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जनसत्ता विशेष: चाय की चुस्की पर चिपका विषाणु

भारतीय टी बोर्ड का कहना है कि चालू वर्ष में चाय के उत्पादन में 10 करोड़ किलोग्राम की गिरावट आ सकती है। चाय बोर्ड के अध्यक्ष पीके बेजबरुआ ने बताया कि पूर्णबंंदी करना अपरिहार्य था, क्योंकि बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं था।

Author Published on: April 8, 2020 1:38 AM
चाय बागानों में काम करतीं महिलाएं।

शंकर जालान
चाय पर भी कोरोना के कहर का व्यापक असर नजर आ रहा है। इन दिनों जारी पूर्ण बंदी (लॉकडाउन) की वजह से उत्तर बंगाल के तमाम चाय बागानों में ताला लटका है, जिससे चाय का उत्पादन तो प्रभावित हो ही रहा है। 14 अप्रैल के बाद भी स्थिति पूरी तरह सामान्य हो जाएगी, इसे लेकर संशय है। अभी जबकि चाय का पर्याप्त भंडार है और आने वाले दो-तीन महीने चाय की कोई कमी नहीं होने वाली, बावजूद इसके थोक बाजारों में चाय की कीमतों में 20 से 40 रुपए किलो का इजाफा हो गया है और खुदरा बाजार में यह आंकड़ा 80 से 100 रुपए तक चला गया है। यानी की 20-22 मार्च तक एक किलो चायपत्ती के एवज में ग्राहकों को 160 रुपए देने पड़ते थे अब 240 से 260 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक हर क्षेत्र की तरह ही चाय उद्योग पर भी कोरोना वायरस काला साया मंडरा रहा है। उत्तर बंगाल के दार्जीलिंग स्थित चाय बागानों के मालिकों व इस उद्योग जुड़े लोगों का कहना है कि कोविड-19 महामारी से निबटने को लेकर सार्वजनिक पाबंदियों के कारण चाय बागानों में पहले दौर की खिली पत्तियां (फ्लश उत्पादन) बर्बाद हो गई है। इस वजह चाय के उत्पादन में गिरावट आएगी व बागान मालिकों के वित्तीय संकट इजाफा होगा और आम लोगों के लिए चाय की चुस्की महंगी हो जाएगी।

चाय उद्योग के जानकारों का कहना है चाय बागान की वार्षिक आमदनी में पहले दौरान की पत्तियों का योगदान करीबन 40 फीसद रहता है, क्योंकि यह उच्च गुणवत्ता की चाय होती है, जो ऊंचे भाव पर बिकती है, लेकिन इस दफा ऐसी सब पत्तियां नष्ट होने की कगार पर है। दार्जीलिंग चाय संघ (डीटीए) के अध्यक्ष विनोद मोहन ने कहा कि पहाड़ियों में होने वाले 80 लाख किलोग्राम वार्षिक उत्पादन का 20 फीसद हिस्सा फ्लश उत्पादन यानी पहली खेप का होता है। उन्होंने आगे कहा- स्थिति बहुत खराब है। पहले फ्लश उत्पादन लगभग खत्म हो गया है। इसी तरह डीटीए के पूर्व अध्यक्ष अशोक लोहिया का कहना है कि पूरी पहली फ्लश फसल निर्यात योग्य होती है और इस प्रीमियम किस्म का उत्पादन घटने के कारण वार्षिक राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

इस बीच, भारतीय टी बोर्ड का कहना है कि चालू वर्ष में चाय के उत्पादन में 10 करोड़ किलोग्राम की गिरावट आ सकती है। चाय बोर्ड के अध्यक्ष पीके बेजबरुआ ने बताया कि पूर्णबंंदी करना अपरिहार्य था, क्योंकि बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं था। उनके मुताबिक 2019 में देश में 138.9 करोड़ किलोग्राम चाय का उत्पादन हुआ था, जो मौजूदा वर्ष यानी 2020 में घटकर 129 करोड़ किलोग्राम पर आ सकता है।

टी बोर्ड के उपाध्यक्ष अरुण कुमार ने कहा कि चाय के पौधों को फिर से उत्पादन के स्तर पर लाने में समय लगेगा। इससे चाय की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। उत्तर बंगाल के 87 चाय बागानों की ओर से राज्य सरकार को पत्र लिखकर उत्पादन शुरू करने की अनुमति देने की मांग की गई है, इनका तर्क है चाय उत्पादन मुख्य रूप से एक कृषि गतिविधि है और हर कृषि का एक अनुकूल मौसम होता है। चाय के पहले फ्लश का मौसम मार्च से शुरू होता है और मई के पहले सप्ताह तक जारी रहता है। इसलिए उन्हें चाय बागान खोलने और काम करने की अनुमति दी जाए। ताकि ज्यादा चाय का उत्पादन कर कम से कम कीमत पर उपभोक्ताओं को चाय उपलब्ध कराई जा सके।

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