ताज़ा खबर
 

बड़ा सवाल: गांव लौटे मजदूरों के सामने रास्ता, क्या होगा आगे

पूर्णबंदी के कारण अपने घरों को लौट आए लाखों श्रमिकों के पास ऐसी हजारों कहानियां व करोड़ों चिंताएं हैं। वह चाहे गांव हूडास का रघुबीर सिंह हो या जेठाराम आंचरा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले हफ्ते तक चार लाख से अधिक प्रवासी राजस्थान आए हैं जिनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो महाराष्ट्र, दिल्ली व तमिलनाडु सहित दूसरे राज्यों में कोई न कोई काम कर रहे थे।

Author जयपुर | Published on: June 3, 2020 4:40 AM
देश के विभिन्न हिस्सों से राजस्थान लौटीं महिलाएं काम के लिए परेशान हैं।

कोरोना से उपजे संकट और पूर्णबंदी के कारण अपने घर लौट आए श्रवण दास आने वाले दिनों को लेकर चिंतित हैं। ब्याह योग्य दो बेटियां और दो बेटों सहित छह लोगों का परिवार, घर बाहर के खर्च और कमाई का कोई जरिया नहीं। वे कहते हैं, ‘बड़ा संकट है, पता नहीं क्या होगा?’

श्रवण दास की तरह यह सवाल राजस्थान के उन लाखों प्रवासी श्रमिकों के लिए यक्ष प्रश्न बन गया है जो पूर्णबंदी के कारण घर लौट आए हैं। उन लोगों के लिए यह और भी बड़ा सवाल है जो किन्हीं कारणों से मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) से नहीं जुड़ सकते या सरकारी मदद के दायरे में नहीं आते। श्रवण दास इसी संकट का एक उदाहरण हैं।

राजधानी जयपुर से 220 किलोमीटर दूर नागौर जिले के मेड़ता रोड कस्बे में रहने वाले 42 वर्षीय श्रवण दास पिछले आठ महीने से पुणे में एक घर में रसोइए का काम कर रहे थे। करीब बीस हजार रुपए महीने की आमदनी से उनका गुजारा ठीक-ठाक चल रहा था। कोरोना संक्रमण फैलने के बाद महीने भर पहले वह अपने गांव आ गए।

श्रवण ने कहा ‘यहां करने के लिए कुछ नहीं है। मनरेगा में जा नहीं सकते। रसोइये जैसा कोई काम यहां मिल नहीं रहा। बड़ा संकट है।’ उन्होंने कहा, ‘बेटियां शादी करने लायक हो रही हैं… कम से कम इस समय तो यह संकट नहीं आना चाहिए था।’ उन्हें चिंता यह भी है कि यह संकट कब खत्म होगा और बाद में भी क्या वह अपने पुराने काम पर लौट सकेंगे? उनकी पत्नी ने मनरेगा में नाम लिखवाया है लेकिन अभी नंबर नहीं आया। श्रवण ने कहा कि वह अभी इधर उधर से लेकर खर्च चला रहे हैं और किसी तरह के सरकारी कर्ज या सहायता की जानकारी अभी नहीं मिली है।

नागौर जिले के ही बुंडेल गांव के खेमराज गौड़ (45) की कहानी कुछ अलग है। वह 22- 23 साल पहले पुणे गए थे और वहां कैटरिंग का काम कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘कैटरिंग का काम अच्छा खासा चल रहा था, 14-15 लोगों की टीम थी सबका गुजारा हो रहा था।’ खेमराज के परिवार में पत्नी, दो बेटे व एक बेटी है। तीनों बच्चे स्कूल जाते हैं। निराशा और सोच में डूबे हुए खेमराज कहते हैं, ‘यहां आय का एकमात्र जरिया थोड़ी बहुत खेती बची है। समझ नहीं आता आगे क्या होगा?’

गांव में अपना काम करने के लिए सरकारी योजना के तहत कर्ज लेने के सुझाव पर खेमराज सवाल करते हैं, ‘कर्ज लें लेकिन किसके सिर पर… मतलब दिखाने और चुकाने के लिए आमदनी भी तो होनी चाहिए।’

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दिल्ली बीजेपी: किसी पार्षद को तीसरी बार कमान
2 राजस्थान: कोरोना मरीज बढ़े, ठीक होने की रफ्तार भी बढ़ी
3 विशेष: कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच डंक मारने को तैयार डेंगू व मलेरिया