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कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता एनडी तिवारी का निधन, आज के दिन हुआ था उनका जन्‍म

ND Tiwari: उत्तराखंड के विकास पुरुष नारायण दत्त तिवारी ने आज दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में आखिरी सांस ली। एनडी के निधन से राजनीति पार्टियों में शोक की लहर दौड़ गई।

एनडी तिवारी का निधन। (Express File photo by Vishal Srivastav)

उत्तराखंड के विकास पुरुष नारायण दत्त तिवारी ने आज दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में आखिरी सांस ली। 93 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। सबसे खास बात यह है कि आज ही के दिन उनका जन्मदिन भी था। 18 अक्टूबर 1925 को उनका जन्म हुआ था और 18 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हुआ। वे करीब एक साल से बीमार चल रहे थे। एनडी के निधन से राजनीति पार्टियों में शोक की लहर दौड़ गई। नारायण दत्त तिवारी देश के पहले ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिन्हें दो-दो राज्य का मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ। वह नेहरू-गांधी के दौर के उन चंद दुर्लभ नेताओं में थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में सक्रिय योगदान दिया। केंद्र में वित्त, विदेश, उद्योग, श्रम सरीखे अहम मंत्रालयों की कमान संभाल चुके एनडी को जब उत्तराखंड सरीखे छोटे राज्य की कमान सौंपी गई तो उत्तराखंड की आंदोलनकारी शक्तियां असहज और स्तब्ध थी।

एनडी तिवारी के निधन पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने शोक जताया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “वरिष्ठ राजनेता श्री नारायण दत्त तिवारी जी के निधन का दु:खद समाचार प्राप्त हुआ। तिवारी जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, वह तीन बार उत्तर प्रदेश के और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे। उनका निधन भारतीय राजनीति के लिए एक अपूर्णीय क्षति है। मैं नारायण दत्त तिवारी जी के परिवार व प्रियजनों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं और ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं। ऊँ शांति शांति शांति।”

सियासी जानकारों की मानें तो असहज तो एनडी तिवारी भी थे, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी से चंद कदम फासले से एकाएक सुदूर उत्तराखंड भेज दिए गए थे। एनडी को कांग्रेस हाईकमान ने उसी राज्य का मुखिया बना दिया था। मगर पांच साल के शासन के बाद एनडी को आंध्रप्रदेश में राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया। जानकारों की मानें तो जाने से पहले एनडी उत्तराखंड में अवस्थापना विकास और उद्योग की जो आधारशिला रख गए थे, उस पर ये नवोदित राज्य आज मजबूती से खड़ा होने लायक बन पाया है। उनके अनुयायियों ने एनडी के लिए विकास पुरुष की उपमा गढ़ी। मगर उनके पक्ष और विपक्ष में बैठे प्रतिद्वंद्वी भी उत्तराखंड के विकास में एनडी के योगदान की दाद देते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद एनडी ने अपने केंद्रीय रिश्तों के दम पर निवेशकों को उत्तराखंड आने को विवश किया। राजमार्गों और सर्किल मार्गों को रिकार्ड समय में तैयार कराया। नये राज्य की तरक्की उनके विजन से ही उनके उत्तराधिकारी आगे की राह तैयार करते आए हैं।

वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता एनडी तिवारी का विवादों से भी नाता रहा। वह चाहे हैदराबाद में राज्यपाल के तौर पर कार्यकाल, उनके जैविक पुत्र का मामला हो या फिर अपने बनाए ही मेडिकल कालेज के गेट पर धरना देना हो। उनका अपनों और विरोधियों के बीच शीत युद्ध चलता रहा, जो किसी न किसी विवाद के रूप में सामने आता रहा। हालांकि यह बात सही है कि उनके विरोधी भी उनके तमाम विवादों के बाद भी उनके कौशल और विजन के मुरीद रहे। यूपी से अलग हुए कर उत्तराखंड बनने की बात हो रही थी, तो एनडी तिवारी ने बयान दिया था कि उनकी लाश पर उत्तराखंड बनेगा। पर समय का चक्र ऐसे घूमा कि उनको उत्तराखंड के सीएम की जिम्मेदारी मिल गई।

उस वक्त उन्होंने लाल बत्ती जमकर लुटाई। इसके पीछे उनकी कुर्सी बचाने की चाहत भी कही जाती रही। इसे लेकर एक चर्चित लोकगीत भी बना था। सत्ता के गलियारों में यूपी जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री रह चुकने के बाद उत्तराखंड का सीएम की कुर्सी पर बैठने के पीछे क्या कारण रहे? उसके खूब कयास लगाए गए। बाद में चर्चा हुई कि कांग्रेस हाईकमान उनको राष्ट्रपति की जिम्मेदारी सौंप सकता है, पर उनको आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। वहां पर विवाद प्रकरण आने के बाद राज्यपाल के पद को अलविदा कहना पड़ा। इसके अलावा जैविक पुत्र का मामला कोर्ट तक पहुंचा। यह प्रकरण लंबा खींचा। बाद में 2014 में एनडी तिवारी ने रोहित शेखर तिवारी को अपना बेटा माना।

सपा से नजदीकी और भाजपा को समर्थन
एनडी तिवारी खांटी कांग्रेसी रहे, पर उनके राजनैतिक संपर्क और नजदीकियों को लेकर सवाल रहा। यूपी प्रवास के दौरान वह समाजवादी पार्टी के करीब रहे। उनके बेटे को तत्कालीन सपा सरकार ने एक ओहदा के साथ तमाम सुविधाएं प्रदान की। मुलायम यादव और अखिलेश के विवाद में उन्होंने हस्तक्षेप किया था और बाकायदा मुलायम को पत्र लिखते हुए अखिलेश का आशीर्वाद देने की सलाह दी थी।

एनडी भले यूपी में सपा के रंग में दिखते हो, इसके बाद वह जैसे ही यूपी सीमा खत्म होते ही उत्तराखंड की सीमा में पहुंचते कांग्रेस के नजदीक आ जाते। तमाम कांग्रेस के आला नेता उनके आसपास डेरा डाले रहते। इस 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को समर्थन देने पहुंचे और दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात तक भी की। इस राजनैतिक यू टर्न को लेकर भी तरह-तरह की चर्चा रही।

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