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‘धर्मांतरण’ ने भाजपा को धर्मसंकट में डाला

अंशुमान शुक्ल कभी मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों पर तो कभी सहारनपुर के फसादों पर सियासी गोटियां सरकाने वाली भाजपा इस बार खुद सकते में है। आगरा में हुए धर्मांतरण के मसले पर वरिष्ठ भाजपाई यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर वे बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस सम्मिलित […]

Author December 11, 2014 9:18 AM
अलीगढ़ में नहीं होगा ‘घर वापसी’ का कार्यक्रम

अंशुमान शुक्ल

कभी मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों पर तो कभी सहारनपुर के फसादों पर सियासी गोटियां सरकाने वाली भाजपा इस बार खुद सकते में है। आगरा में हुए धर्मांतरण के मसले पर वरिष्ठ भाजपाई यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर वे बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस सम्मिलित धर्मांतरण के प्रयास पर कहें तो क्या कहें? कभी कांठ में सियासी हांडी चढ़ाकर उसका राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करने वाले भाजपाई, लव जेहाद सरीखे मुद्दों के नकारे जाने के बाद धर्मांतरण के मसले पर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने की जुगत में हैं। उन्हें अब इस बात का भय है कि कहीं जनता में से कोई यह न पूछ ले कि आखिर पहले से ही बीमारू उत्तर प्रदेश में ऐसे मंजर पेश कर वे कैसे विकास की परिभाषा लिखना चाहते हैं।

आगरा में सोमवार को देवरी रोड पर वेद नगर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के धर्म जागरण प्रकल्प और बजरंग दल ने धर्मांतरण का कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें 60 मुस्लिम परिवारों के 387 सदस्यों को हिंदू धर्म में वापस कराने का दावा किया गया था। खुफिया विभाग ने उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार और केंद्र सरकार को धर्मांतरण के मसले पर जो सूचना दी है, उसके मुताबिक बड़े दिन यानी 25 दिसंबर को करीब चार हजार ईसाइयों और एक हजार मुसलमानों का धर्म परिवर्तन कराने की साजिश रची जा रही है। अलीगढ़ या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसी शहर में ऐसे आयोजन के करने की बात कही जा रही है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि लगातार सांप्रदायिक तौर पर तप रहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसे आयोजन कर आरएसएस और बजरंग दल कैसा उदाहरण प्रदेश की जनता के समक्ष रखना चाहते हैं? राजनीति के जानकारों का कहना है कि छह महीने बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पास उत्तर प्रदेश में उपलब्धि बताने के नाम पर कुछ खास नहीं है। इस वजह से जनता का ध्यान विकास से भटका कर सांप्रदायिक दिशा की तरफ उसे मोड़ने की साजिश रची जा रही है। केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर आ रहे ऐसे इल्जामों ने उसके वरिष्ठ नेताओं को असमंजस में डाल दिया है।

प्रदेश के एक वरिष्ठ भाजपाई कहते हैं, गोधरा कांड के बाद कट्टरवादी हिंदू के तौर पर उभरी नरेंद्र मोदी की छवि को ऐसे धर्मांतरण के आयोजन न चाहते हुए भी और बल प्रदान कर जाते हैं। ऐसा होना किसी भी दशा में न ही प्रधानमंत्री की छवि के लिए मुफीद है और न ही भाजपा खुद को इस जद में लाना चाहती है। उपचुनाव के दौरान लव जेहाद सरीखे मुद्दों को हवा देने की खमियाजा भाजपा भुगत चुकी है। इस मुद्दे को आधार देने के बाद भाजपा को यह बोध हो चुका है कि जनता ने इसे सिरे से किस अंदाज में खारिज किया। ऐसे में धर्मांतरण सरीखे मुद्दे के बेवजह तूल पकड़ने से प्रदेश के भाजपा नेता उत्साहित कम और चिंतित अधिक नजर आ रहे हैं। धर्मांतरण के मुद्दे ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।

मीडिया और जनता के समक्ष भले ही पार्टी के सभी नेता संवैधानिक आधार लेकर इसे सही ठहराने की विवशता से घिरे हों, लेकिन बातचीत में उनका दर्द उभर आता है। कांठ की हांडी की कलई पकने से पहले खुल जाने और लव जेहाद सरीखे मुद्दों को हवा देने के बाद भी उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के हाथों करारी शिकस्त का स्वाद चखने वाले भाजपाई धर्मांतरण के मुद्दे से पार पाने के रास्ते की तलाश में हैं। उधर समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को हवा देकर अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक मतदाता को साइकिल तले लाने की कोशिश में जुट गई है।

आगरा में हुए धर्मांतरण के मसले ने सपा खेमे को सक्रिय कर दिया है। लंबे समय के बाद उसके पास ऐसा मौका आया है जिसको भुनाकर वह अपनी बिगड़ी साख थोड़ी संवार सकती है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आखिर भारतीय जनता पार्टी धर्मांतरण के मसले पर आरएसएस और बजरंग दल पर काबू कैसे पाती है? अगर ऐसा करने में जरा भी कोताही हुई तो उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तक उसके सारे किए-कराए पर पानी फिर सकता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की जनता धार्मिक दर्शन और सियासत के बीच के बारीक अंतर को बहुत संजीदगी से समझती है। उसकी इसी समझ ने डेढ़ दशक पूर्व सत्ताधारी रही भाजपा को प्रदेश में अर्श से फर्श पर ला खड़ा किया था।

 

 

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