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चाचा vs भतीजा विवाद के आठ साल पहले ही मिले थे पहले संकेत, यूं हाशिए पर आते चले गए थे पशुपति पारस

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, राजनीति में एंट्री के बाद संगठन के फैसलों में चिराग की बात ज्यादा सुनी जाती थी, इसके अलावा लोजपा में चाचा पारस का किनारे लगना भी शुरू हो गया था, यहीं से लोजपा में टूट की शुरुआत हुई।

पशुपति कुमार पारस और चिराग पासवान पार्टी के नेतृत्व को लेकर आमने-सामने हैं।(फोटो: एक्सप्रेस फोटो/ एएनआई)

लोकजनशक्ति पार्टी (LJP) के नेता चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति पारस के बीच पार्टी की विरासत को लेकर जंग जारी है। दोनों ही नेता पार्टी पर अपना हक जताने के लिए समर्थन जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हालांकि, लोजपा में यह टकराव की स्थिति अचानक ही नहीं उभरी है। इसके संकेत आज से करीब 8 साल पहले भी देखने को मिले थे, जब तत्कालीन लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान ने अपने बेटे चिराग को आगे रखते हुए उन्हें पार्टी में अहम जिम्मेदारियां सौंपना शुरू किया।

एक इंजीनियरिंग ग्रैजुएट और बॉलीवुड में नाकाम करियर रहने के बाद पॉलिटिक्स में एंट्री लेने वाले चिराग बिहार की कठोर राजनीतिक के लिए काफी सभ्य नेता माने जाते थे। लेकिन रामविलास पासवान ने उन्हें लगातार हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना जारी रखा था। एनडीए में लोजपा के शामिल होने के बाद तो चिराग का राजनीतिक करियर मोदी लहर में आगे बढ़ निकला और उन्होंने पासवान परिवार के प्रभाव वाली जमुई सीट पर 2014 और 2019 में जीत दर्ज की।

दूसरी तरफ इसी दौरान पासवान परिवार के एक और युवा प्रिंस राज भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डिग्री हासिल करने के बाद राजनीति में रुचि दिखाने लगे थे। प्रिंस राज ने राजनीति को भांपने की शुरुआत अपने पिता के सलाहकार के तौर पर ही की। इस दौरान उनका चिराग पासवान से भी अच्छे संबंध रहे और दोनों नेता अकसर साथ दिखने लगे।

हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि मुश्किलें यहीं से उभरीं। दरअसल, संगठन के फैसलों में चिराग की बात ज्यादा सुनी जाती थी। इसके अलावा लोजपा में चाचा पारस का किनारे लगना भी शुरू हो गया था। 2019 में चिराग पासवान के जोर देने के बाद पशुपति पारस को लोजपा प्रदेशाध्यक्ष का पद भी छोड़ना पड़ा था और इस पद पर प्रिंस राज काबिज हुए। माना जाता है कि चिराग के इस कदम से पारस काफी नाराज हो गए थे।

नवंबर 2019 में अस्वस्थता से गुजर रहे रामविलास पासवान ने चिराग को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। इस पारिवारिक तनाव के बीच चिराग ने खुलासा किया था कि जब उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना जा रहा था, तब चाचा पारस सिर्फ पांच मिनट बाद ही आयोजन से लौट गए थे। इस बीच दोनों चचेरे भाइयों के रिश्तों में भी खटास आ गई।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, प्रिंस के एक राज्य इकाई के प्रमुख और चिराग का राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम करने की वजह से दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं और प्रिंस के लिए चिराग और पारस कैंप के बीच चुनाव में मुश्किलें पैदा होने लगीं। पिछले साल रामविलास पासवान के निधन के बाद से ही पारस का चिराग के 12 जनपथ स्थित घर आना-जाना भी कम हो गया था। हालांकि, इस दौरान उन्होंने प्रिंस को अपनी ओर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और दिल्ली में उनके साथ अपना आधिकारिक बंगाल भी साझा किया।

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