भारत में कोचिंग उद्योग पिछले दो दशकों में शिक्षा व्यवस्था का एक समानांतर तंत्र बन चुका है। इंजीनियरिंग, मेडिकल, सरकारी नौकरियों, बोर्ड परीक्षाओं और अब स्किल-आधारित परीक्षाओं तक हर साल लाखों छात्र कोचिंग संस्थानों का रुख करते हैं। एक तरफ समर्थकों का तर्क है कि प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता के लिए कोचिंग काम आती है। वहीं आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था शिक्षा में असमानता, आर्थिक बोझ और मानसिक दबाव को बढ़ा रही है। इसके साथ ही सवाल यह भी है कि क्या स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई अब केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है और असल प्रतिस्पर्धा कोचिंग सेंटरों के बंद कमरों में लड़ी जा रही है।

मेडिकल (NEET), इंजीनियरिंग (JEE), यूपीएससी (UPSC) और बैंकिंग जैसी कठिन परीक्षाओं को पास करने की चाह ने इस क्षेत्र को देश के सबसे बड़े और सबसे तेजी से बढ़ते उद्योगों में से एक बना दिया है। लेकिन पिछले कुछ सालों में छात्रों की आत्महत्या, भ्रामक विज्ञापन, भारी फीस और नियमन की कमी जैसे मुद्दों ने कोचिंग उद्योग को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में कोचिंग वास्तव में जरूरत है या मजबूरी? हजारों करोड़ की कोचिंग इंडस्ट्री पिछले कुछ सालों में तेजी से आगे बढ़ी है। पिछले कुछ दिनों से कोचिंग सेंटर को लेकर सोशल मीडिया से लेकर खबरों की दुनिया तक बहस छिड़ी हुई है। चलिए जानते हैं भारत में कोचिंग इंडस्ट्री से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य जो बताते हैं कि कोचिंग यह साम्राज्य क्यों इतनी तेजी से बढ़ रहा है…

कितना बड़ा है कोचिंग का बाजार?

हम यह कह सकते हैं कि भारत की कोचिंग इंडस्ट्री इस वक्त अपने स्वर्ण काल में है। लेटेस्ट आंकड़ों और बाजार रिसर्च के अनुसार, यह सेक्टर इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है कि तथ्य आपको चौंका सकते हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2026 में भारत की कोचिंग इंडस्ट्री लगभग 58,000 करोड़ रुपये का हो चुका है। अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर 1.5 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर जाएगा। ‘नेशनल सैंपल सर्विस’ (NSS) की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में लगभग हर 4 में से 1 छात्र (लगभग 27 से 30%) निजी कोचिंग या ट्यूशन लेता है। शहरों में यह आंकड़ा 30% से ज्यादा है।

कोचिंग कारोबार के बढ़ने से शिक्षण, शैक्षणिक कंटेंट निर्माण और डिजिटल एजुकेशन सेकटर में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। हालांकि, निजी ट्यूशन लेने वाले छात्रों के लिए कोचिंग पर होने वाला खर्च कुल शैक्षिक खर्च का लगभग 43 प्रतिशत और परिवार के कुल घरेलू खर्च का करीब 16.5 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। कोविड-19 महामारी के बाद ऑनलाइन ट्यूशन और डिजिटल कोर्सों के विस्तार ने इस खर्च को और बढ़ा दिया है।

देश में कोचिंग के कई प्रमुख हब है। इनमें राजस्थान का कोटा सबसे आगे है। इसके अलावा दिल्ली के मुखर्जी नगर, ओल्ड राजेंद्र नगर और बिहार के पटना में भी हर साल लाखों छात्र प्रतिस्पर्धी परीक्षा पास करने का सपना लिए विभिन्न कोचिंग संस्थानों में एडमिशन लेते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले कोटा शहर में हर साल देशभर से 2 लाख से ज्यादा छात्र आते हैं।

coaching data

भारत में कोचिंग सेंटर: मुख्य तथ्य

-भारत में स्कूल शिक्षा के साथ-साथ कोचिंग एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था (Shadow Education System) के रूप में उभरी है।

-NSS की Comprehensive Modular Survey: Education 2025 के अनुसार देश में 27% छात्र किसी न किसी रूप में निजी कोचिंग या ट्यूशन लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अनुपात 25.5% और शहरी क्षेत्रों में 30.7% है।

-माध्यमिक (कक्षा 9-10) स्तर पर लगभग 37.8% और उच्च माध्यमिक (कक्षा 11-12) स्तर पर 37% छात्र कोचिंग लेते हैं।

-कोचिंग पर प्रति छात्र औसत वार्षिक खर्च ₹2,409 है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च ₹1,793 और शहरी क्षेत्रों में ₹3,988 है।

-उच्च माध्यमिक स्तर (11वीं-12वीं) पर कोचिंग खर्च सबसे अधिक है। यहां औसत खर्च ₹6,384 प्रति छात्र सालाना है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह लगभग ₹9,950 तक पहुंच जाता है।

-जो छात्र वास्तव में कोचिंग लेते हैं, उनके लिए औसत वार्षिक खर्च और अधिक है। NSS के अनुसार कोचिंग लेने वाले छात्रों का औसत खर्च ₹8,616 (माध्यमिक) और ₹17,323 (उच्च माध्यमिक) तक पहुंचता है।

-देश में कोचिंग उद्योग का सबसे बड़ा बाजार इंजीनियरिंग (JEE), मेडिकल (NEET), UPSC, SSC, बैंकिंग और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी से जुड़ा है।

-कोटा को भारत की ‘कोचिंग राजधानी’ माना जाता है जहां हर साल लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं।

-कोविड-19 के बाद ऑनलाइन कोचिंग प्लेटफॉर्म्स और यूट्यूब आधारित शिक्षण ने उद्योग का स्वरूप बदल दिया है। अब छोटे शहरों के छात्र भी राष्ट्रीय स्तर के शिक्षकों तक पहुंच बना पा रहे हैं।

-कोचिंग उद्योग से शिक्षण, कंटेंट निर्माण, टेस्ट सीरीज, एडटेक और डिजिटल शिक्षा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हुए हैं।

-दूसरी ओर छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव, भारी फीस, भ्रामक विज्ञापन, टॉपर मार्केटिंग और कोटा जैसे शहरों में छात्र आत्महत्या की घटनाओं के कारण यह उद्योग लगातार विवादों में भी रहा है।

कोचिंग उद्योग के विभिन्न पहलू

यह समझना जरूरी है कि अब एडवांस टेक्नोलॉजी के युग में कोचिंग का यह कारोबार केवल एक कमरे में ब्लैकबोर्ड लगाकर पढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके कई रूप हैं:

एंट्रेंस एग्जाम कोचिंग: इसमें मुख्य रूप से आईआईटी-जेईई, नीट और क्लैट (CLAT) जैसी परीक्षाएं शामिल हैं। माता-पिता अपने बच्चों के लिए 11वीं-12वीं के साथ ही लाखों रुपयों की फीस इन संस्थानों को देते हैं।

सरकारी नौकरी और सिविल सर्विसेज (UPSC): दिल्ली, पटना, इलाहाबाद जैसे शहरों में केंद्रित यह बाजार अरबों का है। यहां छात्र सालों-साल रहकर तैयारी करते हैं।

हाइब्रिड और ऑनलाइन कोचिंग (EdTech): कोरोना महामारी के बाद बायजूस (Byju’s), अनएकेडमी (Unacademy) और फिजिक्सवाला (PhysicsWallah), खान सर जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने बाजार पर कब्जा किया है। अब छात्र घर बैठे कम फीस में भी पढ़ पा रहे हैं।

घरेलू और स्कूल ट्यूशन: छोटे शहरों और गांवों में स्कूल की कमजोर शिक्षा व्यवस्था को पाटने के लिए स्थानीय टीचर और होम-ट्यूशन एक बड़े असंगठित बाजार के रूप में मौजूद हैं।

सरकारी नियम और कानून

कोचिंग सेंटरों की मनमानी, फीस वसूली और छात्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने ‘कोचिंग सेंटर्स के पंजीकरण और विनियमन के लिए गाइडलाइंस 2024’ जारी की थीं। इसके तहत मुख्य नियम निम्नलिखित हैं:

उम्र की सीमा: कोचिंग संस्थान 16 साल से कम उम्र के बच्चों या कक्षा 10वीं से पहले के छात्रों को अपने यहां नामांकित नहीं कर सकते।
शिक्षकों की योग्यता: कोचिंग में पढ़ाने वाले प्रत्येक ट्यूटर का कम से कम ग्रेजुएट (स्नातक) होना अनिवार्य है।
भ्रामक विज्ञापनों पर रोक: कोई भी संस्थान 100% सिलेक्शन या रैंक की गारंटी का झूठा दावा नहीं कर सकता।
फीस रिफंड पॉलिसी: यदि कोई छात्र बीच में ही कोर्स छोड़ता है, तो उसे बची हुई अवधि की फीस 10 दिनों के भीतर (Pro-rata basis पर) वापस करनी होगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा: संस्थानों के पास प्रति छात्र पर्याप्त जगह (कम से कम 1 वर्ग मीटर) होनी चाहिए। साथ ही फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट और मेडिकल सहायता की व्यवस्था अनिवार्य है।
जुर्माना: नियमों के उल्लंघन पर पहली बार 25,000 रुपये और दूसरी बार 1 लाख रुपये व इसके बाद पंजीकरण रद्द करने का प्रावधान है।

इसके अलावा राजस्थान जैसे राज्यों ने अपने यहां विधानसभा में ‘राजस्थान कोचिंग सेंटर्स (नियंत्रण और विनियमन) विधेयक’ भी पेश किया है ताकि कोटा जैसे शहरों को अधिक सुरक्षित बनाया जा सके।

कोचिंग उद्योग से जुड़े मुख्य विवाद

जैसे-जैसे कोचिंग का साम्राज्य बड़ा होता जा रहा है इस कारोबार के पीछे के गहरे और कड़वे सच ने ने समय-समय पर पूरे देश को झकझोरा है:

छात्रों का मानसिक तनाव और आत्महत्याएं: कोटा जैसे शहरों से हर साल दर्जनों छात्रों की आत्महत्या की खबरें आती हैं। दिन में 16-18 घंटे पढ़ाई का दबाव, टेस्ट में कम नंबर आने पर बच्चों को अलग बैच में डालना (Performance Segregation) और माता-पिता की उम्मीदों का बोझ बच्चों को डिप्रेशन में धकेल देता है।

भ्रामक विज्ञापन और ‘टॉपर’ खरीदने का धंधा: रिजल्ट आते ही कई कोचिंग संस्थान एक ही टॉपर की फोटो अपने होर्डिंग्स पर लगा देते हैं। असल में ये छात्र केवल मॉक इंटरव्यू या टेस्ट सीरीज के लिए वहां जाते हैं। लेकिन कोचिंग माफिया इसका इस्तेमाल नए एडमिशन खींचने के लिए करते हैं। हाल ही में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कई बड़े संस्थानों पर भ्रामक विज्ञापनों के लिए जुर्माना भी लगाया है।

व्यावसायीकरण और आर्थिक असमानता: शिक्षा अब ‘अधिकार’ की जगह एक ‘प्रीमियम सर्विस’ बनती जा रही है। जो परिवार लाखों की फीस नहीं दे सकते, उनके बच्चे इस रेस में पीछे छूट जाते हैं। माता-पिता बच्चों को पढ़ाने के लिए जमीन बेचते हैं या भारी कर्ज लेते हैं।

सुरक्षा की अनदेखी: कई शहरों में तंग गलियों और बेसमेंट में बिना वेंटिलेशन और फायर सेफ्टी के कोचिंग सेंटर चल रहे हैं जिससे छात्रों की जान हमेशा खतरे में रहती है। राजधानी दिल्ली में एक कोचिंग सेंटर में बेसमेंट में चल रही क्लास में पानी भर जाने से कई छात्रों की जान चली गई थी। इस हादसे के बाद देशभर में कोचिंग सेंटर में छात्रों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हुए और हंगामा मचा।

कोचिंग सेंटर और बजट का दबाव

पिछले कुछ समय के आंकड़े देखें तो निजी ट्यूशन अब बच्चों की पढ़ाई का जैसा हिस्सा बन गई है। भारत में कोचिंग उद्योग का इस कदर बढ़ना असल में हमारी पारंपरिक स्कूली शिक्षा प्रणाली की विफलता को दिखाता है। जब तक स्कूलों में पढ़ाई का स्तर नहीं सुधरेगा और बोर्ड परीक्षाओं तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच का अंतर कम नहीं होगा, तब तक माता-पिता कोचिंग सेंटरों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर रहेंगे।

NSS (National Sample Service) की 2025 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लगभग हर चार में से एक छात्र ट्यूशन लेता है। सबसे जरूरी बात है कि यह ट्यूशन सिर्फ किसी एक खास वर्ग में नहीं बल्कि हर आय वर्ग और हर तरह के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए जरूरी हो गई है। और जरूरत के चलते ही स्कूल की फीस देने के बावजूद परिवार पर ट्यूशन फीस का अतिरिक्त बोझ बन गई है और कई बार तो यह रकम, स्कूल की फीस से ज्यादा हो जाती है।

एनएसएस की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 27 प्रतिशत छात्र निजी कोचिंग अपनाते हैं। शहरों में 30.7 प्रतिशत जबकि गांवो में यह संख्या 25.5 प्रतिशत है।

निजी कोचिंग और ट्यूशन का चलन लगातार बढ़ रहा है। लेकिन उपलब्ध शोध और सर्वेक्षण यह नहीं दिखाते कि इससे छात्रों के सीखने के स्तर में बहुत ज्यादा सुधार होता है। ASER (Annual Status of Education Report) 2024 के निष्कर्ष बताते हैं कि कक्षा 8 के विद्यार्थियों की भाषा और गणित में क्षमता का संबंध केवल कोचिंग लेने से नहीं जुड़ा है। कई ऐसे राज्य हैं जहां निजी ट्यूशन का दायरा काफी बड़ा है, फिर भी छात्रों का शैक्षणिक प्रदर्शन अपेक्षित रूप से बेहतर नहीं है।

इसके उलट, केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत कम या मध्यम स्तर की कोचिंग निर्भरता के बावजूद बच्चों के सीखने के परिणाम अधिक संतोषजनक पाए गए हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल अतिरिक्त ट्यूशन पर नहीं बल्कि स्कूल शिक्षण, सीखने के माहौल, शिक्षक क्षमता और छात्र की सहभागिता जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोचिंग की बढ़ती मौजूदगी को बेहतर शिक्षा का सीधा पैमाना नहीं माना जा सकता।

कोचिंग सेंटर को लेकर क्यों बढ़ा रहा विवाद

कोचिंग उद्योग को लेकर हाल में सोशल मीडिया पर विवाद इसलिए तेज हुआ क्योंकि एक ओर कोचिंग संस्थान खुद को सफलता का सबसे बड़ा माध्यम बताते हैं जबकि दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञ, पत्रकार और कई अभिभावक इसे बढ़ती व्यावसायिकता, भारी फीस और छात्रों पर दबाव से जोड़कर देख रहे हैं।

विवाद तब और बढ़ा जब कुछ न्यूज़ चैनलों की एंकरों, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े यूट्यूब शिक्षकों और चर्चित कोचिंग संचालकों के बीच सार्वजनिक बहस शुरू हुई। बहस का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या भारत में कोचिंग संस्थान छात्रों की वास्तविक जरूरत पूरी कर रहे हैं या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के डर और सीमित अवसरों का लाभ उठाकर बड़ा कारोबार खड़ा कर चुके हैं।

चर्चित शिक्षक खान सर का नाम भी चर्चा में आया। उन्होंने विभिन्न मंचों और इंटरव्यू में यह तर्क रखा कि देश की परीक्षा प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि बड़ी संख्या में छात्रों को अतिरिक्त मार्गदर्शन की जरूरत पड़ती है। दूसरी तरफ कुछ पत्रकारों और शिक्षा विश्लेषकों ने सवाल उठाया कि यदि स्कूल शिक्षा पर्याप्त है तो फिर करोड़ों छात्रों को अलग से कोचिंग लेने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।

सोशल मीडिया पर बहस का एक बड़ा हिस्सा कोटा मॉडल, JEE-NEET तैयारी, कोचिंग फीस, टॉपर मार्केटिंग और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा रहा। आलोचकों का कहना है कि कई संस्थान चयनित छात्रों को प्रचार का माध्यम बनाते हैं और सफलता की कहानियों को प्रमुखता से दिखाते हैं जबकि असफल छात्रों की बड़ी संख्या चर्चा से बाहर रह जाती है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि लाखों छात्रों को सस्ती या ऑनलाइन शिक्षा उपलब्ध कराने में कोचिंग संस्थानों और डिजिटल शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

यानी मौजूदा विवाद किसी एक व्यक्ति, एंकर या शिक्षक तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह बड़ा सवाल है कि भारत की प्रतिस्पर्धी परीक्षा व्यवस्था में कोचिंग एक सहायक विकल्प है या ऐसी मजबूरी बन चुकी है जिसके बिना छात्र खुद को प्रतिस्पर्धा में कमजोर महसूस करते हैं।