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कोरोनाः जिसने खोजा उसका नाम-चेहरा तक पता नहीं, पर ‘वैक्सीन गुरु’ बताए जा रहे मोदी- टीके के टोटे के बीच रवीश कुमार का PM पर तंज

टीवी पत्रकार के अनुसार, "इतना बड़ा देश सवाल ही नहीं करता कि इतना महान खोज जिन 'हमारे वैज्ञानिकों' ने की है, उनका चेहरा कहां हैं? आपको अभी तक यही प्रमुख रुप से बताया जाता रहा है कि भारत दूसरे देशों को टीका भेज कर मानवता की सेवा कर रहा है।"

टीवी पत्रकार कुमार कोरोना काल में अव्यवस्था (खासकर स्वास्थ्य क्षेत्र में) को लेकर मोदी सरकार से सवाल पूछते आए हैं। (फाइल फोटोः fb-RavishKaPage/PTI)

कोरोना वायरस संकट के बीच टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसा है। उन्होंने कहा है कि जिसने इस वैश्विक महामारी का टीका खोजा, उसका कहीं कोई नाम और चेहरा तक नहीं जानता। पर नरेंद्र मोदी को वैक्सीन गुरु बताया जा रहा है।

हिंदी समाचार चैनल NDTV India के वरिष्ठ पत्रकार ने यह बातें एक लंबे फेसबुक पोस्ट में कहीं। 14 मई, 2021 को लिखे इस पोस्ट को उन्होंने शीर्षक दिया, ‘टीके की खोज करने वाले ‘हमारे वैज्ञानिक’ कौन हैं, टीके निर्यात हुआ या मदद के तौर पर गया।’ कुमार के मुताबिक, पीएम अक्सर कहते हैं कि टीका ‘हमारे वैज्ञानिकों’ ने बनाया है। वह कभी नहीं कहते कि इसको दो निजी कंपनियों के वैज्ञानिकों ने बनाया है, जिसमें भारत सरकार ने एक नया पैसा नहीं लगाया है। प्राइवेट कंपनियों को बिल्कुल भारतीय खाते में गिना जा सकता है। गिना ही जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री इस तरह से जोर देते हैं जैसे उनकी देखरेख में और आर्थिक मदद से दोनों कंपनियां रिसर्च कर रही हैं। पिछले साल भारत बायोटेक और सीरम इंस्टीट्यूट का दौरा करते हैं। उसकी तस्वीरें ऐसे छप रही हैं जैसे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सब कुछ हो रहा है।

रवीश ने आगे स्पष्ट करते हुए बताया कि कोविशील्ड का निर्माण भारत में मौजूद एक कंपनी में हुआ है, पर रिसर्च और खोज का काम ब्रिटेन में हुआ है। इसमें भारत का एक भी पैसा नहीं लगा है। दुनिया में बड़ी साख वाली भारत बायोटेक की कोवैक्सिन का पेटेंट भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद भी साझा करता है। पर हम नहीं जानते कि भारत बायोटेक के अनुसंधान में जो वैज्ञानिक काम करते हैं क्या वो केवल भारतीय हैं? हमें तो उनका नाम तक नहीं बताया गया है। अगर ICMR के वैज्ञानिकों ने भारत बायोटेक के साथ कुछ काम किया है तो हम वह भी जानते हैं। लेकिन तब भी हम नहीं जानते कि ‘हमारे वैज्ञानिकों’ कौन हैं। जनवरी के पहले हफ़्ते में जब टीके को मंज़ूरी दी जाती है तब भी हम नहीं जानते हैं कि ‘हमारे वैज्ञानिक’ कौन हैं। केवल प्रधानमंत्री मोदी का बयान छपता है कि यह एक निर्णायक मोड़ है। टीके के अनुसंधान से लेकर वितरण पर प्रधानमंत्री मोदी अपना फ़ोटो चिपका देते हैं। जबकि उसमें भारत सरकार का एक नया पैसा नहीं लगा है।

पत्रकार ने आगे लिखा- ऐसे भी देश को जानने का हक़ तो है ही कि टीके की खोज से जुड़े हमारे वैज्ञानिक कौन हैं? क्या आपको यह बात परेशान नहीं करती है कि उनका इंटरव्यू तक कहीं नहीं छपा है। जब मंगलयान लाँच हो रहा था तब प्रधानमंत्री इसरो के सेंटर पहुँच जाते हैं। वहाँ ऐसे घूमने-घामने लगते हैं जैसे मंगलयान का रिसर्च भी उन्होंने किया है। बताया जाता है कि हौसला बढ़ाने गए हैं। अच्छी बात है। लेकिन उनके घूमने-घामने से काफ़ी कुछ दुनिया को टीवी पर दिखाया जाता है। वैज्ञानिकों का चेहरा सामने आता है। तो यह तर्क न दें कि उन वैज्ञानिकों का नाम और चेहरा सुरक्षा कारणों से छिपाया जाता है।

पोस्ट के अनुसार, “इतना बड़ा देश सवाल ही नहीं करता कि इतना महान खोज जिन ‘हमारे वैज्ञानिकों’ ने की है, उनका चेहरा कहां हैं? आपको अभी तक यही प्रमुख रुप से बताया जाता रहा है कि भारत दूसरे देशों को टीका भेज कर मानवता की सेवा कर रहा है। प्रधानमंत्री के इसी बयान को प्रमुखता से छापा जाता है और मोदी भी इस पर प्रमुख रुप से ज़ोर देते हैं। जहां जहां टीका जाता है उसकी तस्वीरें भारत के अख़बारों में छपती हैं। टीवी में दिखाया जाता है और मोदी के साथ वैक्सीन गुरु लिखा जाता है। जिस वैज्ञानिक ने खोज की है उसका नाम और चेहरा तक पता नहीं लेकिन वैक्सीन गुरु बताए जा रहे हैं मोदी। क़ायदे से तो उन वैज्ञानिकों को वैक्सीन गुरु कहा जाना चाहिए था।”

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