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COVID-19 Vaccine का टोटा क्यों? जब केवल 39 लाख भारतीयों को मिली थी वैक्सीन, तब 1.60 करोड़ डोज विदेश भेज चुकी थी सरकार

सीरम इंस्टीट्यूट 10 करोड़ डोज़ डिस्काउंट पर दे रहा था, लेकिन सरकार ने इसके लिए एडवांस बुकिंग नहीं कराई। अगर कराती तो इंस्टीट्यूट को मौद्रिक तरलता मिलती। साथ ही वैक्सीन का उत्पादन भी बढ़ पाता।

Edited By अजय शुक्ला नई दिल्ली | May 9, 2021 12:39 PM
नई दिल्ली में राधा स्वामी सत्संग न्यास में BLK-Max Hospital द्वारा स्थापित किए गए कोरोना वैक्सिनेशन सेंटर पर टीकाकरण के लिए अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते लोग। (फोटोः पीटीआई)

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष हों या क्रिकेट स्टार क्रिस गेल अथवा एंटीगा, बारबेडस के प्रधानमंत्री या ब्राजील सरीखे देश के राष्ट्रपति—सब के सब भारत की तारीफ कर रहे थे। ब्राजील के राष्ट्रपति ने तो अपने ट्वीट में संजीवनी लाते हनुमान की तस्वीर भी चिपकाई थी।

यह तारीफ इसलिए कि भारत ने इन देशों को कोविड की वैक्सीन दे दी थीं। लेकिन, यह मार्च तक ही हो सका। वैक्सीन डिप्लोमेसी थोड़े ही समय में भारत को चोट देने लगी। यहां कोरोना की बहुत तेज लहर आ गई। नतीजतन, भारत को वैक्सीन का एक्सपोर्ट रोकना पड़ा है। अब हालत यह है कि भारत में वैक्सीनेशन तो प्रभावित हुआ ही है अफ्रीकन यनियन भी 30-35 प्रतिशत आबादी को 2021 तक वैक्सीनेट करने का लक्ष्य नहीं पा पाएगी।दरअसल, एक्सपोर्ट और भारतीय वैक्सीनेशन निर्बाध जारी रखने के लिए थोड़ा और चिंतन और योजना बनाने की जरूरत थी। विशेषज्ञ कहते हैं इसके साथ वैक्सीन बनाने वाली कंपनी के पास एडवांस ऑर्डर भी देने चाहिए थे। इससे मैन्यूफैक्चरर की जेब में पैसा होता और उसके पास भी समस्या न होती। वायरॉलजिस्ट शाहिद जमील कहते हैः ठीक है, वैक्सीन एक्सपोर्ट करना व्यापारिक और नैतिक जिम्मेदारी थी। लेकिन अगर योजना बना कर चला जाता तो न तो घरेलू किल्लत होती और न एक्सपोर्ट रुकता।

दिसंबर 2020 में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने सरकार को कोविशील्ड के दस करोड़ डोज़ डिस्काउंट रेट पर ऑफर किए थे। लेकिन, सरकार जिसने जुलाई 2021 तक देश में 30 करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य बना रखा था, इस ऑफर पर एडवांस बुकिंग कराने से बचती रही।

सरकार की यह अन्यमनस्कता अद्धुत थी। वैक्सीन के लेन-देन खरीद-फरोख्त में शुरू से ही जुड़े रहे एक उच्चस्थ स्वास्थ्य सलाहकार का कहना है कि वैक्सीन की एडवांस बुकिंग न कराने का नतीजा यह हुआ कि विश्व में सबसे ज़्यादा वैक्सीन बनाने वाला संस्धान सीरम इंस्टीट्यूट मुद्रा की तरलता से वंचित रह गया। तरलता होती तो सीरम इंस्टीट्यूट उत्पादन क्षमता बढ़ाता और थोड़ा स्टॉक भी बनाता। संस्थान ने तय किया था कि दिसंबर में वैक्सीन निर्माण की जो क्षमता पांच करोड़ थी उसे मार्च तक बढ़ा कर दस करोड़ कर दिया जाएगा।

तीस करोड़ लोगों को वैक्सीनेट करने के ले वेस्टेज जोड़ते हुए 65 करोड़ डोज़ चाहिए थे। इनमें भारत बायोटेक से अधिकतम 15 करोड डोज़ (कोवैक्सीन) मिल पाते। सीरम इंस्टीट्यूट 5-7 करोड़ डोज़ दे पाता। जुलाई तक 50 करोड़ पहुंचते पहुंचते सीरम वाले लड़खड़ा जाते। यहां इस स्थिति में ध्यान देने की बात है कि एक्सपोर्ट का कोई जुगाड़ नहीं हो पा रहा।

लेकिन, वास्तविक सीन यह है कि मार्च तक भारत एक्सपोर्ट हो रहे वैक्सीन डोज़ ज्यादा थे और लगाए जा रहे डोज कम थे।

16 जनवरी से शुरू हुए वैक्सीनेशन अभियान के पहले दो हफ्तों में भारत में 39 लाख लोगों का टीका करण हुआ। लेकिन यह भी देखिए कि जनवरी के अंत तक हमारा देश 1.6 करोड़ डोज़ एक्सपोर्ट कर चुका था।

फरवरी में भारत में एक करोड़ दस लाख लोग वैक्सीनेट हुए लेकिन इसी अवधि में एक्सपोर्ट हुए डोज़ की संख्या 2.1 करोड़ थी। एक अप्रैल तक, जब सरकार ने वैक्सीन को 45 साल से ऊपर वालों के लिए खोल दी, उस वक्त वैक्सीन की घरेलू सप्लाई और एक्सपोर्ट दोनों 6.5 करोड़ डोज़ पर थी।

इस वक्त जब जुलाई की डेडलाइन के लगभग ढाई महीने बचे हैं, भारत में सिर्फ 15.5 करोड़ डोज़ लग पाए हैं। यह लक्ष्य के चौथाई से भी कम है। यह किल्लत का नतीजा है कि अप्रैल के पहले हफ्ते में रोज 35 लाख वैक्सीन लग रही थीं जो महीने के अंत में 21 लाख रह गईं। मई का दैनिक औसत तो और नीचे गिरकर 16 लाख पर आ गया है।

वैक्सीन उत्पादन और टीकाकरण में तेजी चाहिए। लेकिन इसमें समय लगेगा। भारत बायोटेक ने अपना उत्पादन जो जनवरी में 50 लाख था उसे अप्रैल में दो करोड़ कर दिया है। सीरम इंस्टीट्यूट को भी उम्मीद है कि वह अपना मासिक उत्पादन जुलाई तक दस करोड़ डोज़ कर लेगा।

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