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लोकसभा में 44 पर सिमटने के बाद से 12 राज्‍यों के चुनाव हार चुकी है कांग्रेस, निकायों में भी नहीं मिली जीत

कांग्रेस के लिए एकमात्र खुशखबरी पंजाब से है जहां पर वह 10 साल बाद सत्‍ता में वापस आई है।

कांग्रेस साल 2014 के लोकसभा चुनावों में सिमटने के बाद से सत्‍ता गंवाती जा रही है।

पांच राज्‍यों के चुनाव नतीजों में कांग्रेस के हाथ एक बार फिर से निराशा हाथ लगी है। उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में भाजपा ने भारी भरकम बहुमत के साथ जीत दर्ज की है। वहीं गोवा और मणिपुर में नंबर दो पार्टी रहने के बावजूद वह सरकार बनाने जा रही है। कांग्रेस के लिए एकमात्र खुशखबरी पंजाब से है जहां पर वह 10 साल बाद सत्‍ता में वापस आई है। इन चुनावों के नतीजों के बाद कांग्रेस में एक बार फिर से बदलाव की आवाजें उठने लगी है। लेकिन कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी इससे बेअसर हैं। नतीजों के तीन दिन बाद मीडिया के सामने आए राहुल ने कहा कि हर एक पार्टी में अच्छे और बुरे दिन आते हैं। यूपी में उनकी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा और वह इस बात को कबूल करते हैं। लेकिन यहां पर करारी हार के लिए उन्‍होंने ध्रुवीकरण को कारण बताया। बता दें कि यूपी में कांग्रेस को केवल सात सीटें मिली हैं। यह हाल तो तब है जब उसने समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ा था।

कांग्रेस साल 2014 के लोकसभा चुनावों में सिमटने के बाद से सत्‍ता गंवाती जा रही है। उसने इन चुनावों के बाद हुए बड़े राज्‍यों के विधानसभा चुनाव में हार का सामना किया है। ढाई साल में कांग्रेस महाराष्‍ट्र, हरियाणा, असम जैसे गढ़ भाजपा के हाथों हार चुकी है। झारखंड, जम्‍मू कश्‍मीर, केरल, दिल्‍ली, उत्‍तराखंड जैसे राज्‍य उसके हाथ से फिसल गए। अरुणाचल प्रदेश में बगावत ने उसकी सत्‍ता छीन ली। बिहार में वह जेडीयू और राजद के साथ छोटी साझेदारी बनकर सत्‍ता में आई है। हालांकि पुदुचेरी में जरूर उसे कामयाबी मिली। लेकिन तमिलनाडु, उत्‍तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्‍य जो कई दशकों से उसकी पकड़ से बाहर थे वे उससे दूर ही रहे।

अब मणिपुर भी उसके हाथ से निकल रहा है। हालांकि यहां और गोवा में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन भाजपा ने दूसरी पार्टियों से संपर्क कर सरकार बनाने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। ओडिशा, महाराष्‍ट्र, हरियाणा के पंचायत और नगर निकायों में भी कांग्रेस को शिकस्‍त ही मिली। ओडिशा में तो पंचायत चुनावों में वह मुख्‍य विपक्षी दल का दर्जा भी भाजपा के हाथों गंवा बैठी। देश की सबसे बड़ी नगरीय निकाय संस्‍था बृहन्‍मुंबई महानगरपालिका में शिवसेना-भाजपा की आपसी लड़ार्इ के बावजूद वह चौथे पायदान पर रही है। उसकी रणनीति भी समझ से परे है। केरल में वह लेफ्ट के खिलाफ लड़ रही थी तो बंगाल में उसके साथ मिलकर ममता बनर्जी के खिलाफ मैदान में उतरी थी।

दिल्‍ली में 15 साल तक सत्‍ता में रहने के बाद अब हालत यह है कि उसका एक भी विधायक या सांसद नहीं है। पार्टी के वरिष्‍ठ नेता बदलाव की बात तो करते हैं लेकिन राहुल गांधी और सोनिया गांधी का बचाव कर लेते हैं। इस साल अब गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं। गुजरात में कांग्रेस 20 साल से सत्‍ता बाहर है। वहीं हिमाचल प्रदेश में उसके सामने सत्‍ता बचाने की लड़ाई होगी।

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