असम, केरल में हार, बंगाल और तमिलनाडु में कोई फायदा नहीं: कांग्रेस के लिए इन नतीजों के क्या हैं मायने - Jansatta
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असम, केरल में हार, बंगाल और तमिलनाडु में कोई फायदा नहीं: कांग्रेस के लिए इन नतीजों के क्या हैं मायने

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने हार मान ली है मगर सवाल यह है कि क्या वो इस बुजुर्ग पार्टी को चुनाव के दौरान पूरी तरह बदल सकते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी।

असम और केरल में सत्ता से बेदखली, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी कोई पकड़ नहीं। भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी को अब ये एहसास हो रहा है कि वो धीरे—धीरे भारतीय राजनीति में हाशिए पर जा रही है। इससे पार्टी के भीतर से ही नए राजनैतिक विचारों की मांग उठ सकती है जैसे प्रियंका गांधी को पार्टी में कोई जिम्मेदारी सौंपी जाए। घटिया प्रदर्शन के बाद एक बहस यह भी शुरू होगी कि क्या कांग्रेस 2019 में बीजेपी और नरेंद्र मोदी को रोक सकेगी, वो भी ऐसे दौर में जब नीतीश कुमार या ममता बनर्जी की अगुवाई में तीसरा मोर्चा सिर उठाने को तैयार है।

कांग्रेस अब सिर्फ पांच छोटे राज्यों और कर्नाटक में ही सत्ता में है। इसका मतलब देश की सिर्फ 6 प्रतिशत जनसंख्या पर ही कांग्रेस राज करती है, जो कि अभूतपूर्व है। कांग्रेस इतना नीचे कभी नहीं गिरी थी, अब शायद पार्टी के भीतर से  राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंप देने की मांग होगी। कांग्रेस के लिए सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि केरल में पार्टी की रीढ़ माना जाने वाला अल्पसंख्यक वर्ग भी बीजेपी के आक्रामक चुनाव प्रचार की वजह से लेफ्ट की ओर चला गया है। अल्पसंख्यकों ने शायद यह सोचा कि बीजेपी को रोकने में लेफ्ट कांग्रेस से ज्यादा कारगर साबित होगा। अगर बीजेपी बढ़त बनाती तो सीपीएम के हिंदू वोट बैंक में सेंध लगाकर कांग्रेस की मदद करती और कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूती मिलती।

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केरल में एक ओर जहां मुस्लिम लीग और केरल कांग्रेस ने अपनी स्थिति बरकरार रखी है, वहीं कांग्रेस ने कई सारी सीटें गंवा दीं। उसके कई मंत्रियों को चुनाव में जनता ने धूल चटा दी। सत्ताधारी कांग्रेस को असम और केरल में सरकार जाने का अंदाजा तो था, लेकिन बंगाल और तमिलनाडु में भी पार्टी को फायदा ना होने से सारा खेल बिगड़ गया। जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में थी, वहां सत्ताविरोधी लहर ने उसे डुबो दिया। लेकिन तमिलनाडु और बंगाल में सत्ताविरोधी लहर नहीं दिखी।

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असम में पार्टी की चुनावी रणनीति ही सवालों के घेरे में रही है। पार्टी ने अपना चेहरा नहीं बदला। गोगोई पिछले 15 साल से राज्य की सत्ता संभाले हुए थे, मगर इस दौरान कांग्रेस कोई गठबंधन नहीं बना पाई। ना ही कांग्रेस बोडो पार्टी, बीपीएफ को बीजेपी तक जाने से रोक सकी। एक बड़ी वजह बना कांग्रेस के मुख्य रणनीतिकार हेमंत बिस्त्र सर्मा का बीजेपी में चले जाना। पार्टी के कई लोगों का मानना है कि अगर कांग्रेस ने 2014 के बाद असम में अपना नेता बदल लिया होता तो हालात दूसरे होते। उनका ये भी मानना है कि अब हाई कमान को संभलने की जरूरत है क्योंकि पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अगले साल चुनाव होने हैं।

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