लद्दाख की ठंडी वादियों में शुक्रवार की सुबह एक ऐसी खबर लेकर आई, जिसने पूरे देश को भीतर तक झकझोर दिया। कारगिल की ऊंचाइयों पर अपने साहस की अमिट छाप छोड़ने वाले भारतीय सेना के वीर अधिकारी कर्नल (सेवानिवृत्त) सोनम वांगचुक अब इस दुनिया में नहीं रहे। लेह में दिल का दौरा पड़ने से 61 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके जाने के साथ ही मानो लद्दाख की पहाड़ियों से एक गर्जना हमेशा के लिए शांत हो गई, वह गर्जना, जिसे लोग ‘लद्दाख का शेर’ कहा करते थे।
यह सिर्फ एक सैनिक का निधन नहीं, बल्कि एक जीवित किंवदंती का अंत है। एक ऐसा योद्धा, जिसकी वीरता की गाथाएं कारगिल युद्ध के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हैं और जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेंगी।
वो योद्धा, जिसने पहाड़ों को भी झुका दिया
11 मई 1964 को लेह की धरती पर जन्मे सोनम वांगचुक का जीवन शुरू से ही संघर्ष और संकल्प का पर्याय रहा। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े इस युवा ने अपने सपनों को सीमाओं में नहीं बांधा। दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतीय सेना की वर्दी पहनने का निर्णय लिया, एक ऐसा निर्णय, जिसने आगे चलकर इतिहास रच दिया।
करीब तीन दशकों से अधिक की अपनी सेवा में उन्होंने भारतीय सेना के साथ असम रेजिमेंट और लद्दाख स्काउट्स जैसी इकाइयों में अपनी बहादुरी और नेतृत्व का परिचय दिया। 2018 में सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका नाम सेना के प्रेरणास्रोतों में शामिल रहा।
कारगिल: जब साहस ने असंभव को संभव किया
साल 1999 कारगिल की चोटियों पर युद्ध अपने चरम पर था। बर्फीली हवाओं, ऑक्सीजन की कमी और दुश्मन की घातक मौजूदगी के बीच भारतीय सैनिकों का हर कदम मौत को चुनौती दे रहा था। ऐसे ही समय में 30 मई 1999 को मेजर सोनम वांगचुक को एक अत्यंत जोखिम भरा मिशन सौंपा गया – बटालिक सेक्टर में 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित छोरबत ला चोटी को दुश्मनों से वापस लेना।
स्थिति बेहद कठिन थी। दुश्मन ऊंचाई पर मजबूत स्थिति में था और लगातार गोलियां बरसा रहा था। लेकिन मेजर वांगचुक के नेतृत्व में 30 जवानों की टुकड़ी ने हार मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने न केवल अपने साथियों का मनोबल बनाए रखा, बल्कि दुश्मन पर ऐसा पलटवार किया कि हालात बदल गए। उस ऐतिहासिक अभियान में उनकी टुकड़ी ने 10 दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और छोरबत ला पर तिरंगा लहराया। यह जीत सिर्फ एक रणनीतिक सफलता नहीं थी – यह भारतीय साहस का प्रतीक बन गई। उनकी इसी अदम्य वीरता के लिए उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
नेतृत्व, निष्ठा और साहस का प्रतीक
कर्नल वांगचुक का व्यक्तित्व सिर्फ युद्धभूमि तक सीमित नहीं था। वे एक ऐसे नेता थे, जो अपने सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। उनका मानना था कि असली नेतृत्व आदेश देने में नहीं, बल्कि सबसे आगे खड़े होकर उदाहरण पेश करने में होता है। उनके निधन पर देशभर से शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक बताया। वहीं सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी और पूर्व थलसेना अध्यक्ष वीपी मलिक ने उनकी बहादुरी को याद करते हुए उन्हें सच्चा सैनिक कहा।
एक विरासत, जो हमेशा जिंदा रहेगी
कर्नल सोनम वांगचुक सिर्फ एक नाम नहीं थे, वे एक भावना थे। देशभक्ति, साहस और समर्पण की वह भावना, जो हर भारतीय के दिल में बसती है। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन कारगिल की बर्फीली चोटियों पर गूंजती उनकी वीरता की कहानियां, लद्दाख की हवाओं में घुली उनकी बहादुरी, और हर सैनिक के दिल में बसता उनका जज्बा हमेशा जीवित रहेगा।
जब-जब देश अपने वीरों को याद करेगा, कर्नल सोनम वांगचुक का नाम गर्व से लिया जाएगा। एक ऐसे योद्धा के रूप में, जिसने न सिर्फ दुश्मनों को हराया, बल्कि साहस की परिभाषा ही बदल दी।
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अदम्य साहस और वीरता के लिए देश में अभी तक 21 फौजियों को परमवीर चक्र से सम्मानित किया जा चुका है। भारतीय सेना के कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया एकमात्र ऐसे सैनिक हैं, जिन्हें देश के बाहर असाधारण नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान देने के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह कहानी बताने से पहले लेकर आपको चलते हैं कांगो, जहां 65 साल पहले बेहद विकट हालात थे। अफ्रीकी गणराज्य कांगो साल 1960 में बेल्जियम से स्वतंत्रता मिलने के गृहयुद्ध जैसे हालातों का सामना कर रहा था। मोइज त्शोम्बे के नेतृत्व में कांगो के कटांगा प्रांत को अलग देश घोषित कर दिया गया था। उस समय एलिजाबेथविल (आज का नाम लुबुम्बाशी) कटांगा राज्य का सबसे महत्वपूर्ण शहर था।
