ताज़ा खबर
 

मुख्यमंत्री रावत और उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष आमने-सामने

दो दिन के टिहरी महोत्सव को लेकर हरीश रावत सरकार और उत्तराखंड के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय आमने-सामने आ डटे हैं। राज्य सरकार ने उपाध्याय को टिहरी महोत्सव के लिए निमंत्रण पत्र तक नहीं भेजा।

दो दिन के टिहरी महोत्सव को लेकर हरीश रावत सरकार और उत्तराखंड के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय आमने-सामने आ डटे हैं। राज्य सरकार ने उपाध्याय को टिहरी महोत्सव के लिए निमंत्रण पत्र तक नहीं भेजा। उपाध्याय टिहरी से दो बार विधायक भी रह चुके हैं। इस तरह किशोर उपाध्याय को टिहरी महोत्सव में न बुला कर हरीश रावत ने उन्हें आईना दिखाया है। टिहरी महोत्सव का आयोजन टिहरी के निर्दलीय विधायक और हरीश रावत सरकार में पर्यटन मंत्री दिनेश धनै की पहल पर हुआ। नाराज उपाध्याय ने कहा कि उन्हें टिहरी महोत्सव में बुलाया तक नहीं गया जबकि वे दो बार टिहरी विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वे टिहरी में पले-बढ़े हैं। वे टिहरी के हर जन आंदोलन और जन सरोकारों से लंबे समय तक जुडे रहे हैं। और आज भी जुडेÞ हुए हैं। उपाध्याय की उपेक्षा के चलते टिहरी के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी गुस्सा है।


रावत सरकार के पर्यटन मंत्री धनै पर कटाक्ष करते हुए उपाध्याय ने कहा कि जो लोग आज टिहरी के नेता बन रहे हैं, उनका टिहरी के आंदोलनों और जन सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं रहा है। वे लोग कभी भी कांग्रेस के वफादार नहीं रहे हैं। और जबकि ये लोग कांग्रेस पार्टी से बगावत कर विधानसभा का चुनाव लडेÞ थे। उपाध्याय ने कहा कि वे वफादार और अनुशासित कांग्रेसी हैं। उन्होंने कभी पार्टी का अनुशासन नहीं तोड़ा। और न ही पार्टी से कभी बगावत की। जबकि कुछ लोग सत्ता की खातिर अपनी आस्था बदलते रहते हैं।
धनै के बारे में पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने कहा कि कहावत है-चींटी और हाथी की कोई तुलना नहीं की जा सकती। इस तरह उपाध्याय ने खुद को हाथी और धनै को चींटी की संज्ञा दे डाली। मुख्यमंत्री हरीश रावत पर तंज कसते हुए उपाध्याय ने कहा कि उन्होंने जिन लोगों को सोनिया गांधी, राजीव गांधी के दरबार तक पहुंचाया और राजनीति के ऊंचे पायदान पर पहुंचाने में मदद की, वे आज उन्हें ही राजनीति सिखा रहे हैं।
राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि उपाध्याय हरीश रावत को उनके राजनीतिक संकट के वक्त राजीव गांधी के दरबार में ले गए थे। और उपाध्याय के कारण ही रावत की राजीव गांधी और सोनिया गांधी के यहां पैठ बनी थी। परंतु मुख्यमंत्री बनने के बाद हरीश रावत अपने बुरे दिनों के साथी उपाध्याय को ही भूल बैठे। जबकि उपाध्याय ने रावत सरकार को बचाने के लिए रात-दिन एक किया हुआ था। पार्टी हाईकमान और रावत के बीच सेतु का काम उपाध्याय ने किया था।

मई में हरीश रावत सरकार के बचने के बाद उपाध्याय को यह उम्मीद थी कि हरीश रावत उन्हें ईनाम के तौर पर राज्यसभा में भेजेंगे। परंतु उपाध्याय पर भरोसा करने की बजाय रावत ने कुमाऊं के दलित नेता प्रदीप टम्टा को राज्यसभा में भेज दिया। यह सब रावत ने धनै के दबाव में किया। इससे उपाध्याय बुरी तरह बौखला गए। और उन्होंने रावत के खिलाफ खुली बगावत कर दी।  सूत्रों के मुताबिक उपाध्याय अपने साथियों से बातचीत में रावत पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। जिस तरह से रावत ने धनै और प्रदीप टम्टा को आगे बढ़ाया, उससे रावत पर ब्राह्मण विरोधी होने का ठप्पा लग रहा है। दिनेश धनै ठाकुर हैं और वे गढ़वाल के टिहरी जिले के रहने वाले हैं। हरीश रावत कुमाऊं के ठाकुर हैं। इसलिए उनकी धनै से ज्यादा पटरी बैठ रही है। एक जमाने में किशोर उपाध्याय हरीश रावत के खास और दिनेश धनै विजय २बहुगुणा के खास हुआ करते थे।

विजय बहुगुणा के इशारे पर ही किशोर उपाध्याय के खिलाफ टिहरी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस से बगावत कर धनै ने सन 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। और उपाध्याय को चुनाव हरा दिया था।विजय बहुगुणा अपने मंत्रिमंडल में धनै को मंत्री बनाना चाहते थे। परंतु हरीश रावत के दबाव में धनै को बहुगुणा मंत्री नहीं बना सके थे। पिछले साल हरीश रावत ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा कर धनै को कैबिनेट मंत्री बनाया था। धनै को गढ़वाल के ठाकुर नेता के रूप में उभार कर हरीश रावत ने सतपाल महाराज के राजनीतिक विकल्प के रूप में गढ़वाल मंडल में स्थापित करना चाहते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.