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कोरोना: उत्तर प्रदेश में दावे असलियत से विपरीत, कानपुर में ऑक्सीजन के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं डॉक्टर

राज्य सरकार ने पिछले दिनों निर्देश दिया था कि बिना डॉक्टर की पर्ची के लिए किसी व्यक्ति को गैस न दी जाए। लेकिन अफसरों का कहना है कि बीमार व्यक्तियों के घर वालों को रोक पाना असंभव काम है।

Author Translated By अजय शुक्ला कानपुर | April 28, 2021 3:39 PM
Ursula Horsman Memorial, Kanpur, Oxygenकानपुर में ऑक्सीजन की आपूर्ति और रिफिलिंग स्टेशनों के बाहर लंबी लाइन हैं। फोटो- इंडियन एक्सप्रेस/अवनीश मिश्रा)

उर्सला अस्पताल के चीफ मेडिकल सुपरिंटेंडेंट अनिल निगम ईश्वर से प्रार्थना करते रहते हैं कि सब कुछ ठीक रहे। वे अस्पताल के लिए ऑक्सीजन प्लांट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। प्लांट गुरुवार को आना है। वे कहते हैं, भगवान की कृपा है। अभी तक एक बार भी ऑक्सीजन खत्म नही हुई। हालांकि ऐसा वक्त भी आया जब अगर सिंलिंडर मिलने में 15 मिनट का भी विलंब होता तो गड़बड़ हो जाती। अस्पताल को हर घंटे 10-12 सिलिंडर की जरूरत है।

उर्सला कोविड अस्पताल नहीं बनाया गया है। इसके बादवजूद दो दिन पहले वहां 35 कोविड मरीज थे। ऐसा इसलिए कि आने के बाद कोरोना-पॉज़िटिव निकलते है। अस्पताल के सात-आठ कर्मचारी संक्रमित हैं। एक नर्स की तो मौत भी हो चुकी है। अस्पताल में हर समय दो-तीन मरीज भर्ती होने का इंतजार करते रहते हैं। उन्हें लौटाना पड़ता है क्योंकि सबके लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं की जा सकती।

मेडिकल कॉलेज से संबद्ध कानपुर के हैलट अस्पताल में कोविड मामलों के लिए आठ वार्ड अलग छोड़ दिए गए हैं। इन आठ वार्डों के लिए सिर्फ एक डॉक्टर की ड्यूटी लगाई गई है—लगभग 16 घंटे की ड्यूटी। यहां 80 मरीज भर्ती हैं। इनमें 8-9 कोविड के कनफर्म्ड मरीज हैं जबकि बाकी की जांच रिपोर्ट आनी है। अलबत्ता उनके लक्षण कोविड के ही हैं। केंद्रीयकृत प्रणाली के नाते यहां ऑक्सीजन की यहां कोई किल्लत नहीं। लेकिन बेड कम हैं। एक-एक बेड पर दो-दो रोगी।

अस्पताल में राहुल कुमार खोया-खोया खड़ा है। उसके पिता बुद्धीलाल (52) की मौत हो चुकी है। डॉक्टर कह रहे हैं, बॉडी ले जाओ। राहुल पिता का कोविड सार्टिफिकेट मांगता है। डाक्टर कहते हैं शायद सार्टिफिकेट खो गया है। राहुल नहीं जानता क्या करे। बिना सार्टिफिकेट के अंत्येष्टि कर दे। या नई का इंतजार करे। डॉक्टर कह रहे हैं कि नई रिपोर्ट आने में 48 घंटे लगेंगे। उसका गांव उन्नाव जिले में है।

उन्नाव अस्पताल ने बुद्धीलाल को कई दिन पहले कानपुर रेफर किया था। उसे यहां भर्ती कराया गया था लेकिन अव्यवस्था देखकर घर वाले उसे वापस ले गए थे। फिर उसे कई प्राइवेट अस्पतालों में ले जाया गया। सबने इन्कार कर दिया। अंत में जब हालत बिगड़ी तो हैलट ही लाना पड़ा, जहां उसकी मौत हो गई।

विगत दिवस एक बैठक में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने बताया कि यूपी के लिए पीएम-केयर्स फंड के तहत 61 ऑक्सीजन प्लांट्स का प्रस्ताव भेजा गया था। इनमें से 32 स्थापित हो चुके हैं। बाकी 39 भी विभिन्न अस्पतालों में शीघ्र लगने जा रहे हैं। सरकार ने टैंकरों की संख्या 64 से बढ़ाकर 84 कर दी है। 2000 अतिरिक्त ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटरों का भी इंतजाम किया जा रहा है। इसके अलावा कानपुर में प्राइवेट सेक्टर की ओर से भी 11 ऑक्सीजन प्लांट प्रस्तावित हैं।

हैलट से पांच किमी दूर बब्बर मेडिकल ऑक्सीजन के बाहर कड़ी धूप में लंबी लाइन लगी है। ये ऑक्सीजन चाहने वाले हैं। हर 40-45 मिनट में सप्लायर अपना मुख्य गेट खोलता है और दो दर्जन लोग भीतर बुला लिए जाते हैं। जब इन लोगों को गैस मिल जाती है तब गेट खोल कर फिर दो दर्जन लोगों को बुला लिया जाता है।

गैस रीफिलिंग और सिलिंडरों की यह बिक्री उन मरीजों के लिए है जो अपने घर में इलाज करा रहे हैं। अवनीश शुक्ला लाइन में आठ बजे से खड़े हैं। उनकी मां दो दिन पहले कोरोना से संक्रमित हुई थीं। 10-11 अस्पतालों ने जब भर्ती करने से इनकार कर दिया तो वे घर पर ही इलाज करने लगे।

राज्य सरकार ने पिछले दिनों निर्देश दिया था कि बिना डॉक्टर की पर्ची के लिए किसी व्यक्ति को गैस न दी जाए। लेकिन अफसरों का कहना है कि बीमार व्यक्तियों के घर वालों को रोक पाना असंभव काम है। हर किसी का प्रेस्क्रिप्शन जांच पाना संभव नहीं। सप्लायर के यहां ऑक्सीजन की बिक्री को मानीटर करने के लिए एक अधिकारी कहते हैं कि इस ठिकाने में वितरण का एक क्रम बना दिया गया है। पहले 24 व्यक्तियों को आक्सीजन दी जाती है। फिर किसी अस्पताल को एक ट्रक माल दिया जाता है। यही क्रम चलता रहता है। अधिकारी कहता है कि सिलिंडर बिक्री में दिक्कत नहीं लेकिन रीफिल करने में कठिनाई होती है। अभी दो दिन पहले का केस है एक तीमारदार यहां जब गैस की रीफिल करा रहा था, उसके मरीज की मौत हो गई थी।

तभी ई रिक्शा में चढ़ाया जाता एक बड़ा 15 लीटर वाला सिलिंडर गिरता है। पहले टन्न की आवाज होती है फिर फिस्स्सस् की जोरदार आवाज के साथ ऑक्सीजन लीक होने लगती है। लोग हाथ से लीक रोकने का प्रयास करते हैं जो कि संभव ही नहीं। कुछ देर बाद सप्लायर के आदमी उपकरण लाकर लीक बंद कर देते हैं। तब तक कई लीटर गैस बह चुकी होती है। यह सिलिंडर मोहम्मद अम्मार का था। वे किसी बीमार के वास्ते सुबह सहरी खाकर पांच बजे से लाइन में लगे थे।

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