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कांग्रेस के लिए खतरा बनी अंदरूनी गुटबाजी, 3 चुनावों में हारने के बाद तलाश रही Comeback

दिल्ली में अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के भीतर मची गुटबाजी पार्टी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

Author नई दिल्ली | March 26, 2016 4:34 AM
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा गुजरात विधानसभा चुनाव में विलंब करवाने का प्रयास कर रही है।

दिल्ली में अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के भीतर मची गुटबाजी पार्टी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। 15 साल तक लगातार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के पुराने समर्थक उनके बुलावे पर इकट्ठा होने को तैयार नहीं हैं। इतना ही नहीं, दो बार सांसद रहे उनके पुत्र संदीप दीक्षित को किसी बड़े आयोजन में याद तक नहीं किया जाता। सत्ता से बाहर होने के बाद दिल्ली की बागडोर पहले अरविंदर सिंह लवली को सौंपी गई और 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद अजय माकन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।

प्रदेश कांग्रेस के किसी भी कार्यक्रम में संदीप दीक्षित नहीं दिखे। हालांकि पिछले दिनों आयोजित श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम के खिलाफ हुए कांग्रेस के प्रदर्शन में पहली बार संदीप दीक्षित के साथ प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन शामिल हुए, लेकिन संदीप दीक्षित की ओर से 23 मार्च को सीबीडी मैदान में पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के कांग्रेस नेताओं के होली मिलन समाराह में ज्यादातर बड़े नेता गैरहाजिर रहे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित प्रदेश अध्यक्ष माकन भी कार्यक्रम में नहीं आए।

हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित इस आयोजन पर राजनीति होने से काफी नाराज हैं। उनका कहना है कि बड़ी तादाद में कांग्रेस नेता वहां जुटे। कुछ लोगों के न आने को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। शीला दीक्षित ने 1998 से जीत का जो सफर शुरू किया, वह लगातार रिकार्ड बनाता गया। पहले जो नेता उन्हें बाहरी बताकर नजरअंदाज करते थे वही उनके सामने दंडवत होने लगे। वे दिल्ली में कांग्रेस का चेहरा बनीं। 2004 में उनके नाम पर ही उनके पुत्र संदीप दीक्षित पूर्वी दिल्ली के सांसद बने।

परिसीमन के बाद जमना पार दो लोकसभा सीटों में बंटा तो पूर्वी दिल्ली सीट को उन्होंने अपनी सीट बनाई। इस इलाके को चुनने के पीछे वोट बैंक के अलावा मजबूत नेता भी कारण बने। लगातार 15 साल मंत्री रहे डॉ. अशोक कुमार वालिया, सालों मंत्री रहे अरविंदर सिंह लवली, डॉ. नरेंद्र नाथ, विधानसभा उपाध्यक्ष अंबरीश गौतम, कांग्रेस सचिव नसीब सिंह, लगातार चुनाव जीतने वाले ब्रह्म पाल जैसे दिग्गजों के अलावा ओखला जैसे अल्पसंख्यक मतदाताओं का गढ़ भी इसी लोकसभा क्षेत्र में था।

2013 में के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की आंधी ने कांग्रेस के किले को ढहाया तो 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के तूफान ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। फिलहाल कांग्रेस का वोट घटकर महज 9.7 फीसद रह गया है और उसके पास दिल्ली विधानसभा में एक भी प्रतिनिधि नहीं है।

2013 की हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष बने लवली ने पार्टी को खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके बावजूद 2015 के विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस के बजाए आप को वोट दिया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन और उनकी टीम पार्टी के परंपरागत वोटों को वापस लाने की कोशिश कर रही है, जिसका नतीजा 2017 के निगम चुनाव में दिख सकता है। वे दावा कर रहे हैं कि उन्होंने हर कांग्रेसी को जोड़ने का प्रयास किया है। आप सरकार के खिलाफ कांग्रेस जो मुद्दे उठा रही है उसमें सबसे प्रभावशाली यही है कि आप ने दिल्ली की विकास की रफ्तार को रोक दी है।

शीला दीक्षित के समर्थकों के मुताबिक, कांग्रेस के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों में वैसे तो सभी मंत्रियों की भागीदारी रही है, लेकिन नेतृत्व तो उन्हीं का था। वहीं, दीक्षित विरोधी खेमा मानता है कि अगर आखिरी टर्म में शीला के बजाए डॉ. वालिया, माकन या कोई और मुख्यमंत्री होता तो 2013 के चुनाव के नतीजे इतने खराब न होते।

अब दिल्ली कांग्रेस की बागडोर जिन लोगों के हाथों में है, वे किसी भी तरह से दीक्षित को महत्त्व देना नहीं चाहते। इसी का नतीजा है कि केजरीवाल सरकार के खिलाफ कांग्रेस के अभियान में शीला दीक्षित एक-दो बार ही दिखी हैं। संदीप दीक्षित तो दिल्ली की राजनीति के बजाए कांग्रेस के प्रवक्ताओं के पैनल में शामिल होकर राष्ट्रीय राजनीति करने लगे हैं।

शीला दीक्षित का ससुराल उत्तर प्रदेश में है और वे एक बार कन्नौज से सांसद भी रही हैं। इसलिए उनके उत्तर प्रदेश में फिर से सक्रिय होने की अफवाह भी उड़ाई जा रही है। इससे उनके समर्थक और विरोधी दोनों ही नाराज हैं। विरोधी कहते हैं कि जिन्होंने दिल्ली में पार्टी की दुर्गति कराई वे यूपी में कैसे जीत दिला सकेंगी। वहीं समर्थकों को लगता है कि दीक्षित के कार्यकाल में दिल्ली में जितने विकास कार्य हुए, वही कांग्रेस की वापसी का आधार बनेंगे। इस चक्कर में कांग्रेस की वापसी की कोशिश कमजोर होती दिख रही है। दिल्ली कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि निगम के आम चुनावों से पहले उप चुनावों के बहाने पार्टी को शक्ति प्रदर्शन का मौका मिले। उन्हें भरोसा है कि कांग्रेस की वापसी होगी, लेकिन पार्टी में मची अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी से तो इसकी उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

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