केरल में लेफ्ट गठबंधन को चुनाव हराकर सत्ता में आए यूडीएफ के दो सबसे बड़े घटक दलों के बीच खींचतान खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। कांग्रेस नीत यूडीएफ ने राज्य चुनाव में 102 सीटों पर जीत हासिल करके पूर्ण बहुमत हासिल किया मगर मुख्यमंत्री के नाम पर पार्टी में शक्ति परीक्षण होने लगा। यह मामला पार्टी के अन्दर तक सीमित रहता तो सामान्य लगता मगर कांग्रेस की सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने वीके सतीशन के पक्ष में झण्डा उठाकर मामले को नया रुख दे दिया। कांग्रेस आलाकमान ने जब सतीशन के नाम की घोषणा की तो कई विश्लेषकों ने इसके पीछे मुस्लिम लीग के दबाव को एक वजह माना। सीएम के चेहरे के साथ ही एक अन्य मुद्दे पर मुस्लिम लीग कांग्रेस को धर्म-संकट में डाल चुकी है।
चुनाव परिणाम आने के बाद, मुख्यमंत्री के नाम पर फैसला होने से पहले ही मुस्लिम लीग ने राज्य के शिक्षा मंत्रालय पर अपना दावा ठोक दिया। मुस्लिम लीग के नेता खुलकर कह रहे हैं कि शिक्षा मंत्रालय उन्हीं के पास रहेगा। केरल के शिक्षा मंत्रालय पर मुस्लिम लीग का नियंत्रण नई बात नहीं है। पहली बार 1967 में मुस्लिम लीग के सी.एच. मोहम्मद कोया लेफ्ट फ्रंट नीत गठबंधन सरकार में राज्य के शिक्षा मंत्री बने थे। तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह मंत्रालय दशकों तक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के पास बना रहेगा।
बदलते राजनीतिक गठबंधनों और वैचारिक संघर्षों के बावजूद, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने शिक्षा विभाग के साथ अपना मजबूत संबंध बनाए रखा है और केरल के शैक्षिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन साथ ही उसे राजनीतिक विरोधियों की आलोचनाओं का भी सामना किया है। इस बार भी चुनाव परिणाम आने के बाद जब मुस्लिम लीग ने शिक्षा मंत्रालय पर दावा किया तो भाजपा नेता और नवनिर्वाचित विधायक वी. मुरलीधरन ने कांग्रेस से आग्रह किया है कि वह इस विभाग को मुस्लिम लीग को न सौंपे। वहीं केरल के सभी मौलानाओं के संगठन ‘समस्त केरल जमाएतुल उलमा’ ने मुस्लिम लीग के दावे का समर्थन किया है।
संभावित मंत्री पद के उम्मीदवार और मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता के.एम. शाजी ने 8 मई को कहा था कि लीग इस पोर्टफोलियो पर कोई समझौता नहीं करेगी और सामान्य शिक्षा और उच्च शिक्षा विभागों को एक शक्तिशाली पोर्टफोलियो में विलय करने की योजना बना रही है।
ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि कांग्रेस इस बार शिक्षा विभाग को किसी अन्य महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो के बदले में वापस लेने पर विचार कर रही है। इसी बहस के बीच, भाजपा नेता और नव निर्वाचित कझाकूट्टम विधायक वी मुरलीधरन ने आईयूएमएल पर तीखा हमला करते हुए चेतावनी दी कि शिक्षा विभाग को लीग को सौंपने के दूरगामी परिणाम होंगे और इस क्षेत्र में सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, शाजी ने दावा किया कि मुरलीधरन की टिप्पणियों ने यूडीएफ के भीतर लीग की स्थिति को और मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि मुरलीधरन अब वही भूमिका निभा रहे हैं जो कभी वेल्लापल्ली नटेसन ने निभाई थी। जब भी नटेसन ने हम पर राजनीतिक हमले किए, उससे हम जनता के और करीब आए। मुरलीधरन भी उसी राह पर चल रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि अगर कांग्रेस के मन में विभाग को अपने हाथ में लेने का कोई विचार भी था, तो उनके बयान के बाद वे इस पर पुनर्विचार करेंगे। दरअसल, हमने पहले ही तय कर लिया था कि शिक्षा मंत्रालय का हस्तांतरण कांग्रेस के साथ नहीं किया जाएगा। एलडीएफ सरकार के विपरीत, हम इस कार्यकाल में सामान्य शिक्षा और उच्च शिक्षा विभागों को एक ही मंत्रालय के अधीन लाने की योजना बना रहे हैं।
शाजी ने जोर देकर कहा कि पांच से कम मंत्री पद स्वीकार करने का तो सवाल ही नहीं उठता। बता दें, यूडीएफ के गठन के बाद से शिक्षा विभाग ऐतिहासिक रूप से आईयूएमएल का पर्याय रहा है।
हालांकि, यह बहस महज़ एक नियमित मंत्रिमंडल वार्ता से कहीं ज्यादा है और यह शिक्षा मंत्रालय के राजनीतिक महत्व को रेखांकित करती है, जिसे 2016 में सामान्य शिक्षा और उच्च शिक्षा में विभाजित किया गया था और यह भी कि क्या यूडीएफ इस विभाग को मुस्लिम लीग को सौंपने की अपनी दीर्घकालिक परंपरा को जारी रखेगा।
यूडीएफ सरकारों के हर कार्यकाल में जब इंडियन यूनियन मुस्लिम ने शिक्षा मंत्रालय संभाला। तब विपक्ष ने कुप्रबंधन के आरोप लगाए और विभाग को लेकर कई विवाद उत्पन्न हुए। हालांकि, मुस्लिम लीग नेतृत्व ने लगातार स्थिति पर अपना नियंत्रण बनाए रखा और राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से संकटों से निपटने में सफलता हासिल की।
सी.एच. मोहम्मद कोया ने सबसे पहले 1967 से 1973 तक ई.एम.एस. नंबूदिरिपाद और सी. अच्युत मेनन की सरकारों में शिक्षा मंत्रालय संभाला। उनके बाद चक्कीरी अहमद कुट्टी ने 1973 से 1977 तक शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। मोहम्मद कोया ने मार्च 1977 से जनवरी 1978 तक के. करुणाकरण और ए.के. एंटनी की सरकारों में फिर से यह मंत्रालय संभाला। जनवरी 1978 से अक्टूबर 1978 के कुछ समय के लिए यू.ए. बीरन ने शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद में मोहम्मद कोया मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सरकार में अक्टूबर 1979 से दिसंबर 1979 तक इस विभाग में वापस लौटे।
लंबे अंतराल के बाद ईटी मोहम्मद बशीर ने 1991 से 1996 तक के करुणाकरण और एके एंटनी की सरकारों में और फिर 2004 से 2006 तक ओमन चांडी के नेतृत्व में शिक्षा मंत्रालय संभाला। नलकथ सूपी ने एके एंटनी के शासनकाल में 2001 से 2004 तक शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। ओमन चांडी के नेतृत्व वाली पिछली यूडीएफ सरकार में पीके अब्दुल रब्ब ने 2011 से 2016 तक शिक्षा मंत्रालय संभाला।
आईयूएमएल के शिक्षा मंत्री से जुड़े सबसे शुरुआती और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विवादों में से एक मोहम्मद कोया के कार्यकाल के दौरान 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक के आरंभिक वर्षों में सामने आया। वामपंथी दलों के आलोचकों ने मुस्लिम लीग पर शिक्षा विभाग के माध्यम से अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर अपना प्रभाव मजबूत करने की कोशिश करने का आरोप लगाया, जबकि लीग ने अल्पसंख्यक अधिकारों के संरक्षण के रूप में अपनी भूमिका का बचाव किया।
माना जाता है कि जोसेफ मुंडासेरी के बाद, सी.एच. मोहम्मद कोया केरल के सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मंत्री रहे हैं। उनके कार्यकाल में ही कालीकट विश्वविद्यालय और कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी। शिक्षा मंत्री के रूप में उनके प्रदर्शन से विपक्षी दल भी प्रभावित थे।
केरल में 1990 के दशक के मध्य में जब ईटी मोहम्मद बशीर शिक्षा मंत्री थे। तब जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी) शुरू किया गया था। जिसने शिक्षक संगठनों, वामपंथी दलों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के कुछ वर्गों से व्यापक विरोध को जन्म दिया था। आलोचकों का आरोप था कि विश्व बैंक समर्थित यह कार्यक्रम प्राथमिक शिक्षा का “भगवाकरण” और “व्यावसायीकरण” करेगा, सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को कमजोर करेगा और गतिविधि-आधारित शिक्षण सुधारों के माध्यम से मलयालम माध्यम की शिक्षा को कमज़ोर करेगा।
सीपीएम के नेतृत्व वाले विपक्ष और शिक्षक संघों ने राज्यव्यापी आंदोलन किए, जबकि सरकार ने डीपीईपी का बचाव करते हुए इसे प्राथमिक शिक्षा में सुधार और स्कूल छोड़ने वालों की संख्या कम करने के उद्देश्य से एक आधुनिकीकरण पहल बताया। यह विवाद उस दशक में केरल में शिक्षा नीति को लेकर सबसे बड़े राजनीतिक टकरावों में से एक बन गया।
यह अवधि यूडीएफ सरकार की स्व-वित्तपोषित शिक्षा नीति, विशेष रूप से व्यावसायिक शिक्षा में निजी भागीदारी बढ़ाने के कदम के खिलाफ तीव्र विरोध प्रदर्शनों के साथ मेल खाती है। यह आंदोलन 25 नवंबर, 1994 को कुख्यात कुथुपरम्बा पुलिस गोलीबारी में चरम पर पहुंच गया।
एक और विवादास्पद दौर 2011 से 2016 के बीच ओमन चांडी के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार में पी.के. अब्दु रब के कार्यकाल के दौरान आया। स्कूल यूनिफॉर्म नियमों में सुधार लाने के उनके फैसले ने राजनीतिक बहस छेड़ दी और विरोधियों ने उन पर ‘सांप्रदायिकरण’ के आरोप लगाए।
स्कूल की पाठ्यपुस्तकों के संशोधन से जुड़े विवाद के दौरान भी रब्ब पर हमले हुए। जिसमें सीपीएम और भाजपा ने सरकार पर पाठ्यक्रम संबंधी मामलों में राजनीतिक और धार्मिक प्रभाव डालने का आरोप लगाया। उनके कार्यकाल का एक और मुद्दा गैर-सरकारी और सरकारी स्कूलों की स्वीकृति और विनियमन था। विशेष रूप से यह आरोप कि नए संस्थानों की स्वीकृति में राजनीतिक विचारों का प्रभाव था। आलोचनाओं के बावजूद, आईयूएमएल ने अपने मंत्रियों का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने शिक्षा तक पहुंच का विस्तार किया और अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों की रक्षा की।
हालांकि अब एक बार फिर से शिक्षा मंत्री के पद को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई और इंडियन मुस्लिम इसको अपने पास रखना चाहता है, लेकिन बीजेपी ने इसको लेकर कांग्रेस से अपील की है कि यह मंत्रालय मुस्लिम लीग को न दिया जाए। लेकिन शिक्षा मंत्रालय को लेकर अंतिम फैसला केरल के अगले मुख्यमंत्री का नाम फाइनल और शपथ ग्रहण के बाद ही साफ हो सकेगा। लेकिन मंत्री पद के उम्मीदवारों और विभागों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
कानून के पेशे से राजनीति तक…जानिए कौन हैं केरल के अगले मुख्यमंत्री वीडी सतीशन
गुरुवार को कांग्रेस ने आखिरकार केरल के राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में वीडी सतीशन के नाम की घोषणा कर दी। कांग्रेस को मुख्यमंत्री के नाम को तय करने में 10 दिन का लम्बा वक्त लगा। हालांकि, मुख्यमंत्री पद की दौड़ में केसी वेणुगोपाल का नाम भी शामिल था। वेणुगोपाल को राहुल का करीबी माना जाता है, लेकिन वह मुख्यमंत्री की कुर्सी से वंचित रह गए और सतीशन ने बाजी मार ली। पढ़ें पूरी खबर।
