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राजनीति: भूगर्भीय जल का गहराता संकट

देश में सन 2007 से 2017 के बीच भूगर्भ जल के स्तर में इकसठ प्रतिशत की गिरावट आई। हालत यह हो गई कि कई नदियों के किनारे बसे गांवों में भी लोगों को पेयजल की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। महत्त्वपूर्ण यह है कि सारी दुनिया में भूगर्भ जल का प्रयोग करने के मामले में भारत अव्वल है।

Author Edited By Bishwa Nath Jha Updated: January 20, 2021 1:56 AM
देश के कई हिस्सों में पानी की भारी कमी से जूझ रहे लोग इस तरह से अपनी व्यवस्था कर रहे हैं। (इंडियन एक्सप्रेस फाइल फोटो)

अतुल कनक

पिछले दिनों राजस्थान सरकार ने शहरी क्षेत्रों में भी भूगर्भीय जल के दोहन की प्रक्रिया प्रारंभ करने के पूर्व स्वीकृति के उपबंध को समाप्त कर दिया। इससे जगह-जगह जमीन में नलकूप खोदने का काम शुरू हो गया। जो लोग मानवता के भविष्य के लिए जल संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उन्हें यह स्थिति डराती है, क्योंकि भूगर्भीय जल के अनियंत्रित दोहन ने उपलब्ध जल भंडारण की स्थिति को भयावह कर दिया है। स्थिति यह है राजस्थान के केवल तीस उपखंडों को भूगर्भीय जल की दृष्टि से सुरक्षित माना जा सकता है, बाकी दो सौ तीन उपखंड डार्क जोन में हैं और छह उपखंड संवेदनशील स्थिति में हैं।

राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा मरुस्थलीय है। लेकिन प्रदेश के जिन हिस्सों को नदियों के सानिध्य का सुख प्राप्त है, उन हिस्सों में भी पिछले डेढ़ दशक में भूगर्भीय जल के स्तर में तेजी से गिरावट आई है। हर साल गर्मी के मौसम में देश के विविध हिस्सों से जल-संकट की डरावनी तस्वीरें सामने आती हैं।

कुछ साल पहले शिमला में लोगों ने जल संकट के कारण पर्यटकों की आवाजाही का विरोध किया था और चेन्नई में लोगों को सलाह दी गई थी कि वे घर से काम करें क्योंकि दफ्तरों में सबके लिए पीने का पानी जुटा पाना संभव नहीं हो पा रहा था।

मनुष्यता के लिए पानी के संरक्षण की चिंता आज भी सबसे ज्वलंत मुद्दों में एक है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अपनी जल संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य आज भी या तो प्रकृति पर निर्भर है या भूगर्भीय जल-भंडारण पर। ऐसे में जरूरी है कि हम प्राकृतिक जल भंडारण के स्रोतों के संरक्षण के प्रति संवेदनशील होते। लेकिन हमने परंपरागत जल स्रोतों के साथ बहुत ही स्वार्थ भरा बर्ताव किया। पुराने तालाबों, कुओं, झीलों, बावड़ियों, कुंडों को उपेक्षित छोड़ दिया और नदियों को प्रदूषित कर दिया। स्थिति यह है कि देश की अधिकांश नदियों का पानी कई जगहों पर पीने योग्य तक नहीं पाया गया है।

इस सूची में वह पवित्र गंगा नदी भी है, जिसकी एक छुअन को मनुष्य का उद्धार करने वाला बताया जाता है। ये प्राचीन जल-स्रोत न केवल अपने अस्तित्व में पर्याप्त मात्रा में जल भंडारण करते थे, बल्कि भूगर्भ के जल स्तर को बनाए रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। इनकी सतह से जमीन में रिस कर गया पानी लंबे समय तक पीढ़ियों की जरूरतों को पूरी करने का आश्वासन देता था। दुर्भाग्य से तरक्की के आधुनिक मानदंडों ने प्रकृति की इस संपदा पर दोहरा प्रहार किया।

न केवल परंपरागत जल स्रोतों को नष्ट किया गया, बल्कि मनमाने तरीके से भू-गर्भीय जल का दोहन भी किया गया। सत्तर के दशक में हालात तब और खराब हुए जब सरकारों ने बिना भविष्य की संभावनाओं पर विचार किए देश भर में बड़े पैमाने पर नलकूप खुदवा डाले। इससे लोगों की तात्कालिक जरूरत तो पूरी हो गई, लेकिन भविष्य के लिए भंडारण की स्थिति भयावह हो गई।

केंद्रीय भू-जल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार देश में सन 2007 से 2017 के बीच भूगर्भ जल के स्तर में इकसठ प्रतिशत की गिरावट आई। हालत यह हो गई कि कई नदियों के किनारे बसे गांवों में भी लोगों को पेयजल की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। महत्त्वपूर्ण यह है कि सारी दुनिया में भूगर्भ जल का प्रयोग करने के मामले में भारत अव्वल है।

चीन और अमेरिका का स्थान क्रमश: दूसरा और तीसरा है। भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान (आइआइटी), खड़गुपर और कनाडा के अथाबास्का विश्वविद्यालय की एक साझा शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय औसतन प्रतिवर्ष दो सौ तीस घन किलोलीटर जल का उपयोग करते हैं। यह आंकड़ा वैश्विक एजेंसियों द्वारा मनुष्य के लिए आवश्यक माने गए जल उपयोग के मापदंडों से अधिक है। माना यह भी जाता है कि एक निश्चित सीमा के बाद यदि जल का उपयोग किया जाता है तो वह वस्तुत: उपयोग नहीं होता, दुरुपयोग होता है। हम हमारे दुरुपयोग को तार्किकता की कसौटी पर सही बताने के उपाय भले ही ढूंढ़ लें, लेकिन यह स्थिति डराने वाली है।

खासकर तब, जब नीति आयोग के केपिटल जल प्रबंधन सूचिका का यह आंकड़ा पढ़ते हैं कि देश के पचहत्तर प्रतिशत घरों में आज भी जलापूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं है। स्पष्ट है कि इसमें अधिक संख्या वंचित तबके की है। संपन्न वर्ग की सुविधाभोगी आदतों से जन्मे संकट का सामना इसी वर्ग को करना होता है।

भूगर्भीय जल महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल आबादी के एक बड़े हिस्से की प्यास बुझाने के काम आता है और सिंचाई के सबसे अहम स्रोतों में एक है, बल्कि यह पर्यावरण के संरक्षण में भी प्रमुख भूमिका निभाता है। जंगलों के लिए जीवन-जल का बंदोबस्त इसी से होता है। नदियों में प्रवाह बनाए रखने और अन्य जल स्रोतों में जल स्तर बनाए रखने में भी भूजल की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भूगर्भीय जल पृथ्वी की ऊपरी सतह और अंदरूनी सतह की चट्टानों के बीच दबाव का संतुलन भी बनाए रखता है।

ऐेसे में यदि भूगर्भीय जल का अस्तित्व स्वयं संकट में आता है तो समूची मानवजाति को किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ेगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। फिर भूगर्भीय जल के संरक्षण की दिशा में एक मात्र चिंता यही नहीं है कि उसका अंधाधुंध दोहन हो रहा है, बल्कि पृथ्वी की सतह के कई रासायनिक प्रदूषक चट्टानों के माध्यम से पृथ्वी के अंदर रिस कर भूगर्भ जल की शुचिता को भी प्रभावित कर रहे हैं। चूंकि यह जल भंडार पृथ्वी की सतह के अंदर छिपा होता है, इसलिए इसके प्रदूषण का सहजता से अनुमान भी नहीं लग पाता।

हालांकि भारत के अधिकांश हिस्सों में भूजल की अपेक्षा सतही जल की उपलब्धता अधिक है, लेकिन भूजल की उपलब्धता सभी क्षेत्रों में सहज होने के कारण भूजल पर हमारी निर्भरता पिछले कुछ सालों में बहुत बढ़ी है। जमीन की कोख से निकाले गए जल का अस्सी प्रतिशत हिस्सा सिंचाई के काम आता है। लेकिन नलकूपों के अंनियंत्रित उपयोग ने अन्य क्षेत्रों में भी भूजल के उपयोग को बढ़ाया है। एक अध्ययन में भारत में कुल जल की वार्षिक उपलब्धता 1869 अरब घन मीटर प्रतिवर्ष पाई गई, जिसमें 433 अरब घन मीटर प्रति वर्ष जल भूगर्भीय है। ये आंकड़े ही सामान्य जीवन में भूगर्भीय जल के महत्त्व को रेखांकित करते हैं।

शायद यही कारण था कि सन् 2015 में जल संसाधनों पर गठित संसद की स्थायी समिति ने भी भूजल उपयोग और उसके संरक्षण की स्थिति की समीक्षा की थी और अपनी रिपोर्ट में कुछ इलाकों में भूजल के अत्यधिक दोहन व कुछ उद्योगों द्वारा भूजल के प्रदूषण पर चिंता जताई थी।

ऐसे में जरूरी है कि हम जितने भूगर्भ जल का उपयोग करें, उसी मात्रा में भूगर्भ जल को रिचार्ज करने के प्रति भी संवेदनशील हों, क्योंकि विपरीत स्थितियां पीढ़ियों के सम्मुख जीवन का संकट खड़ा कर देंगी। जल संरक्षण के लिए जहां परंपरागत जल स्रोतों का जीर्णोद्वार करना, पुराने तालाबों और कुओं की मरम्मत करना शामिल है, वहीं हमें बरसाती पानी के संग्रह के प्रति भी संवेदनशील होगा। यों तो राजस्थान में भी बड़ी ईमारतों के लिए ‘रूफ वाटर हार्वेस्टिंग’ का कानून है, जिसके तहत बरसात के दिनों में छत पर बरसे पानी को एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा जमीन में संग्रहित करना अनिवार्य है।

लेकिन यदि कानून बनाने से ही समस्याओं का समाधान हो जाता तो शायद जीवन को अनेक दुविधाओं का सामना नहीं करना होता। भूगर्भ जल संरक्षण के लिए जरूरी है कि हम लोगों को जल संरक्षण और जल के सदुपयोग के प्रति जागरूक करें और जिम्मेदार तंत्र मौजूद कानूनों की अनुपालना सुनिश्चित करने के प्रति संवेदनशील हो।

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