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कोरोनाः मृतकों को दी जानी वाली अनुग्रह राशि पर केंद्र ने जताई लाचारी तो SC ने ली चुटकी, जानिए पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या एनडीएमए ने कोविड-19 से मरने वाले लोगों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि नहीं देने का फैसला किया था?

पंजाब के जालंधर स्थित एक श्मशान घाट में कोरोना से मरने वाले व्यक्ति के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के दौरान रस्म निभाता परिजन। (फोटोः पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने कोविड-19 से मरने वाले लोगों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि नहीं देने का फैसला किया था? साथ ही, कोर्ट ने कहा कि लाभार्थियों के मन में किसी भी तरह के मलाल को दूर करने के लिए ‘एकसमान मुआवजा योजना’ तैयार करने के बारे में सोचा जा सकता है।

केंद्र सरकार ने कोर्ट में दाखिल किये गये अपने हलफनामे में कहा कि राजकोषीय वित्तीय स्थिति और केंद्र और राज्यों की आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव के चलते अनुग्रह राशि का भार बहुत ज्यादा है। हालांकि केंद्र ने अदालत से यह भी कहा कि ऐसा नहीं है कि सरकार के पास धन नहीं है। केंद्र ने कहा , ‘‘हम स्वास्थ्य सेवा ढांचा बनाने, सभी को भोजन सुनिश्चित करने, पूरी आबादी का टीकाकरण करने और अर्थव्यवस्था को वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज उपलब्ध कराने के लिए रखे गये कोष के बजाय अन्य चीजों के कोष का उपयोग कर रहे हैं। ’’

जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एम आर शाह की बैंच ने सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘‘आप(केंद्र) सही स्पष्टीकरण दे रहे हैं क्योंकि केंद्र सरकार के पास पैसे नहीं हैं का तर्क देने से व्यापक दुष्परिणाम होंगे।’’

बैंच ने कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वाले लोगों के आश्रितों को अनुग्रह राशि देने की मांग करने वाली दो याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आपदाओं से निपटने के विषय पर वित्त आयोग की सिफारिशें आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 12 के तहत मुआवजे पर वैधानिक योजनाओं की जगह नहीं ले सकते।

कोर्ट ने केंद्र से सवाल किया, ‘‘क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अनुग्रह राशि नहीं दिये जाने का कोई फैसला किया? ’’मेहता ने गृह मंत्रालय द्वारा लिये गये कुछ फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वह एनडीएमए के इस तरह के किसी फैसले से अवगत नहीं हैं।

दरअसल, गृह मंत्रालय आपदा प्रबंधन के लिए नोडल एजेंसी है। शीर्ष अदालत ने मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किये जाने की मौजूदा प्रक्रिया को ‘‘प्रथम दृष्टया कहीं अधिक जटिल’’ करार दिया और केंद्र से इसे ‘‘सरल बनाने’’ को कहा, जिससे कोरोना वायरस संक्रमण से मरने वाले लोगों के आश्रितों को जारी हुए प्रमाणपत्रों को बाद में भी दुरुस्त किया जा सके जिससे कि वे कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें।

बैंच ने सवाल किया, ‘‘क्या यह कहा जा सकता है कि कोरोना वायरस से संक्रमित हुए मरीज, जो अस्पताल में भर्ती हैं, को इस तरह का मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। ’’ बैंच ने कहा, ‘‘जब मानवता खत्म हो गई है और चीजों की कालाबाजारी हो रही है तो क्या कहा जा सकता है?’’

कोर्ट ने सॉलीसीटर जनरल से कहा कि कोविड से जिन लोगों की मौत हुई है उनके परिवार को उपयुक्त मृत्यु प्रमाणपत्र प्रदान करने के लिए जरूरी कदम उठाये जाएं। साथ ही, मृत्य के कारण में संशोधन का प्रावधान भी किया जाए।

मृतकों के परिजनों को राज्यों द्वारा एक समान मुआवजा राशि नहीं दिये जाने का जिक्र किये जाने पर बैंच ने पूछा कि क्या अधिनियम के तहत एकसमान दिशानिर्देश तैयार किया जा सकता है, नहीं तो प्रभावित परिवारों के मन में मलाल रह जाएगा।

कोर्ट ने कहा, ‘‘किसी को थोड़ी सी रकम मिलेगी और अन्य को अधिक राशि मिलेगी। ’’ मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार डीएमए के अन्य प्रावधानों के तहत एकसमान योजना पर विचार कर सकती है। बहरहाल कोर्ट ने पक्षों से लिखित दलीलें तीन दिनों के अंदर दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत इस विषय पर दो अलग-अलग याचिकाओं की सुनवाई कर रही है।

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