देने में शर्तें न लगाई जाएं।

बाद में देश चेता। एक्सपोर्ट घटाया गया। बहुत ज्यादा। 20 जनवरी तक 6.4 करोड़ वैक्सीन बाहर गई थीं। अप्रैल में यह संख्या 18 लाख रह गई।

भारत से वैक्सीन पाने वाले देशों के कोविड के तुलनात्मक आंकड़े इस प्रकार हैः

*93 में 88 देशों में आबादी को देखते हुए प्रति लाख व्यक्तियों में रोगियों की संख्या पिछले हफ्ते तक भारत से कम थी।

*30 अप्रैल को भारत में कुल रोगियों की संख्या 1.88 करोड़ थी। यानी एक लाख की आबादी में 1360 पॉजिटिव। इसके विपरीत 3.68 करोड़ वैक्सीन डोज़ पाने वाले पचास देश ऐसे हैं जहां प्रति लाख संक्रमण 500 या इससे भी कम था।

*30 अप्रैल तक 36.6 करोड़ डोज़ पाने वाले 46 देशों में मृत्यु दर भी भारत के 15.1 से आधा यानी 7.5 था।

जब विदेशों को वैक्सीन भेजनी शुरू किया गया था, भारत में भारत में प्रति लाख कोविड संक्रमण और मौतें क्रमशः 769 और 11 थी। उस वक्त भी वैक्सीन पाने वाले 64 देशों में यह दर भारत से कहीं अच्छी थी।

भेजी गई वैक्सीन में 3.6 करोड़ व्यापारिक तौर पर बेची गई। दो करोड़ विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोग्राम के तरह निम्न और मध्य आय देशों को दी गई। लगभग सारा एक्सपोर्ट, 99 प्रतिशत, कोविशील्ड का हुआ। एस्ट्राजेन्का के साथ करार के मुताबिक सीरम इंस्टीट्यूट को सौ करोड़ कोविशील्ड डोज़ एक्सपोर्ट करने हैं। इसमें 2021 के अंत तक सिर्फ 40 करोड़!

पता नहीं क्या जल्दी थी कि हमने अमीर मुल्कों को भी पीछे छोड़ दिया। उदाहरम के लिए भारत ने घाना को कोवैक्स कार्यक्रम के तहत 23 फरवरी को छह लाख डोज़ भेज दिए। फ्रांस यह काम 23 अप्रैल को कर पाया। डोज़ थे सिर्फ एक लाख, यानी भारत के भेजे माल का छठवां हिस्सा।

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