दुर्गाड़ी किले का विवाद बुधवार को एक बार फिर तनाव का केंद्र बन गया। शिवसेना के विरोधी गुटों और बीजेपी कार्यकर्ताओं की पुलिस के साथ झड़प हो गई। यह झड़प बकरीद की नमाज के दौरान मंदिर में प्रवेश पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर हुई।
इस टकराव ने किले के परिसर में मालिकाना हक, पूजा के अधिकार और राजनीतिक प्रतीकों को लेकर सदियों पुराने विवाद को फिर से जिंदा कर दिया है। इस किले में एक मस्जिद और एक मंदिर, दोनों मौजूद हैं और यह महाराष्ट्र के सबसे संवेदनशील धार्मिक विवादों में से एक बना हुआ है।
इस ताजा तनाव की वजह क्या थी?
इस ताजा टकराव की तात्कालिक वजह बुधवार सुबह बकरीद की नमाज के दौरान कल्याण के दुर्गाड़ी किले के अंदर स्थित मंदिर में प्रवेश पर लगाई गई अस्थायी पाबंदी थी। हर साल ईद-उल-अजहा के मौके पर, किले की ओर जाने वाली सड़क पर नमाज पढ़ी जाती है और सुरक्षा के लिहाज से मंदिर में प्रवेश कुछ समय के लिए रोक दिया जाता है।
लेकिन इस साल, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना, दोनों गुटों के कार्यकर्ताओं ने इन पाबंदियों का विरोध किया। उन्होंने मांग की कि हिंदू श्रद्धालुओं को नमाज के समय भी मंदिर में बिना किसी रुकावट के प्रवेश करने दिया जाए।
पुलिस के अनुसार, नमाज के दौरान मंदिर लगभग 30 मिनट तक बंद रहा, जिसके बाद किले के परिसर के पास विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विजय साल्वी के नेतृत्व में शिवसेना (UBT) के कार्यकर्ताओं ने घंटानाद (घंटियां बजाकर) विरोध प्रदर्शन किया और महाआरती की। वहीं, बीजेपी पार्षद महेश पाटिल ने सड़कों पर नमाज पढ़े जाने पर आपत्ति जताई और प्रशासन को मंदिर में प्रवेश रोकने के खिलाफ चेतावनी दी। जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, पुलिस ने पाटिल को हिरासत में ले लिया, किले की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए और स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए लाल चौकी इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिया।
दुर्गाड़ी किला क्या है?
दुर्गाड़ी किला मुंबई से लगभग 50 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में कल्याण में स्थित है। यह 16वीं सदी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ है। उस समय, अरब सागर के करीब होने के कारण, कल्याण मुस्लिम शासन के तहत एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह था। यह किला कभी कल्याण की प्रमुख पहचान था। यह लगभग 70 एकड़ जमीन में फैला हुआ था। यह किला शहर के उत्तर-पूर्वी कोने पर, नदी के किनारे एक ऊंचे स्थान पर स्थित था। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि यह किला 1570 से मौजूद है और शुरुआती विवरणों से पता चलता है कि इसमें एक मुसलमानों की कब्र, नमाज की जगह और दूसरी इमारतें थीं।
गजेटियर ऑफ द बॉम्बे प्रेसिडेंसी, ठाणे (1892)’ किले की विशेषताओं की एक सजीव तस्वीर पेश करता है। इसमें कहा गया, “टीले के ऊपर, पश्चिमी किनारे पर जो नदी से लगभग 100 फीट ऊपर और बाहर की ओर निकला हुआ है, ‘नमाज की दीवार’ या ईदगाह है, यह 64 फीट लंबी, 13 फीट ऊंची और 7 फीट मोटी है। टीले के पूर्वी किनारे के पास एक मस्जिद है, जो 22 फीट लंबी, 22 फीट ऊंची और 20 फीट चौड़ी है। मस्जिद से लगभग तीस गज की दूरी पर, पत्थर से बना एक गहरा गोल कुआं है।”
1760 में कल्याण पर मराठों का कब्जा हो गया, जिन्होंने किले में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए। मराठों ने किले के अंदर देवी दुर्गा को समर्पित एक छोटा लकड़ी का मंदिर बनवाया और इसका नाम बदलकर ‘दुर्गाड़ी किला’ रख दिया, जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है। गज़ेटियर में बताया गया, “किले के मुख्य भाग में, मराठों ने मस्जिद के पीछे देवी दुर्गा का एक छोटा लकड़ी का मंदिर बनवाया और देवी के सम्मान में किले का नाम ‘दुर्गाड़ी किला’ रख दिया, यह नाम आज भी कायम है। उन्होंने जामा मस्जिद को भी बदलकर रामजी का मंदिर बना दिया।”
इसके बाद, 1818 में अंग्रेजों ने कल्याण पर कब्ज़ा कर लिया। गज़ेटियर के अनुसार, देवी की मूर्ति चोरी हो जाने के बाद, वह मंदिर पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं रहा। गजेटियर में कहा गया, “वर्तमान में किले के उत्तर-पश्चिमी कोने पर स्थित टीले पर नमाज की जगह और वह मस्जिद-मंदिर मौजूद हैं। 1876 में देवी की मूर्ति चोरी हो जाने के बाद से, यह स्थान अब पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं रहा है।”
विवाद की शुरुआत
दुर्गाड़ी किले को लेकर आज का विवाद 1960 के दशक के बीच से शुरू हुआ, जब स्थानीय कोकणी मुसलमानों ने दावा किया कि वे पीढ़ियों से इस जगह पर ईद की नमाज पढ़ते आ रहे हैं और मीरसिंह जैसे परिवार ईदगाह और मस्जिद के आस-पास की जमीन पर काबिज हैं।
यह मुद्दा तब और बढ़ गया जब स्थानीय हिंदू संगठनों ने इस जगह पर मुसलमानों के कब्जे पर सवाल उठाया और वहां पूजा करने के लिए बराबर के अधिकारों की मांग की। 1966 में, महाराष्ट्र सरकार ने दखल दिया और कहा कि यह जमीन राज्य की है। सरकार ने प्रस्ताव दिया कि इस जमीन का कुछ हिस्सा उस समय की कल्याण नगर परिषद को एक पब्लिक पार्क बनाने के लिए सौंप दिया जाए। इस कदम से मुस्लिम समुदाय, खासकर ‘मजलिस-ए-मुशावरत मसाजिद-ओ-औकाफ कल्याण’ ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। यही संगठन ईदगाह और मस्जिद की इमारतों की देखरेख कर रहा था।
विरोध के बाद, सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया और मुसलमानों को उस जगह पर ईद की नमाज पढ़ना जारी रखने की इजाजत दे दी। लेकिन आदेश वापस लेते समय, राज्य सरकार ने यह भी साफ कर दिया कि किले की जमीन का मालिक न तो हिंदू पक्ष होगा और न ही मुस्लिम पक्ष। मुसलमानों को साल में दो बार ईदगाह की दीवार के पास ईद की नमाज पढ़ने और पास के खुले मैदान का इस्तेमाल नमाज़ के लिए करने की इजाजत दी गई।
1968 में यह विवाद और भी ज्यादा सांप्रदायिक हो गया।
अदालत में दायर कागजात में, मुस्लिम पक्ष ने आरोप लगाया कि हिंदू संगठनों ने मस्जिद परिसर के अंदर सिंदूर लगा हुआ एक लाल पत्थर रख दिया था। उसी समय के आस-पास, स्थानीय हिंदुओं ने किले के अंदर नवरात्रि मनाना शुरू कर दिया। उनका दावा था कि जिस इमारत को मस्जिद बताया जा रहा है, वह असल में देवी दुर्गा का मंदिर है।
यह टकराव तब और बढ़ गया जब 20 सितंबर, 1968 को शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने किले का दौरा किया। उन्होंने वहां एक भगवा झंडा फहराया और ऐलान किया कि वहां देवी दुर्गा की मूर्ति स्थापित की जाएगी। इस घटना को आम तौर पर उन शुरुआती पलों में से एक माना जाता है, जब शिवसेना ने खुले तौर पर हिंदुत्व की लामबंदी को स्थानीय राजनीतिक दावों के साथ जोड़ दिया था।
1970 के दशक में यह कानूनी लड़ाई तब और तेज हो गई, जब महाराष्ट्र सरकार ने एक बार फिर इस जमीन पर अपना मालिकाना हक जताया। फरवरी 1974 में, राज्य ने जमीन कल्याण नगर निगम को सौंप दी। यह एक ऐसा फैसला जिसे 1976 में मुस्लिम पक्ष ने अदालत में चुनौती दी और इसी के साथ एक ऐसी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई जो लगभग पांच दशकों से जारी है।
पांच दशकों से चली आ रही कानूनी लड़ाई
इन सालों के दौरान एक नाज़ुक शांति बनी रही, जहां मुसलमानों को जिला कलेक्टर से अनुमति लेने के बाद साल में दो बार ईद की नमाज पढ़ने की इजाजत थी, जबकि हिंदुओं को उस जगह पर नवरात्रि के रीति-रिवाज करने की अनुमति थी।
लगभग पांच दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद, दिसंबर 2024 में कल्याण की एक सिविल कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि विवादित जमीन राज्य की है। कोर्ट ने मजलिस-ए-मुशावरत ट्रस्ट के दावों को खारिज कर दिया और यह टिप्पणी की कि मुस्लिम पक्ष की कानूनी चुनौती ‘लिमिटेशन एक्ट’ (परिसीमन अधिनियम) के तहत बाधित थी, क्योंकि यह मुकदमा 1976 में दायर किया गया था।
हालांकि, इस फैसले से विवाद का निपटारा नहीं हुआ। मुस्लिम पक्ष ने इस फैसले को चुनौती देते हुए यह तर्क दिया है कि इस मामले को तकनीकी आधार पर खारिज किया गया है, न कि इसमें शामिल ऐतिहासिक और धार्मिक दावों की मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर।
जनवरी 2025 में, जिला कोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक अपील लंबित है, तब तक किले पर ‘यथास्थिति’ (status quo) बनाए रखी जाए। इस आदेश के प्रभावी होने का मतलब है कि जब तक इस मामले पर अंतिम फ़ैसला नहीं आ जाता, तब तक विवादित जगह पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह स्पष्ट है कि यह विवाद संवेदनशील है और इसलिए, यथास्थिति बनाए रखने वाले आदेश को जारी रखा जाना चाहिए था।” इस मामले की सुनवाई अभी भी जारी है।
मंदिर की जमीन पर किसका होगा हक?
महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़नवीस सरकार द्वारा प्रस्तावित महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन (मसौदा) अधिनियम, 2026 ने राज्य में मंदिर की भूमि के भविष्य और उस पर कानूनी नियंत्रण को लेकर नई बहस छेड़ दी है, कि मंदिंर का कंट्रोल किसके पास होना चाहिए। इसको लेकर विवाद भी शुरू हो गया है और हिंदू संगठन इस प्रस्तावित कानून का जमकर विरोध कर रहे हैं। यहां क्लिक कर पढे़ं पूरी खबर…
