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नौ दिनों के लॉकडाउन में प्रोडक्शन जीरो, पर 17,500 प्रवासी मजदूरों को रोज खाना-पानी और महीने की सैलरी दे रही ये कंपनी

कंपनी के चेयरमैन केपी रामासामी ने बताया कि "इनमें से 5000 ओडिशा, 2500 बिहार, असम और हिमाचल प्रदेश, 2000 केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश और 8000 के करीब तमिलनाडु के विभिन्न जिलों के लोग हैं।

Author Translated By नितिन गौतम नई दिल्ली | Updated: April 3, 2020 10:34 AM
कोरोना वायरस लॉकडाउन के बीच कंपनी अपने 17500 कर्मचारियों का पूरा ख्याल रख रही है। (एक्सप्रेस फोटो)

देश में जारी लॉकडाउन के चलते अधिकतर कंपनियों ने अपने कामगारों, खासकर प्रवासी कामगारों को, अपने-अपने घर जाने दिया है। दरअसल लॉकडाउन के चलते कंपनियों और फैक्ट्रियों को अपना प्रोडक्शन बंद करना पड़ा है और अभी आने वाले दिनों के लिए भी अनिश्चित्ता का माहौल बना हुआ है। यही वजह है कि अधिकतर कंपनियों ने अपने कामगारों को मुक्त करने का फैसला किया है। हालांकि कुछ कंपनियों ने अभी भी बड़ा दिल और लंबे समय की योजनाओं के चलते अपने कामगारों को नहीं छोड़ने का फैसला किया है।

ऐसा ही एक उदाहरण है कोयंबटूर बेस्ड केपीआर मिल्स लिमिटेड, जिसके कर्मचारियों की संख्या करीब 22,000 है। इनमें से 90 प्रतिशत महिलाएं हैं। कंपनी की चार स्पिनिंग मिल्स हैं और तीन गारमेंट की कंपनियां, जो कि तमिलनाडु के कोयंबटूर, त्रिपुर, इरोडे में स्थित हैं।

25 मार्च से कंपनी की मिल्स से, जिनकी संयुक्त क्षमता 3.54 धागे के स्पिंडल (तकले) बनाने की है, कोई भी प्रोडक्शन नहीं हुआ है। इसी तरह गारमेंट कंपनी की मैन्यूफैक्चर क्षमता आम तौर पर 9.5 करोड़ इनर और आउटरवियर बनाने की है, जिसकी सप्लाई केमार्ट, प्राइमार्क और मार्क्स एंड स्पेंसर जैसी बड़ी कंपनियों को की जाती है, लेकिन यहां भी मैन्यूफैक्चरिंग जीरो है।

कंपनी की, जिसकी वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिक्री 3264 करोड़ रुपए रही थी, उसने अपने 22 हजार कर्मचारियों में से एक को भी नहीं निकालने का फैसला किया है। कंपनी के कर्मचारियों में 17500 प्रवासी मजदूर हैं, जो कि कंपनी के हॉस्टल में ठहरे हुए हैं।

कंपनी के चेयरमैन केपी रामासामी ने बताया कि “इनमें से 5000 ओडिशा, 2500 बिहार, असम और हिमाचल प्रदेश, 2000 केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश और 8000 के करीब तमिलनाडु के विभिन्न जिलों के लोग हैं। सभी 17500 प्रवासी मजदूरों को खाना कंपनी की तरफ से दिया जा रहा है। बचे हुए 4500 स्थानीय कर्मचारी हैं, जिनका घर एक-दो घंटे की दूरी पर है। वो लोग अपने परिवार के साथ रहने के लिए चले गए हैं।”

चेयरमैन रामासामी ने बताया कि अभी कंपनी का प्रति मजदूर 13,500 रुपए मासिक का खर्च आ रहा है। इसके साथ ही 22000 कर्मचारियों को करीब 30 करोड़ रुपए के वेतन बिल का भी भुगतान एक अप्रैल को किया गया है। मुफ्त खाने और ठहरने का इंतजाम का खर्च अलग है।

रामासामी ने कहा कि ‘लॉकडाउन हमेशा नहीं चलेगा और काम दोबारा शुरू होगा। अब क्योंकि हमारे कर्मचारी प्रशिक्षित और अनुभवी है, इसलिए हमें उनका ख्याल रखना जरूरी है।’

इसी तरह हैटसन एग्रो प्रोडक्ट लिमिटेड, भारत की सबसे बड़ी निजी सेवा की डेयरी कंपनी है। इस कंपनी के 18 प्लांट में करीब 8000 कर्मचारी काम करते हैं। जिनमें से 1500 प्रवासी मजदूर हैं। इस कंपनी ने भी अपने कर्मचारियों को मुक्त नहीं किया है और अपने खर्च पर इनके रहने खाने का इंतजाम किया है।

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