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जिन्हें देश सुनता है, उनकी आवाज अनसुनी की ‘आकाशवाणी’ ने

देशभर से सैकड़ो की तादात में यहां पहुंचे, सालों से आकाशवाणी के केंद्र पर बतौर रेडियो उद्घोषक, कंपेयर, कार्यक्रम संचालक के रूप में सेवारत इन लोगों को पुलिस बल और वैरिकेट के आगे झुकना पड़ा..

Author August 4, 2015 6:44 PM

इसे विडंबना कहिए या अनदेखी, जो लोग अपनी आवाज देश के कोने कोने में पहुंचाया करते हैं मंगलवार को उनकी आवाज जंतर मंतर से चंद फर्लांग की दूरी पर स्थित संसद तक नहीं पहुंच सकी। देशभर से सैकड़ो की तादात में यहां पहुंचे, सालों से आकाशवाणी के केंद्र पर बतौर रेडियो उद्घोषक, कंपेयर, कार्यक्रम संचालक के रूप में सेवारत इन लोगों को पुलिस बल और वैरिकेट के आगे झुकना पड़ा। वे प्रसार भारती और आकाशवाणी में चल रहे दोहरे मापदंड की पोल खेलने दिल्ली आए थे। संसद तो दूर उनका आकाशवाणी दफ्तर तक पहुचना संभव नहीं हो सका। रेडियो की दुनिया के ये लोग बेबस होकर संसद की और जाने वाली सड़क पर ही बैठ गए। महिलाओं ने भी अपनी बात रखी और न्याय की मांग का।

इनकी आपबीती, न्याय के पैमाने पर नरेंद्र मोदी सरकार के दावों पर भारी पड़ रही थी। इसमें 53 साल के सुनिल वर्मा और 59 साल की शरणजीत कौर भी मौजूंद थी जो दशकों एंकरिंग करने के बाद भी नौकरी को पक्का कराने का जद्दोजहद से जूझ रहे थे। कोई 15 सालों से काम कर रहा है तो कोई 18 साल से। देश में 200 से ज्यादा रेडियो केंद्र हैं। पद रिक्त हैं। पहले संघ लोक सेवा ओयोग कार्यक्रम अधिशासी की भर्ती करता था। लेकिन अब कुछ जगह कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) ने भर्ती की। लेकिन सालों से अस्थायी तौर पर कार्यरत आकाशवाड़ी केंद्रों के इन रेडियो उदघोषक की सूध नहीं ली गई।

हवाला दिया गया कि वे पक्की बहाली के लिए जरूरी उम्र 28 को पार कर गए हैं। लिहाजा नौकरी के लिए आयोग्य करार हैं। चौकाने वाले तथ्य यह भी है कि सालों किए काम को अनदेखी कर उन्हें नौकरी के लिए आयोग्य तो घोषित कर दिया गया लेकिन सेवा से नहीं। बता दें कि उनसे अभी भी महीने में तीन चार बार काम सौंपे जाते हैं और 1300 रुपए प्रति एसाइंमेंट उन्हें मानदेय दिया जाता है। प्रदर्शन में शामिल मृत्युंजय कुमार उपाध्याय ने कहा-महीने में 3900-5200 तक मिल जाते हैं। एक एसाइंमेंट में दो से तीन दिन का समय लग जाता है। उन्हें पक्का किया जाना चाहिए।

आकाशवाणी कानपुर के ओमप्रकाश शर्मा को दिल्ली आते समय घरवालों के सवाल ने झकझोर दिए। क्यों जा रहे हो? वहां कौन सुनेगा? कितना पैसा मिलेगा? उन्होंने कहा, बिटिया को बताया कि नौकरी पक्की होगी। सब ठीक हो जाएगा। नजीबाबाद रेडियो स्टेशन में तीन दशक से सेवारत सुनिल ने कहा कि जिस उम्र में हमें रिटायर्ड होना चाहिए उस उमर में नौकरी के पक्कीकरण का आंदोलन! पास खड़ी शरणजीत ने कहा-शर्मनाक है। प्रदर्शन के संयोजक व एसोसिएशन के महासचिव मनोज कुमार ने कहा कि वे न्याय चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल 2006 को उमादेवी के मामले में व्यवस्था दी है कि दस साल से ज्यदा समय तक सेवारत संविदा कर्मियों को विशेष अवसर देकर नियमित किया जाएगा। इसके आलोक में कई ने अदालत (कैट)जाकर नौकरी पक्की ली। लेकिन यह क्यो? सबको एक आदोश से आकाशवाणी ही पक्की क्यों नहीं करती?

प्रदर्शनकारियों ने यहां कई चौकाने वाले तथ्य उकेरे। मसलन, अपने मोबाइल पर एआईआर की ओर से ‘विज्ञापन जुटाने’ के लिए सहयोग करने की अपील से लेकर प्रधानमंत्री की मन की बात के प्रसारण को जन-जन तक पहुंचाने में उनको झोंका जाना आदि शामिल थे। इतना ही नहीं अस्थाई इन उदघोषकों को हर साल आवाज की जांच से गुजरना पड़ता है जबकि पक्की नौकरी वालों की इस कोई बाबत सूध तक नहीं लेता। बहरहाल देर शाम अपना मांग पत्र आकाशवाणी के एक वरिष्ठ अधिकारी को सौंप कर रेडियों के वे लोग गोरखपुर, पटना, बरेली, कानपुर, मेरठ, दिल्ली आदि आकाशवाड़ी केंद्रों की ओर चल पड़े।

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