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2019 की हार पर गुस्‍साईं प्रियंका गांधी, 1977 की पराजय पर इंदिरा ने ऐसे भरा था कांग्रेसियों में जोश

दिसंबर 1978 में जब जनता पार्टी की सरकार ने दोबारा इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी करवाई तब देशभर में कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए थे। इंदिरा गांधी ने बहुत कम समय में ही पार्टी में नया जोश भर दिया था।

Author नई दिल्ली | June 14, 2019 3:32 PM
भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। (फोटो- एक्सप्रेस आर्काइव)

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पुश्तैनी सीट अमेठी से हार का सामना करना पड़ा। इससे उनकी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी न केवल गुस्सा हो गईं बल्कि उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को बुरी तरह फटकार भी लगाई। 1977 के लोकसभा चुनाव में भी अमेठी से कांग्रेस उम्मीदवार और तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी को हार का मुंह देखना पड़ा था। तब इंदिरा हार से नहीं बौखलाई थीं बल्कि उन्होंने धैर्य से काम लेते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा था। इसी का नतीजा था कि 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी दोबारा सत्ता में लौटने में कामयाब रही थी। तब इंदिरा गांधी ने हताश कार्यकर्ताओं को नया सपना दिखाया था। उन्होंने सभाओं में कहा था, “मैं एक प्रैक्टिकल इंसान हूं, मैं प्रैक्टिकल हूं क्योंकि सपनों को हकीकत में बदलना चाहती हूं। मैं नहीं समझती कि हम सपनों के बिना रह सकते हैं।”

1977 में हारने के बाद इंदिरा गांधी को डर था कि जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार उनके और संजय गांधी के खिलाफ राजनीतिक द्वेष के तहत कार्रवाई कर सकती है और जेल में डाल सकती है। इंदिरा गांधी की दोस्त पुपुल जयकर ने इंदिरा के इस डर का जिक्र अपनी किताब ‘इंदिरा: ऐन इंटिमेट बायोग्राफी’ में किया है। किताब के मुताबिक इंदिरा को डर था कि आपातकाल के दौरान संजय द्वारा की गई जबरन नसबंदी की चपेट में आए लोग कहीं जबरन संजय की नसबंदी न कर दें। ये डर इसलिए घर कर रहा था क्योंकि जनता पार्टी की जीत के बाद यह चर्चा हो रही थी कि संजय गांधी को पकड़कर सरेआम नसंबदी करवा दिया जाय। हालांकि, इंदिरा गांधी की यह आशंका गलत निकली लेकिन इंदिरा गांधी का एक डर सच साबित हो गया। मोरारजी देसाई की सरकार ने 3 अक्टूबर 1977 को इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करवा दिया। उनके साथ चार पूर्व केंद्रीय मंत्रियों की भी गिरफ्तारी हुई थी। उन नेताओं में एच आर गोखले, डीपी चट्टोपाध्याय, पी सी सेठी और के डी मालवीय शामिल थे।

इंदिरा गांधी पर 1977 के चुनाव में दो कंपनियों से जबरन 104 जीप लेने का आरोप था। इसके अलावा फ्रांस की एक कंपनी को 1.34 करोड़ डॉलर के पेट्रोलियम ठेके देने में गड़बड़ी करने के आरोप भी लगाए गए थे। तब इंदिरा की गिरफ्तारी पर कांग्रेस के करीब एक हजार कार्यकर्ता उनके आवास पर जमा हो गए थे। पार्टी के ये कार्यकर्ता इंदिरा गांधी के पक्ष में नारेबाजी कर रहे थे, “लाठी गोली खाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे, जेल हम जाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे।” कार्यकर्ताओं का जोश देख इंदिरा गांधी में नई हिम्मत आ गई थी और उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर नई रणनीति बनाई थी। कार्यकर्ताओं के इस जोश को देखकर इंदिरा को आभास हो गया था कि उनकी राजनीतिक वापसी होगी और उसके खेवनहार कार्यकर्ता ही बनेंगे। लिहाजा, इंदिरा गांधी ने कार्यकर्ताओं से भावनात्मक जुड़ाव जारी रखा। इंदिरा को कोर्ट ने अगले ही दिन बिना शर्त जमानत दे दी थी। इससे कांग्रेस पार्टी और उत्साहित हो उठी थी। रिहाई के बाद इंदिरा सीधे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच जा पहुंची थीं।

दिसंबर 1978 में जब जनता पार्टी की सरकार ने दोबारा इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी करवाई तब देशभर में कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए थे। इंदिरा गांधी ने बहुत कम समय में ही पार्टी में नया जोश भर दिया था। पांच दिन बाद कोर्ट ने इंदिरा गांधी को जमानत पर रिहा कर दिया था। उसके बाद से लगातार वो संगठन को मजबूत करती चली गईं। उन्होंने दलितों को भी अपने साथ किया और 1977 का चुनाव हारने के पांच महीने बाद ही अगस्त 1977 में बिहार में बेलछी नरसंहार के बाद वो हाथी पर चढ़कर दलितों के गांव बेलछी पहुंची थीं। दलितों के बीच इसका अलग संदेश गया और वो कांग्रेस पार्टी से जुड़ा महसूस करने लगे थे। मौजूदा दौर में भी कांग्रेस के सामने संगठन को मजबूत करने और आम कार्यकर्ताओं के बीच पैठ बनाने की अहम जरूरत है।

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