कोरोना की ‘सुनामी’ के बीच देश के सामने सांसों का संकट! जानें- ऑक्सीजन की सप्लाई में कहां आ रही समस्या?

पांच लीटर का ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर जो 45 से 50 हजार के बीच बिक रहा था, आज 80 से 90 हजार के बीच बेचा जा रहा हो। किराया भी 10 से 20 हजार हो गया है। दो माह पहले दाम थे पांच से दस हजार के बीच।

Author Translated By अजय शुक्ला मुंबई | April 25, 2021 1:12 PM
Coronavirus, Oxygen, India Newsदिल्ली से सटे यूपी के गाजियाबाद में इंदिरापुरम गुरुद्वारा में सिख संगठन द्वारा मुहैया कराई गई मुफ्त मेडिकल ऑक्सीजन पाती एक कोरोना वायरस संक्रमण की बुजुर्ग मरीज। (फोटोः पीटीआई)

भारत इस वक्त कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है। बढ़ते संक्रमण के मामलों के बीच जीवनदायिनी मेडिकल ऑक्सीजन आखिर कैसे इतनी कम पड़ गई कि उसके बिना सांसें टूटने लगीं? इसके पीछे एक लंबी कहानी है। आइए, समझते हैं।

फरवरी से शुरू हुई कोरोना की दूसरी लहर अब तक 35,000 लोगों को लील चुकी है। लेकिन, अपने यहां इस बात के आंकड़े नहीं हैं कि इनमें से कितनों की जान ऑक्सीजन के अभाव के कारण हुई। सरकार के मुताबिक भारत रोज 7,127 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता रखता है। पिछले दस दिन के भीतर देश में मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन की मांग में 76 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 12 अप्रैल को मांग 3,842 टन की थी, जो 22 अप्रैल को 6,785 टन हो गई। कागजी तौर तो अब भी कुछ गैस फालतू बच रही है। फिर, पूरे देश में कोहराम क्यों? ज्यादा दिन नहीं हुए पिछले साल कोविड संक्रमण से पहले देश में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की मांग 750 से 800 टन के बीच थी। ऑक्सीजन का बाकी खर्च औद्योगिक काम में होता था। 18 अप्रैल के बाद औद्योगिक ऑक्सीजन की सप्लाइ बुरी तरह प्रभावित है।

देश में ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाली कंपनियों में इनॉक्स एयर प्रोडक्ट, लिंडे इंडिया, गोयल एमजी गैसेज़, नेशनल ऑक्सीजन लिमिटेड और तइयो निप्पन सांसो कारपोरेशन। इनॉक्स के मुताबिक देश में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत का 60 प्रतिशत वही पूरा करते हैं। वह रोज 2,000 मीट्रिक टन गैस रोज तैयार करती है, जो 800 अस्पतालों को भेजी जाती है। कंपनी के पास 550 टैंकर-ट्रक और 600 ड्राइवर हैं, जो इधर कुछ दिनों से लगातार ट्रक चला रहे हैं। लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन बनाने की क्रायोजनिक प्रक्रिया में थोड़ा समय लगता है। कुछ लाख लीटर बनाने में ढाई दिन लग जाते हैं। बनने के बाद इसे अति-शीतल दैत्याकार टैंकरों में स्टोर किया जाता है। इन टैंकरों से इन्हें खास तौर पर बनाए गए ठंडे टैंकर ट्रकों में भरा जाता है। शून्य से 180 डिग्री कम तापमान वाले इन टैंकरों से ही गैस सैकड़ों किमी दूर स्थित विभिन्न डिस्ट्रीब्यूटरों के पास पहुंचाई जाती है। डिस्ट्रीब्यूटर लिक्विड ऑक्सीजन को गैस में बदलते हैं, उसे सिलिंडरों में भरते हैं और उन्हें अस्पतालों तक ले जाते हैं। डिस्ट्रीब्यूटर थोड़ा स्टॉक स्थानीय वेंडरों को बेचते हैं। यह गैस घर में रहने वाले मरीजों के लिए आगे फिर बेची जाती है। अफसरों का कहना है कि गैस को गंतव्य तक पहुंचाने में पांच से दस घंटे लग ही जाते हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में ऑक्सीजन के ट्रांसपोर्ट के लिए 1,172 क्रायोजेनिक (अति-शीतल रहने वाले) टैंकर हैं। कोविड संक्रमण से पहले टैंकरों की संख्या पर्याप्त थी। अब ये कम पड़ रहे हैं और इन्हें सैकड़ों किमी की यात्रा भी करनी पड़ रही है। सो, इस कमी के मद्देनजर नाइट्रोजन और आरगन जैसी गैसों को ढोने में काम आने वाले टैंकरों को को ऑक्सीजन ढोने लायक बनाया जा रहा है। नए टैंकर बनाए भी जा रहे हैं और आयात भी किए जा रहे हैं। इस काम में एयरफोर्स के मालवाही विमान भी लगाए गए हैं, जो खाली टैंकरों को फिलिंग प्वाइंट तक ले जाते हैं। इससे एक तरफ का समय बच जाता है क्योंकि भरे टैंकरों को सड़क मार्ग पर ही चलना होता है। इस काम में ट्रेनों का उपयोग भी हो रहा है।

इस हफ्ते दिल्ली, यूपी, हरियाणा और गुजरात ने शिकायत की है कि उनको दैनिक आवश्यकता से कम ऑक्सीजन आवंटित की जा रही है। राजस्थान और महाराष्ट्र के बैरल भी लगभग खाली हैं।

अखिल भारतीय औद्योगिक गैस उत्पादक एसोसिएशन के अध्यक्ष साकेत टिक्कू का कहना है कि समस्याएं केवल उत्पादन नहीं है। तैयार माल को दूर-दूर यहां तक कि ग्रामीण ठिकानों तक पहुंचा पाना ज्यादा बड़ी समस्या है। फिर, इसके आगे है ब्लैक मार्केट की समस्या है।

जोगेश्वरी, मुंबई में ऑक्सीजन सिलिंडर व अन्य चिकित्सकीय चीजों की दुकान चलाने वाले अफजल शेख बताते हैं कि कई परिवारों ने (जिनके यहां बूढ़े मा-बाप हैं या उन्हें खुद अपने लिए ही कोई खतरा लगता है) घर पर ऑक्सीजन सिलिंडरों और ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटरों का ढेर लगा लिया है। इससे सिलिंडरों की किल्लत हो गई है और ब्लैक मार्केट पनप रहा है। हालत यह है कि सौ लीटर का जो सिलिंडर साढ़े चार से पांच हजार के बीच मिल रहा था, वही अब आठ हजार से ज्यादा का मिल रहा है। रीफिल कराने के दाम भी ढाइ सौ से बढ़कर पांच सौ से आठ सौ के बीच पहुंच गए हैं।

पांच लीटर का ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर जो 45 से 50 हजार के बीच बिक रहा था, आज 80 से 90 हजार के बीच बेचा जा रहा हो। किराया भी 10 से 20 हजार हो गया है। दो माह पहले दाम थे पांच से दस हजार के बीच।

अफजल परेशानियों के लिए आदमी की मानसिकता को भी दोषी मानते हुए बताता है कि अगर किसी ने किराए पर कंसन्ट्रेटर ले लिया है तो वह उसे फिर अपने पास पूरे महीने भर रखना चाहता है, भले ही उसका काम तीन दिन बाद खत्म हो गया हो। वह रोज लोगों से कहता रहता है कि काम खत्म हो गया हो तो लौटा दो ताकि दूसरों की जान भी बच सके। कुछ मान जाते हैं। कुछ नहीं। अब बताओ मैं क्या करूं…लोग मर रहे हैं।

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