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लॉकडाउन में खाने-रहने के पड़े लाले तो साइकिल चला बेटी पिता को ले आई गुरुग्राम से बिहार, कहा- न आते, तो भूखे मर जाते

लॉकडाउन बढ़ता गया तो दोनों बाप-बेटी के खाने की किल्लत होने लगी, उधर मकान मालिक भी किराए के लिए दबाव बनाने लगा। इस पर बेटी ने हिम्मत जुटाते हुए साइकिल पर ही अपने गांव लौटने की बात कही।

पिता को साइकिल पर बिठाकर अपने गांव जाती ज्योति। (वीडियो ग्रैब इमेज)

कोरोना वायरस के चलते जारी लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों के पलायन से जुड़ी कई भावुक कहानियां सामने आयी। इस दौरान जहां लोग दुखी और परेशान दिखे, वहीं लोगों के हिम्मत और हौंसलों से जुड़ी कहानियां भी खूब चर्चा में रहीं। ऐसी ही एक और कहानी सामने आयी है, जहां एक 13 साल की बेटी अपने पिता को साइकिल पर बिठाकर गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा में अपने गांव पहुंच गई। दरअसल पिता के पैर में चोट है, जिसके कारण वह साइकिल नहीं चला सकते। वहीं अपनी बेटी की इस कोशिश से पिता को काफी गर्व महसूस हो रहा है। उनका कहना है कि यदि बेटी हिम्मत नहीं करती तो वह भूखे मर जाते।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 13 साल की ज्योति हरियाणा के गुरुग्राम में अपने पिता के साथ रहती है। उसके पिता ई रिक्शा चलाकर दोनों का पेट भरते थे। कुछ समय पहले ज्योति के पिता का एक्सीडेंट हो गया और वह पैरों से लाचार हो गए। इसके बाद लॉकडाउन हो गया और उनकी कमाई का जरिया बंद हो गया।

जब लॉकडाउन बढ़ता गया तो दोनों बाप-बेटी के खाने की किल्लत होने लगी, उधर मकान मालिक भी किराए के लिए दबाव बनाने लगा। इस पर बेटी ने हिम्मत जुटाते हुए साइकिल पर ही अपने गांव लौटने की बात कही। पिता ने मना किया और समझाया कि उन्हें बिठाकर साइकिल चलाना, वो भी इतनी दूर आसान नहीं होगा लेकिन बेटी अपनी बात पर अड़ी रही और आखिरकार हालात को देखते हुए पिता को बेटी की दृढ़ इच्छा और हिम्मत के सामने झुकना पड़ा।

आखिरकार दोनों बाप-बेटी साइकिल पर बिहार के दरभंगा में अपने गांव के लिए निकल गए। रास्ते में लोगों ने खाना वगैरह दे दिया और कई दिनों की यात्रा के बाद दोनों बाप-बेटी आखिरकार अपने गांव पहुंच गए हैं। पिता का कहना है कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है जो उसने इतनी हिम्मत जुटायी और वह अपने घर पहुंच सके।

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