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दवा में आत्मनिर्भरता बड़ी चुनौती; फार्मा उद्योग का 70% केमिकल होता है आयात, चीन से आता है आधे से ज्यादा

इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक अशोक कुमार मदान के मुताबिक, एपीआई के लिए भारत चीन पर निर्भर है। अर्थशास्त्री रेजी जोसेफ का कहना है कि चीन पर हमारी निर्भरता करीब 25 साल पहले शुरू हुई थी।

India is dependent on China in API 850देश के दवा (फार्मास्युटिकल) उद्योग में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख रासायनिक सामग्री का 70 फीसदी हिस्सा आयात होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार रात देश के नाम अपने संबोधन में कोरोनावायरस के कारण बिगड़े आर्थिक हालात को सुधारने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ का ऐलान किया। उन्होंने लोकल पर वोकल होने और उसे ग्लोबल बनाने की अपील की। उन्होंने जनता से देसी वस्तुओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के साथ उसका प्रचार करने की बात कही थी।

भारतीय फार्मा उद्योग ने उनके इस कदम का स्वागत किया है। इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस (आईपीए) के महासचिव सुदर्शन जैन ने कहा, प्रधानमंत्री की अपील समय की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल प्रशंसनीय है, लेकिन इसका धरातल पर उतरना कठिन चुनौती है। खास कर दवा उद्योग में।

देश के दवा (फार्मास्युटिकल) उद्योग में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख रासायनिक सामग्री का 70 फीसदी हिस्सा आयात होता है। इस 70 फीसदी का करीब 70 फीसदी आयात चीन से होता है। जो प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के सफल होने में बड़ी चुनौती है।

रिसर्चर्स (शोधकर्ताओं) और इस उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, भारत की एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिअंट्स (Active Pharmaceutical Ingredients) पर इतनी ज्यादा निर्भरता चीनी नीतियों का नतीजा है। चीन ने लागत और टेक्नालजी (प्रौद्योगिकी) के मदद से एपीआई (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिअंट्स) बाजार पर कब्जा करने वाली नीतियां बनाईं।

‘द टेलिग्राफ’ ने इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक अशोक कुमार मदान के हवाले से लिखा कि एपीआई के लिए भारत चीन पर निर्भर है। अर्थशास्त्री और इंस्टीट्यूट फार स्टडीज इन इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (Institute for Studies in Industrial Development) में एसोसिएट प्रोफेसर रेजी जोसेफ ने ‘द टेलिग्राफ’ को बताया, ‘चीन पर हमारी निर्भरता करीब 25 साल पहले शुरू हुई थी। हमने समय-समय पर इसके जोखिमों को पहचाना, लेकिन अब तक हम प्रभावी प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहे।’

जोसेफ ने बताया, ‘1980 के दशक के दौरान, भारत लगभग 30 प्रतिशत एपीआई का ही आयात करता था, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत से, चीनी सरकार ने केमिकल सिंथिसिस (रासायनिक संश्लेषण) और बॉयो-टेक्नालजी (जैव प्रौद्योगिकी) को बहुत ज्यादा प्रोत्साहित किया। ये दोनों ही चीजें एपीआई उत्पादन के दो प्रमुख प्रॉसेस हैं। यही वजह है कि चीन अन्य देशों के मुकाबले कम लागत पर एपीआई का उत्पादन करने में सक्षम है।’

जोसेफ ने कहा, ‘सरकार ने वर्षों पहले एपीआई आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत पर बल दिया था।’ ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क के सदस्य सौरीराजन श्रीनिवासन ने बताया, ‘हालांकि, विभिन्न कारणों से, विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट को छोड़कर दूसरी चीजें नहीं हुईं।’ मदान ने बताया, ‘केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस साल मार्च में एपीआई उत्पादन बढ़ाने के लिए 9,940 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी थी।’ उनके मुताबिक, ‘फर्मेंटेशन पर आधारित एपीआई संयंत्रों को ऑप्टिमाइज्ड उत्पादन में 6 साल तक लग सकते हैं। दवा उद्योग से जुड़े एक एक्जेक्यटिव ने बताया, ‘यह जोखिम हो सकता है, क्योंकि इस समय को चीन अपनी तकनीक में सुधार और लागत कम करने में इस्तेमाल कर सकता है।’

पिछले साल 3 दिसंबर को केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री देवूसिंह जेसिंगभाई चौहान ने संसद में एक सवाल के जवाब में एपीआई के आयात पर देश की निर्भरता को रेखांकित किया था। केंद्रीय मंत्री के मुताबिक, ‘भारत ने 2016 में लगभग 56%, 2017 में 68% और 2018 में 66% एपीआई चीन से आयात किया था। वहीं, भारत ने इन्हीं वर्षों में यूरोपीय संघ के देशों से क्रमशः 16 प्रतिशत, 15 प्रतिशत और 2018 में 11 प्रतिशत एपीआई का आयात किया था।’

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