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कोरोना से जंग में कहां चूक रहे हम?

वैक्सीन बनाने वालों की सरकार मदद करती तो आज देश को यह किल्लत न देखनी पड़ती।

Coronavirus, COVID-19, National Newsनई दिल्ली में LNJP Hospital के पास रविवार को एक शहनाई बैंक्वेट हॉल को कोरोना मरीजों के लिए आइसोलेशल केंद्र के रूप में तब्दील कर दिया गया। (फोटोः पीटीआई)

भूटान में जमी हुई झीलों और हिमालय की सबसे ऊंची चोटियों से घिरा दुर्गमतम ठिकाना है लुनाना। वहां के सभी निवासियों को कोविड-19 की वैक्सीन लग चुकी है। वैक्सीन—-कोवीशील्ड, भारत ने दी थी। हेलीकॉप्टर से वैक्सीन भेजी गई थी क्योंकि वहां तक कोई वाहन नहीं जा सकता।

यह दिलचस्प और प्रेरणादायी खबर किसी भारतीय अखबार ने नहीं, अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स ने छापी है। आप और हम कह सकते हैं…अरे भूटान! पिद्दी सा देश है… कुछ लाख लोग ही तो रहते हैं…कौन-सौ कद्दू में तीर मार लिया!! सत्ताधारी भी मुंह बिचकाकर इस सूचना को खारिज कर सकते हैं। कोई गर्वीला यह भी कह सकता है…वैक्सीन तो हमी ने दान की। न देते तो क्या कर लेते।

ठीक है। भूटान छोटा देश है। उसने अपने ढंग से तैयारी कर रखी थी। तो, हम भी तो अपने ढंग से तैयारी कर सकते थे। चिकित्सा विज्ञानी जानते थे कि कोरोना कि दूसरी लहर आएगी। यह भी जानते थे कि दूसरी लहर ज्यादा तगड़ी होगी। यह बात सीरो-सर्वे ()से भी जाहिर हो रही थी। विशेषज्ञ जानते थे कि सवा अरब लोगों की भीड़ में कोरोना कहीं दुबका पड़ा होगा।

लेकिन, हम कोरोना प्रकोप से मिली मोहलत मौज-मस्ती में उड़ाते रहे। रेमडेसिविर का उत्पादन गिरा दिया। ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाया नहीं। हमने मान लिया था कि भारत कोरोना के खिलाफ महाभारत जीत चुका है। शादी-बारात, सिनेमा और होटलबाजी शुरू हो गई। कुंभ की तैयारी कर डाली। चुनावी अश्वमेध यज्ञ के लिए घोड़ा भी दौड़ा दिया गया। तभी कोरोना ने झपट्टा मारा। उसकी रफ्तार घोड़ा नहीं ध्वनि से भी तेज थी।

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आज वैक्सीन की किल्लत हो गई है। इससे निपटने के लिए पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने मोदी को लिखी चिट्ठी में कुछ तरीके बताए हैं। लेकिन, विशेषज्ञों की मानें तो सरकार वैक्सीनों को लेकर बहुत शुरू में ही गलती कर चुकी थी। कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ लिखता है कि सरकार ने मुख्य वैक्सीनों के लिए पैसा ही नहीं आवंटित किया, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने ऐसा ही किया। इन देशों ने सामर्थ्यवान वैक्सीन निर्माताओं को फंड तो दिया ही था, उनके साथ वैक्सीन खरीदने का करार भी किया।

केंद्र सरकार ने नवंबर 2020 बायोटेक्नॉलजी विभाग के समन्वय से वैक्सीन के लिए 900 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट की घोषणा की थी। लेकिन इस रकम का कोई भी हिस्सा न तो कोवीशील्ड को गया और न ही स्वदेशी कोवैक्सीन के पास। बस थोड़ी-सी रकम उन वैक्सीनों को दे दी गई, जो विकास के बिलकुल शुरुआती दौर में थी। एक महामारी विशेषज्ञ की नज़र में यह बहुत बड़ी गलती थी।

कोवीशील्ड बनाने वाले पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ने वैक्सीन विकसित करने के लिए अपने खुद के 2,012 करोड़ और बिल गेट्स फाउंडेशन से मिले 2,236 करोड़ रुपए गलाए थे। कोवैक्सीन बनाने वाली ककंपनी भारत बायोटेक, हैदराबाद सारा निवेश आंतरिक संसाधनों से किया था। केंद्र सरकारर ने बस कोवीशील्ड के क्लीनिकल ट्रायल्स के खर्चे को कवर किया था। और, कोवैक्सीन की लैब रिसर्च और एनीमल ट्रायल्स को पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाइरोलजी के जरिए मदद दी थी।

बायोटेक्नॉलजी विभाग ने वैक्सीन की मुहिम शुरू होने के तीन महीने बाद 16 अप्रैल को घोषणा की कि वह कोवैक्सीन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक को अपना उत्पादन एक करोड़ डोज़ प्रति माह से बढ़ा कर दस करोड़ करने के लिए सितंबर 2021 तक 65 करोड़ रुपए की मदद करेगा। विभाग ने तीन पीएसयू को भी 35 लाख डोज मासिक तैयार करने के लिए पैसे देने का वादा किया था।

कोविड वैक्सीनें इस वक्त 45 साल और इससे बड़े व्यक्तियों को दी जा रही हैं। 45 साल से छोटे लोगों को वैक्सीन नहीं दी जा रही। इसके पीछे सीमित उत्पादन का तर्क दिया जा रहा है। अक्टूबर 2020 में बने सरकार के प्रारंभिक प्लान के मुताबिक जुलाई 2021 तक ढाई करोड़ लोगों को टीके लगने थे। अब यह संख्या बढ़ाकर साढ़े तीन करोड़ कर दी है।

भारत सरकार समझ चुकी थी कि वैक्सीनों का शुरुआती जरिया सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक ही होंगे। मगर उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसा नदारद था। यह बड़ी चूक थी। सरकार इन कंपनियों की उत्पादन क्षमता जानती थी। अतएव उत्पादन बढ़ाने के लिए उसे आगे बढ़कर कुछ करना चाहिए था। दूसरे देशों ने यह काम किया मगर हमने नहीं।

अमेरिका ने पिछले साल जुलाई-अगस्त में ही 44,724 करोड़ रुपए निकाल कर मॉडर्ना, फाइज़र और जानसेन को बांट दिए थे। ऐसे ही ब्रिटेन ने ऐस्ट्राजेनेका के लिए 488 करोड़ रुपए ऑक्सफोर्ड को देने की घोषणा की थी। अक्टूबर तक ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, जापान और यूरोपीय यूनियन एक या ज्यादा वैक्सीनों के लिए कंपनियों के साथ करार कर चुकी थीं।

आज जब वैक्सीनों की किल्लत है 14 अप्रैल को स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासकों के ग्रुप इंडिया टास्क फोर्स न कहा है कि वर्तमान उत्पादन दर देखते हुए भारत डेढ़ करोड़ मासिक डोज़ की आवश्यकता पूरी करने की स्थिति में नहीं है। सेंटर फॉर डिजीज़ डायनमिक्स इकॉनमिक्स एण्ड पॉलिसी के निदेशक रमणन लक्ष्मीनारायणन का कहना है, “बड़े दुर्भाग्य की बात है, हम प्राइवेट सेक्टर को शक की निगाह से देखते हैं लेकिन उनसे यह भी उम्मीद करते हैं कि मुसीबत में वे हमारी दद करें।”

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