कांग्रेस पर मंडराता रहा नेशनल हेरल्ड केस का साया - Jansatta
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कांग्रेस पर मंडराता रहा नेशनल हेरल्ड केस का साया

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद इस साल बिहार में महागठबंधन के साथ सत्ता में साझेदारी और विवादास्पद भूमि विधेयक के मामले में मिली ‘जीत’ कांग्रेस के लिए एक उम्मीद लेकर आई है।

Author नई दिल्ली | December 28, 2015 1:36 AM
कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद इस साल बिहार में महागठबंधन के साथ सत्ता में साझेदारी और विवादास्पद भूमि विधेयक के मामले में मिली ‘जीत’ कांग्रेस के लिए एक उम्मीद लेकर आई है। हालांकि अब निष्क्रिय हो चुके अखबार नेशनल हेरल्ड से जुड़ा मामला इस साल भी कांग्रेस को सताता रहा। नए साल में कांग्रेस के सामने बहुत सी चुनौतियां हैं। केरल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में वर्ष 2016 में चुनाव होने हैं। आजादी के बाद से अधिकतर बार राज्य सरकारों का गठन कर चुकी कांग्रेस के हाथ अब तक सुधार का कोई फार्मूला नहीं लग पाया है। कांग्रेस 15 साल से असम में सत्ता में है। दूसरी ओर केरल में हर पांच साल में आम तौर पर मुकाबला माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच रहता है। तमिलनाडु में लगभग 50 साल से और पश्चिम बंगाल में लगभग 40 साल से कांग्रेस सत्ता के गलियारों से दूर है।

इस साल की शुरुआत सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी के लिए अच्छी नहीं रही थी। दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने भारी जीत हासिल की थी। उसके लिए राहत की बात सिर्फ इतनी थी कि भाजपा भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी। साल की शुरुआत में 56 दिनों की अपनी रहस्यमयी छुट्टियों के बावजूद राहुल ने पार्टी में अपनी अहमियत बनाए रखी और सोनिया कांग्रेस पार्टी की कमान राहुल की मर्जी के अनुसार, कभी भी उन्हें सौंपने के लिए तैयार दिखीं।

राहुल के छुट्टियों से लौटकर आने के बाद एआईसीसी ने अनौपचारिक तौर पर यह प्रचारित कर दिया कि राहुल जल्द ही पार्टी की कमान संभाल सकते हैं लेकिन बाद में बिहार चुनावों को देखते हुए यह इरादा उस समय छोड़ दिया गया। इस बारे में अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है कि यह कमान कब सौंपी जानी है।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 44 सीटों के निम्नतम स्तर पर पहुंचा देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पार्टी के लिए हौवा बने रहे। सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर गांधी परिवार पर निशाना साधती रही । इस साल के दौरान राहुल ने अग्रिम मोर्चा संभाला और वह मोदी और उनके शासन के तरीके के सबसे मुखर आलोचक के रूप में सामने आए। राहुल ने मोदी की सरकार को ‘सूट-बूट की सरकार’ की संज्ञा दी। इस हमले से सत्ताधारी पक्ष तिलमिला उठा था।

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ रुख अपनाया। विपक्ष ने इस विधेयक को ‘किसान विरोधी और कारोबारियों के समर्थन वाला’ करार देते हुए भारी विरोध जताया। प्रधानमंत्री को खुद भी इस विधेयक से जुड़े निर्णय को बदलने के संकेत देने पड़े। वर्ष के खत्म होने के कगार पर पहुंच जाने पर, नेशनल हेरल्ड मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय का आदेश सोनिया और राहुल के लिए एक अप्रत्याशित झटका था। राहुल ने तो इसे ‘100 फीसदी राजनीतिक प्रतिशोध’ कहकर खारिज कर दिया, वहीं भाजपा के नेताओं ने इसे एक राष्ट्रीय पार्टी के ‘उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार और विध्वंस’ पर ध्यान वापस लेकर आने वाला करार दिया।

पार्टी के लिए चिंता की एक वजह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राष्ट्रीय मंच पर बढ़ता कद भी है। नीतीश ने विधानसभा चुनाव में राजद और कांग्रेस के समर्थन के साथ अमित शाह और मोदी के नेतृत्व में बेहद आक्रामक रुख अपनाने वाली भाजपा की चुनौती को विफल कर दिया था।

नेशनल कान्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने पटना में कुमार के शपथग्रहण समारोह में खुले तौर पर यह सुझाव दिया था कि नीतीश को आज नहीं तो कल दिल्ली का रुख करना चाहिए और वर्ष 2019 में होने वाले अगले लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए एक संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार बनना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी विपक्षी नेतृत्व के मुद्दे को एक नया रुख देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस उनके पिता मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को उप प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार करती है तो समाजवादी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने के लिए तैयार है।

कांग्रेस ने इस सुझाव को खारिज कर दिया। पार्टी के नेताओं ने निजी तौर पर अखिलेश की इस टिप्पणी को ‘अपरिपक्व’ बताया। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि लोकसभा में महज पांच सांसदों वाली कोई पार्टी, जिसके प्रदर्शन में गिरावट आ रही है, वह प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार को इस तरह का प्रस्ताव देने का दुस्साहस कैसे कर सकती है?

संसद में ललित मोदी विवाद में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग के चलते मानसून सत्र एक तरह से बेकार चला गया। फिर भी संसद में कांग्रेस को कोई विशेष सफलता हासिल नहीं हुई। कांग्रेस व्यापमं मामले में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग कर रही थी।

शीतकालीन सत्र में कांग्रेस ने डीडीसीए के कथित घोटाले को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली के इस्तीफे की मांग की लेकिन सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया हासिल करने में वह विफल रही। वहीं हरियाणा में दो दलित बच्चों को कथित तौर पर जलाकर मार दिए जाने के बाद केंद्रीय मंत्री वी के सिंह के ‘कुत्ते’ वाले बयान पर भी कांग्रेस ने सिंह के इस्तीफे की मांग की लेकिन इस मांग को भी सरकार ने नजरअंदाज कर दिया।

‘असहिष्णुता’ और भाजपा के नेताओं के विवादास्पद बयानों के खिलाफ कांग्रेस का अभियान भी सरकार को किसी के खिलाफ कार्रवाई के लिए मजबूर नहीं कर सका। पार्टी में वापस जान आने के लिहाज से गुजरात से कांग्रेस के लिए खबर अच्छी रही। प्रधानमंत्री के गृह राज्य में कांग्रेस स्थानीय निकाय चुनावों में कई जिला पंचायतों में जीत हासिल करने में सफल रही, जिससे भाजपा को झटका लगा। कांग्रेस के महासचिव गुरुदास कामत ने कहा कि कांग्रेस ने स्थानीय चुनावों में 180 में से 120 सीटों पर बहुमत हासिल किया । गुजरात की तरह राजस्थान से भी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को कोई सीट हासिल नहीं हुई थी लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी अच्छे खासे वोट हासिल करने में सफल रही। वर्ष के समाप्ति के कगार पर पहुंचने पर, पार्टी भाजपा शासित झारखंड में लोहरदगा विधानसभा की सीट जीत गई।

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