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हवा के मुकाबले पानी में देर तक रहते हैं कोरोना विषाणु; कई सूक्ष्म जीव विज्ञानियों की राय- नदी में 20 से 25 दिन तक विषाणु के रहने का अंदेशा

श्री हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ आर सी शर्मा का कहना है कि है कि कोरोना विषाणु या कोई भी अन्य विषाणु हवा में ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहते क्योंकि उसे हवा में नमी और ठंडापन कम मिलता है। जबकि जल में उसे ठंडापन और नमी अधिक मिलती है। उन्होंने कहा कि जीवित इंसान या जानवर का शरीर मिलने पर वह सक्रिय होकर घातक साबित होता है क्योंकि उसे मानव शरीर में या किसी जलीय जंतु के शरीर में प्रवेश करते ही ग्लूकोज की मात्रा मिलती है। कोरोना विषाणु के लिए ग्लूकोज सबसे पसंदीदा भोजन है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (एक्सप्रेस फोटो)।

गंगा नदी में संक्रमित मरीजों के शव बहाए जाने के बीच सवाल उठने लगा है कि क्या कोरोना के विषाणु पानी में भी मौजूद हो सकते हैं। कई सूक्ष्म जीव विज्ञानी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हवा के मुकाबले कोरोना विषाणु नदी के जल में ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं क्योंकि उन्हें वहां ठंडा तापमान ज्यादा देर तक मिलता है। यह इनके लिए अनुकूल हैं। दरअसल, नदी का तापमान हवा के मुकाबले कम होता है। विषाणु को ठंडे तापमान के साथ-साथ नमी भी अधिक मिलती है। जिस नदी का जल ज्यादा ठंडा होगा वहां कोरोना या अन्य रोग के विषाणु ज्यादा दिन तक जीवित रहेंगे। गंगा नदी का जल अन्य नदियों के मुकाबले ज्यादा ठंडा होता है।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रमेश चंद्र दुबे का कहना है कि कोरोना का विषाणु पानी में देर तक रहता है। हवा में जहां कोरोना या अन्य विषाणु तीन से पांच दिन तक जीवित रह सकते हैं, वहीं नदी के जल में 20 से 25 दिन तक विषाणु के जीवित रहने की संभावना बनी रहती है। हवा का तापमान जल के तापमान से ज्यादा होता है इसलिए जब कोरोना का विषाणु रेत-मिट्टी, लकड़ी या लोहे से चिपक जाता है तो वह जल्दी मर जाता है क्योंकि इन चीजों में तापमान ज्यादा बढ़ता है। उन्होंने कहा कि जिस नदी का जल जितना अधिक ठंडा होगा उसमें विषाणु ज्यादा दिन तक जीवित रहेगा और नदी में जब लोग स्नान करेंगे तो वहां पर यह संक्रमण फैलेगा। क्योंकि वहां पर आचमन से या नदी में डुबकी लगाने से शरीर के भीतर इसके जाने की अधिक संभावना होती है। जीवित मानव शरीर में प्रवेश करने से कोरोना तेजी से पनपता है और उसके बढ़ने की गति बढ़ जाती है।

प्रोफेसर दूबे ने शोध में पाया है कि गंगा नदी में तीन-चार तरह के संक्रमण होते हैं जिनमें ईकोलाई संक्रमण मनुष्य के पेट की आंत पर आक्रमण करता है। यह आंतों की बीमारी पैदा करता है जिसे कोलाइटिस कहते हैं। इस नदी में दूसरा संक्रमण सालमोनेला पाया जाता है जो टाइफाइड की वजह बनता है। तीसरा संक्रमण जो गंगा में पाया जाता है वह बहुत खतरनाक है। इसे क्लेवशियाल निमोनी कहा जाता है। गंगा में स्नान करने से यह संक्रमण सीधे फेफड़ों पर आक्रमण करता है। कोरोना काल में हरिद्वार में कुंभ का मेला आयोजित किया गया जहां कोरोना संक्रमित साधुओं और अन्य श्रद्धालुओं ने स्नान किया उनकी वजह से यह संक्रमण क्लेमसियाल निमोनी संक्रमण के साथ मिल कर और जानलेवा साबित हुआ।

प्रोफेसर दुबे का कहना है कि गंगाजल में पाए जाने वाले इन तीनों संक्रमण को नष्ट करने का काम जीवाणु विमोजी यानी बैक्टीरिया फाज करता है परंतु गंगा नदी में कोरोना विषाणु को नष्ट करने का काम जल में मौजूद बैक्टीरिया फाज क्यों नहीं कर पाया, यह अभी शोध का विषय है उन्होंने बताया कि गंगा जल में पाए जाने वाला जीवाणु विमोजी यानी बैक्टीरिया फाज प्राकृतिक रूप से गंगा नदी में रहता है जो जल को स्वच्छ बनाता है परंतु यह कोरोना के विषाणु को नष्ट करने में प्रभावी क्यों नहीं हो पाया, इस पर वे शोध कर रहे हैं।

श्री हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ आरसी शर्मा का कहना है कि जीवाणु विमोजी यानी बैक्टीरिया फाज गंगाजल में व्याप्त संक्रमण को दूर करने का सबसे बड़ा कारक माना जाता है जो पानी को शुद्ध बनाए रखता है। गंगा स्नान के समय कोरोना के विषाणु को बैक्टीरिया फाज निष्प्रभावी क्यों नहीं रह पाया यह शोध का विषय है। शोध कार्य जारी है। उनका कहना है कि कोरोना विषाणु या कोई भी अन्य विषाणु हवा में ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहते क्योंकि उसे हवा में नमी और ठंडापन कम मिलता है। जबकि जल में उसे ठंडापन और नमी अधिक मिलती है। इसलिए वह ज्यादा समय तक जल में जीवित रहता है परंतु वह सक्रिय तब होता है जब वह मानव या किसी जानवर के शरीर में प्रवेश करता है। जीवित इंसान या जानवर का शरीर मिलने पर वह सक्रिय होकर घातक साबित होता है क्योंकि उसे मानव शरीर में या किसी जलीय जंतु के शरीर में प्रवेश करते ही ग्लूकोज की मात्रा मिलती है। कोरोना विषाणु के लिए ग्लूकोज सबसे पसंदीदा भोजन है।

सूक्ष्म जीव वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि नदी के जल में कोरोना या अन्य विषाणुओं के लिए जिंदा रहने की अत्यधिक संभावना रहती हैं जिस पर सूक्ष्म जीव वैज्ञानिक और पर्यावरणविद संयुक्त रूप से शोध कार्य में लगे हुए हैं।

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