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कोरोना से जंगः युवा डॉक्टर ने ड्यूटी पर पहुंचने को चलाई 2200 किमी कार, 4 दिन में 5 राज्य पार कर पहुंचा बंगाल

डॉक्टर रोहित पांडा ने पश्चिम बंगाल में नौकरी के लिए आवेदन किया था। उनकी नौकरी भी लग गई, लेकिन लॉकडाउन था, इसलिए उन्होंने मदद के लिए 2 मई को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यालय का दरवाजा खटखटाया।

Author Edited By आलोक श्रीवास्तव नई दिल्ली | Updated: May 14, 2020 11:58 AM
Doctors coronavirus 850कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में डॉक्टर्स प्रथम पंक्ति के योद्धा बने हुए हैं।

कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में डॉक्टर्स प्रथम पंक्ति के योद्धा बने हुए हैं। कोरोना के खिलाफ जंग में शामिल होने के लिए एक युवा डॉक्टर ने 2200 किलोमीटर से ज्यादा कार ड्राइव की। उन्होंने यह सफर पीपीई गियर (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विप्मेंट) में तय किया। मतबल उन्होंने अपने शरीर को इस तरह प्रोटेक्ट किया, जिससे किसी भी सूरत में वे संक्रमित नहीं होने पाएं।

रोहित पांडा ने हाल ही में पुणे स्थित भारती विद्यापीठ विश्वविद्यालय मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की है। उन्होंने बताया, ‘महाराष्ट्र में ग्रामीण इलाकों में मेरी इंटर्नशिप 17 अप्रैल को खत्म हो गई थी। इंटर्नशिप के दौरान मैं समझ सकता था कि देश में कोरोनोवायरस कितनी तेजी से फैल रहा है। मैं गृह राज्य पश्चिम बंगाल की स्थिति भी नजर रखे हुए था।’

रोहित पांडा ने कहा, ‘इंटर्नशिप खत्म होने के बाद मैंने फैसला किया कि मैं किसी भी कीमत पर अपने राज्य के लोगों की सेवा करने के लिए वहां पहुंचूंगा। हालांकि, महाराष्ट्र में ई-पास हासिल करने में देरी हुई। मैं ई-पास के बिना यात्रा नहीं कर सकता था। कुछ औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अगले हफ्ते से मैं कोलकाता स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज एसएसकेएम अस्पताल के मेडिसिन विभाग में ड्यूटी ज्वाइन करूंगा।’

डॉक्टर रोहित पांडा ने पश्चिम बंगाल में नौकरी के लिए आवेदन किया था। उनकी नौकरी भी लग गई, लेकिन लॉकडाउन था, इसलिए उन्होंने मदद के लिए 2 मई को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यालय का दरवाजा खटखटाया। उसके बाद उन्हें उसी दिन ई-पास मिल गया।

रोहित पांडा ने बिना समय बर्बाद किए अगले दिन सुबह 8 बजे कोलकाता के लिए कूच कर दिया। वे 7 मई को कोलकाता पहुंचे। इस दौरान उन्होंने महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सीमाओं को पार किया। डॉ. पांडा ने बताया कि इस दौरान उन्होंने राजमार्गों पर बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को हेल्थ स्क्रीनिंग के लिए अंतरराज्यीय सीमाओं पर घंटों इंतजार करते हुए देखा।

उन्होंने बताया, ‘जैसे ही आंध्र प्रदेश से ओडिशा की सीमा में प्रवेश किया। मैंने देखा कि सैकड़ों प्रवासी मजदूर लाइन में खड़े थे। उनके बीच सोशल डिस्टेंसिंग जैसी कोई बात नहीं थी। मैंने उस लाइन में खड़े होने से इंकार कर दिया। इस कारण मुझे अपनी जांच कराने में कई घंटे इंतजार करना पड़ा। जांच होने के बाद मुझे आगे जाने की मंजूरी मिली।’

डॉक्टर पांडा ने कहा, ‘मैं लोगों की जान बचाना चाहता हूं। इसलिए मैं सभी प्रोटेक्टिव इक्विप्मेंट (फेस शील्ड्स, हैंड ग्लव्स) से लैस था। जब मेरे लिए कार चलाना दूभर हो गया तब मैंने अपनी जैकेट उतारी।’ उन्होंने पश्चिम बंगाल सीमा पर प्रवासी मजदूरों के लिए की गई व्यवस्था की प्रशंसा की।

उन्होंने बताया, ‘जब मैं 7 मई की सुबह बंगाल की सीमा पर पहुंचा तो मुझे जो एक बहुत बड़ा अंतर दिखाई दिया, वह यह था कि वहां हजारों प्रवासी मजदूरों के लिए बेहतर इंतजाम थे। एक क्वारंटीन यूनिट थी और तेजी से जांच हो रही थी।’ महाराष्ट्र में लोगों के बीच काम करने के बजाय कोलकाता में क्यों पहुंचना चाहते थे, के सवाल पर पांडा ने कहा, ‘मैंने सुन रखा था कि बंगाल में कोरोनोवायरस के कारण कई हेल्थ वर्कर्स संक्रमित हो रहे थे। महाराष्ट्र में ऐसी संख्या कम थी।’

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