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कांग्रेस और आप की सर्वेक्षणों ने उड़ाई नींद

मनोज मिश्र नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने के पहले ही तेज हुई राजनीतिक सरगर्मियों के बीच दनादन हो रहे सर्वेक्षणों ने आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस नेताओं की नींद उड़ा दी है। आलम यह है कि सत्ता में आने का दावा कांग्रेस भी कर रही है लेकिन उसके ज्यादातर नेता […]

Author November 13, 2014 09:49 am
AAP Crisis: यादव और भूषण को आप की राजनीतिक मामलों की समिति से निकाले जाने के बाद विश्वास में कमी आई थी।

मनोज मिश्र

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने के पहले ही तेज हुई राजनीतिक सरगर्मियों के बीच दनादन हो रहे सर्वेक्षणों ने आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस नेताओं की नींद उड़ा दी है। आलम यह है कि सत्ता में आने का दावा कांग्रेस भी कर रही है लेकिन उसके ज्यादातर नेता यही मान रहे हैं कि उनकी सीटें इस बार बढ़ेंगी और इस बार वह सत्ता की दौड़ में नहीं हैं। आप के लिए तो यह चुनाव जीवन-मरण का होने वाला है। आप नेता अरविंद केजरीवाल के मुकाबले भाजपा और कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है।

पिछली बार भाजपा के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार हर्षवर्धन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में छोटा विभाग मिलने के कारण उनको फिर से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने की चर्चा चल पड़ी है हालांकि भाजपा ने हर स्तर पर महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह बिना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किए केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर रखी है। इससे आप के समीकरण बिगड़ने लगे हैं वे इसे प्रचारित करते रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को जो युवा और मध्यम वर्ग के अतिरिक्त 13 फीसद वोट मिले उनमें से काफी विधानसभा चुनाव में आप को मिलेंगे। ऐसा न होने पर आप का समीकरण चुनाव जीतने लायक नहीं बन पाएगा।

इस साल मई में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाशिए पर जाने के कारण अल्पसंख्यक वोट एक तरफा आप को मिले बावजूद इसके उसके वोट महज तीन फीसद ही बढ़े। जबकि दिल्ली के 15 फीसद अल्पसंख्यक मतदाताओं में से करीब 10 से 12 फीसद ने मतदान किया था। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सभी सातें सीटें जीतीं, उसे 70 में से 60 सीटों पर बढ़त मिली थी। दस सीटों पर आप नंबर एक थी लेकिन उसमें वही सीटें हैं, जहां अल्पसंख्यक बड़ी तादाद में हैं। उनके वोट तो ज्यादातर इसलिए मिले कि दिल्ली में भाजपा से आप ही मुकाबले में थी। उसे भले ही कोई लोकसभा सीट नहीं मिली, पर वह सातों सीटों पर नंबर दो रही। चौंकाने वाले तथ्य यह हैं कि उस चुनाव में केजरीवाल समेत सभी मंत्री, बड़े नेता अपनी सीट से पीछे रहे और हार का अंतर भी काफी बड़ा था। 35 सीटों पर आप को विधानसभा चुनाव से कम और 35 पर ज्यादा वोट मिले हैं। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि उन्हें जहां बढ़त मिली वह तो मामूली है, वे बड़े अंतर से 35 सीटों पर पीछे हैं। उनमें 23 सीटें ऐसी हैं जिन पर आप के उम्मीदवार विधानसभा चुनाव जीते थे। इतना ही नहीं आप को उन सीटों पर ही विधानसभा से ज्यादा वोट मिले हैं, जहां अल्पसंख्यक बड़ी तादाद में हैं।

यह सही है कि आप के टिकट पर पिछले विधानसभा चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर नेता कांग्रेस और भाजपा से ही पहले किसी न किसी रूप से जुड़े रहे हैं और वे कोई जनाधार के नेता नहीं रहे हैं। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया जैसे गिनती के नेता की पहचान चुनाव से पहले इलाके या दिल्ली में थी। आज भी वास्तव में इनके अलावा 49 दिन की सरकार के मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और विभिन्न विवादों में आने वाले विधायकों के अलावा आधे से अधिक विधायक साल भर में भी अपनी अलग पहचान नहीं बना पाए। जाहिर है जब चुनाव जीतने के लिए वह सब करना पड़ेगा जो भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवार करते हैं तब आप के कई विधायक चुनाव लड़ने से डरेंगे ही। इसके साथ ही पिछले पांच-छह महीने आप या कांग्रेस के वे विधायक, जो पार्टी से अलग दिल्ली में जोड़-तोड़ से सरकार बनवाने में लगे हुए थे, उनके टिकटों पर भी कांग्रेस और आप तलवार चला सकती है। इसकी संभावना ज्यादा है कि चुनाव की घोषणा के बाद आसानी से भाजपा में आए किसी आप नेता को भाजपा टिकट तो नहीं देगी। लेकिन आप के नेताओं के भाजपा में आने से उसे दूसरे तरह का लाभ होगा।

दिल्ली में अमूनन कांग्रेस और भाजपा में सीधी लड़ाई होती रही है। भाजपा के वोटरों का औसत पिछले कई चुनावों में 37 फीसद पार नहीं कर रहा है। इसका ही लाभ कांग्रेस को मिलता रहा कि वह सरकार बनाती रही। जब भी गैर भाजपा वोटों का विभाजन हुआ भाजपा सत्ता में आई। दिल्ली में 1993 में विधानसभा बनने के बाद पांच विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं। पहले चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा जनता दल (जद) मजबूती से चुनाव लड़ रहा था। उसे दिल्ली के अल्पसंख्यकों ने एक तरफा वोट दिया। उसे चार सीटें मिलीं। जद की दिल्ली की आधी सीटों पर अच्छी मौजूदगी के चलते भाजपा चुनाव जीत गई। उसे करीब 43 फीसद वोट मिले। उसके बाद लगातार तीन चुनावों में भाजपा और कांग्रेस में सीधा मुकाबला ही होता रहा और भाजपा का वोट 37 फीसद नहीं पार किया। इतना ही नहीं इस दौरान तीन बार नगर निगम चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा का वोट 37 फीसद से नहीं बढ़ा। कांग्रेस को 1998 में 47.76, 2003 में 48.13 और 2008 में 39.88 फीसद वोट मिले और कांग्रेस की सरकार बनी। वोट बंटवारे का लाभ 2013 के विधान सभा चुनाव में दिखा जब भाजपा करीब 34 फीसद वोट लाकर नंबर एक पार्टी बनी। उसे 32 सीटें आईं यानी अगर उसे दो-तीन फीसद वोट ही मिल जाते तो उसे 70 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत मिल जाती। उस चुनाव में आप को 29.50 फीसद वोट और 28 सीटें और कांग्रेस को 24.50 फीसद वोट और आठ सीटें मिली थी।

आप ने न उस चुनाव में केवल कांग्रेस के मुख्य वोट बैंक हथिया लिए बल्कि भाजपा के कहे जाने वाले मध्यमवर्ग के वोट में भी सेंध लगाई। कांग्रेस को तो विधानसभा चुनाव से बड़ा झटका लोकसभा चुनाव में दिया। इसलिए कांग्रेस का वोट घट कर 15 फीसद रह गया था। आप के राजधानी में ताकतवर होने से कांग्रेस का भारी नुकसान तो हुआ ही बसपा का भी सफाया हो गया। लेकिन आप को उस चुनाव में भाजपा ने झटका दिया। अगर वह औसत या उससे थोड़ा भी इस चुनाव में कायम रहा तो भाजपा चुनाव जीत जाएगी जैसा सर्वेक्षणों में दिखाया जा रहा है। वैसे भी गैर भाजपा मतों का आप और कांग्रेस में विभाजन होना तय सा माना जा रहा है। दोनों में से एक से भाजपा का सीधा मुकाबला हो तब की स्थिति दूसरी होगी। अभी तो ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

 

 

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