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COVID-19 Vaccines के दाम पर सरकार का नियंत्रण नहीं, जानें- क्यों?

दामों में खूब दखल देती आई है यह सरकार, उन दवाओं पर भी नियंत्रण जिनके अनेक निर्माता और परिणामस्वरूप जबर्दस्त कम्पटीशन, लेकिन कोवैक्सीन और कोविशील्ड आवश्यक वैक्सीनों की श्रेणी में रखी ही नहीं गईं।

, Edited By अजय शुक्ला नई दिल्ली | Updated: May 16, 2021 1:50 PM
दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम में COVID-19 Vaccine के लिए केंद्र पर पूछताछ करते लाभार्थी। (फोटोः पीटीआई)

सरकारें दवाओं की कीमतें नियंत्रित करती आई हैं। केंद्र की भाजपा सरकार की बात करें तो इसने तो मेडिकल उपकरणों तक की कीमतें नियंत्रित की हैं। नियंत्रित मूल्य की दवाओं की संख्या 950 से भी अधिक है। इस सूची में पैरासिटामॉल, आइबूप्रोफेन और एमॉक्सिसिलीन जैसी दवाएं भी हैं। इन दवाओं के अनेक निर्माता हैं। खूब तगड़ा कम्पटीशन है। डिमांड और सप्लाइ में संतुलन की स्थिति।

मगर कीतमों पर सरकारी नियंत्रण कोविड की वैक्सीनों में नहीं! इनके बनाने वाले सिर्फ दो!! वैसे राज सिर्फ एक नाम का—लगभग कोई कम्पटीशन नहीं!!! तिस पर डिमांड और सप्लाइ में भारी विसंगति। इंडियन एक्सप्रेस ने इस बाबत अर्थसास्त्रियों, वकीलों, हेल्थ-एक्टिविस्टों और विश्लेषणकर्ताओं से बात की। सबने माना कि अन्य कि सरकार की नीति विरोधाभासी है। कुछ दवाओं के लिए एक नीति और वैक्सीनों के लिए कुछ और। यही नहीं सरकार ने दाम चुकाने की जिम्मेदारी भी उपभोक्ता पर डाल दी है। यह काम तो दुनिया में किसी सरकार ने नहीं किया।

क्रोसिन, दोलो, पैरासिप और कैलपोल। इन नामों से सब लोग परिचित हैं। पैरासिटामॉल (जेनरिक नाम) के ब्रांड-नेम हैं ये। इस नियंत्रित मूल की दवा के दाम एक अप्रैल को दो रुपए थे। टैक्स आदि लगाके भी इसके दाम दो रुपए से जरा से ज्यादा होते हैं।

हृदयरोगियों को लगने वाले स्टेंट्स ऐबट, मेडट्रॉनिक, सहजानंद मेडिकल टेक्नॉलजीज़ और ट्रांसल्यूमिना थेरप्यूटिक्स आदि अनेक कंपनियां बनाती हैं। यहां भी खूब कम्पटीशन है। लेकिन स्टेंट्स की कीमतें नियंत्रित हैं। आपको याद होगा कि 2017 में इनके दाम सत्तर प्रतिशत कम हुए थे। यही नहीं केंद्रीय टीकाकरण प्रोग्राम के तहत आने वाली डीपीटी, मीज़ल्स, हिपेटाइटिस-बी और पोलियो की वैक्सीन्स भी मूल्य नियंत्रण की परिधि में रखी गई हैं।

उपर्युक्त दवाओं के मूल्यों में दखल देने का काम नेशनल फार्मस्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए)करती आई है। लेकिन, कोविड वैक्सीनों के मामले में इस संस्थान का कोई रोल नहीं होगा। ऐसा कहना है एक विशेषज्ञ का। इसका अर्थ हुआ कि वैक्सीनों की उपलब्धता और उन तक जनता की पहुंच बनाए रखने जिम्मेदारी सरकार पर है। विशेषज्ञ ने कहा कि ये सर्वथा नए किस्म की वैक्सीन हैं। इनकी कीमतों का पहले से कोई डाटा ही नहीं है। ऐसे में एनपीपीए के पास कीमत फिक्स करने के लिए कोई रिफरेंस ही नहीं। एक बड़ी बात औरः ये वैक्सीन आवश्यक श्रेणी में नहीं रखी गई हैं। इसलिए ये एनपीपीए के अधिकार क्षेत्र में आती ही नहीं।

इस विशेषज्ञ ने ये बातें इस शर्त पर बताईं कि उसका नाम गोपनीय रखा जाए। उन्होंने कहा कि आदर्श वही था जो सरकार ने वैक्सीन निर्माण के शुरू ने किया थाः बनाने वालों से मोलभाव कर दाम फिक्स करना। पूरी दुनिया इसी नीति पर चलती है। इस संबंध में एनपीपीए अध्यक्ष शुभ्रा सिंह, फार्मस्यूटिकल सेक्रेट्री और हेल्थ सेक्रेट्री के पास प्रश्न भेजे गए हैं, जिनके जवाब कल रात कर नहीं मिले थे।

तो इस तरह दाम तय करने का अधिकार वैक्सीन बनाने वालों को मिल गया और उन्होंने एक मई से अपने माल के दाम कई गुना बढ़ा दिए। यहां सरकार का तर्क दिलचस्प है। उसने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामें में बताया कि ऐसा इसलिए कि उत्पादन में तेजी आए, नए उत्पादक उभरें और इस तरह सप्लाई बढ़े।

इसी हलफनामे में सरकार ने एक और बात लिखी है जो और भी ज्यादा दिलचस्प है। वह कहती है कि उसने रेमडिसिविर के दाम कम करने के लिए दखल दिया। कई बार विचार-विमर्श हुआ..दूसरे तरीके भी आजमाए गए और रेमडिसिविर बनाने वालों ने दवा के दाम अपनी ओर से 25 से 50 प्रतिशत घटा दिए। सरकार ने बताया कि दवा मूल्य नियंत्रण के उचित प्रावधानों का इस्तेमाल कर के कोविड के इलाज में काम आने वाली इलॉक्सपरीन, मेथिलप्रेड्निसोलोन और पैरासिटामॉल के दामों में दखल दिया गया है।

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