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कोरोना ने प्राइवेट अस्पतालों का भी किया खस्ताहाल, 0.5 फीसदी मरीज ही आ रहे ओपीडी, 80% तक घटी कमाई, पर ऑपरेशनल खर्च हुआ कई गुना

RTIICS के सीईओ आर.वेंकटेश ने बताया कि 'आमतौर पर अस्पताल में रोजाना 1000 मरीज आते थे लेकिन अब सिर्फ 50 मरीज ही आ रहे हैं।' अधिकतर निजी अस्पतालों में ऐसा ही नजारा है।

कोरोना वायरस के चलते जारी लॉकडाउन का निजी अस्पतालों पर बुरा प्रभाव पड़ा है।

कोरोना संक्रमण के चलते जारी लॉकडाउन ने निजी अस्पतालों के राजस्व को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है। दरअसल निजी अस्पतालों में इन दिनों मरीज ज्यादा आ नहीं रहे हैं, जिसके चलते अस्पतालों की कमाई 80 फीसदी तक कम हो गई है। दक्षिणी कोलकाता का रेमेडी अस्पताल इन दिनों वीरान पड़ा है। ओपीडी में कुछ ही मरीज आ रहे हैं और अस्पताल का स्टाफ इधर-उधर घूमकर ही अपना समय बिता रहा है। ऐसा ही कुछ हाल रबिंद्रनाथ टैगोर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियेक साइंस (RTIICS) का है।

RTIICS के सीईओ आर.वेंकटेश ने बताया कि ‘आमतौर पर अस्पताल में रोजाना 1000 मरीज आते थे लेकिन अब सिर्फ 50 मरीज ही आ रहे हैं।’ अधिकतर निजी अस्पतालों में ऐसा ही नजारा है।

बड़े अस्पतालों से लेकर छोटे नर्सिंग होम्स तक लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इनकी कमाई 70-80 फीसदी तक कम हो गई है, वहीं अस्पतालों की लागत इस दौरान बढ़ गई है। दरअसल स्टाफ को पीपीई किट, ट्रांसपोर्ट सर्विस और कुछ जगहों पर स्टाफ के ठहरने का भी इंतजाम अस्पतालों को ही करना पड़ रहा है।

मुंबई के खार स्थित हिंदुजा अस्पताल के एमडी डॉ. अविनाश सुपे ने बताया कि ‘अस्पताल में सर्जरी से करीब 80 फीसदी कमाई होती है। चूंकि अब कॉस्मेटिक सर्जरी, जॉइंट रिप्लेसमेंट पूरी तरह से बंद हो गए हैं तो अब सिर्फ इमरजेंसी वाली सर्जरी ही हो रही हैं, जो कि कुल सर्जरी का सिर्फ 20 फीसदी है। अस्पताल में अब सिर्फ कैंसर या फ्रैक्चर के मरीज ही आ रहे हैं और ओपीडी में बहुत कम मरीज रह गए हैं।’

मैक्स अस्पताल के चेयरमैन अभय सोई ने बताया कि कोविड 19 फैसिलिटी को चलाना बेहद महंगा है। सामान्य के मुकाबले इसमें तीन गुना ज्यादा खर्च आता है। इसके तहत प्रोटेक्टिव गीयर और स्टाफ के टेस्ट शामिल हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्टाफ कोरोना से संक्रमित ना हो।

मुंबई के भाटिया अस्पताल में जहां 51 स्टाफ कोरोना पॉजिटिव पाया गया था, वहां के एमडी ने बताया कि 700 लोगों के स्टाफ की टेस्टिंग पर 32 लाख रुपए खर्च हुए हैं और ये टेस्ट रुटीन में बार बार कराने पड़ते हैं। इसी तरह मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में स्टाफ के लिए 300 पीपीई किट रोजाना चाहिए होती हैं, जिनका एक दिन का खर्च 2.4 लाख रुपए होता है।

बढ़ता खर्च ही कारण है कि कई छोटे-मोटे नर्सिगं होम फिलहाल बंद हो गए हैं। अपोलो अस्पताल की जॉइंट एमडी डॉ. संगीता रेड्डी ने बताया कि निजी अस्पतालों में 20 फीसदी मरीज ही आ रहे हैं और इस तिमाही में निजी अस्पतालों का राजस्व 59000 करोड़ रुपए से घटकर 18000 करोड़ रुपए रह गया है।

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