तमिलनाडु में पांच साल पहले (अगस्त 2021) जब डीएमके सरकार बनी थी तो वित्त मंत्री बनने के तीन महीने बाद पी. थियागा राजन ने एक श्वेत पत्र जारी किया था। इसमें कहा गया था कि शासन व्यवस्था की संरचनात्मक खामियों के कारण राज्य की वित्तीय हालत ‘बेहद गंभीर’ हो चुकी है और अब ‘कोई सुरक्षा कवच बाकी नहीं बचा’ है। बता दें कि उस समय राज्य में AIADMK की 10 साल की सत्ता का अंत हुआ था।
अब पांच साल बाद टीवीके चीफ सी. जोसेफ विजय ने रविवार को राज्य के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली है। सीएम बनते ही विजय ने कहा कि वह तमिलनाडु के वित्तीय हालात क लेकर श्वेत पत्र जारी करेंगे और आरोप लगाया कि डीएमके ने राज्य को 10 लाख करोड़ के कर्ज के साथ ‘खराब हालातों’में छोड़ा है। शपथ के तुरंत बाद विजय ने हर दो महीने में 200 यूनिट फ्री बिजली देने का ऐलान किया। राज्य के ऊर्जा विभाग द्वारा दिए आदेश के मुताबिक, विजय के इस चुनावी वादे का खर्च 1,730 करोड़ रुपये प्रति वर्ष आएगा।
क्या कहते हैं RBI के आंकड़े?
विजय के पूर्ववर्ती एम. के. स्टालिन ने इस सुझाव को सख्ती से खारिज किया कि राज्य का खजाना खाली हो चुका है। नए मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए स्टालिन ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, ”आप, जो यह कहकर सत्ता में आए थे कि ‘मैं केवल वही वादे करूंगा जो व्यावहारिक रूप से संभव हों’, अब सरकारी प्रशासन में कदम रख रहे हैं। मुझे विश्वास है कि हमारी तरह आप भी जल्द ही जनता से किए गए वादों को पूरा करने की बारीकियां सीख जाएंगे।”
RBI के लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति आदर्श नहीं मानी जा सकती। वित्त वर्ष 2025 के आखिर तक राज्य की कुल बकाया देनदारियां 9.56 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई थीं जो देश के किसी भी राज्य से सबसे अधिक हैं।
इसके साथ ही, तमिलनाडु देश का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला राज्य भी बना हुआ है। पुराने GDP सीरीज (2011-12 को आधार वर्ष मानते हुए) के अनुसार, राज्य ने वित्त वर्ष 2026 में 10.8% की वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर्ज की जबकि वित्त वर्ष 2025 में यह वृद्धि दर 11.2% रही थी।
कर्ज लेने की गुंजाइश ज्यादा
जो राज्य तेजी से आर्थिक विकास करते हैं, उनके पास अधिक कर्ज लेने की गुंजाइश होती है क्योंकि उनमें उस कर्ज को चुकाने की क्षमता भी ज्यादा होती है। वित्त वर्ष 2025 में तमिलनाडु की कुल बकाया देनदारियां राज्य के GDP के 30.6% के बराबर थीं। लेकिन यह अनुपात लगातार तीन वर्षों से घट रहा है।
यह अनुपात वित्त वर्ष 2022 में 32.2% था जबकि कोरोना महामारी के कारण वित्त वर्ष 2021 में यह तेजी से बढ़कर 31.8% हो गया था। महामारी से पहले वित्त वर्ष 2020 में यह 26.5% था।
यहां तक कि DMK सरकार के 2021 के श्वेत पत्र में भी तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति को चिंताजनक बताया गया था। तमिलनाडु सभी राज्यों में सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाला राज्य बन गया था जो कोई अच्छी बात नहीं मानी जाती।
10 लाख करोड़ के कर्ज के लिए जिम्मेदार कौन?
विजय द्वारा उठाया गया 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का मुद्दा केवल पिछली सरकार की देन नहीं है बल्कि उससे पहले की सरकारों की नीतियों का भी परिणाम है। हाल ही में 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में भी इस ओर संकेत किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2012 में गैर-पूर्वोत्तर और गैर-पहाड़ी राज्यों में तमिलनाडु का कर्ज-से-GSDP अनुपात दूसरा सबसे कम था। लेकिन इसके बाद यह लगातार बढ़ता गया और वित्त वर्ष 2020 तक 24.7% पहुंच गया। फिर वित्त वर्ष 2021 में यह बढ़कर 31% हो गया।
राज्य के बढ़ते कर्ज का एक बड़ा कारण उसका ‘प्रतिबद्ध व्यय’ (Committed Expenditure) भी है। यानी वह खर्च जिसे सरकार हर साल टाल नहीं सकती- जैसे कि कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज पर ब्याज का भुगतान।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च (PRS Legislative Research) की अक्टूबर 2025 में जारी राज्य के वित्त संबंधी एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु उन पांच राज्यों में शामिल था जिन्होंने वित्त वर्ष 2026 में अपनी कुल राजस्व प्राप्तियों का 60% से अधिक हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर खर्च करने का बजट बनाया था। तमिलनाडु में यह आंकड़ा 62% था। अन्य राज्यों में असम (61%), हिमाचल प्रदेश (83%), केरल (69%) और पंजाब (74%) शामिल थे।
सरकार जितना अधिक पैसा इन ‘प्रतिबद्ध खर्चों’ पर खर्च करती है। उतना ही कम धन स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विकास कार्यों पर खर्च कर पाती है। इसी संदर्भ में विजय का हर दो महीने में 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वित्त वर्ष 2025-26 में तमिलनाडु ने सब्सिडी पर 72,434 करोड़ रुपये खर्च करने का बजट बनाया था। यह पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) से 16% अधिक और राज्य के कुल खर्च का 15% था। ताजा आंकड़ों के अनुसार, फरवरी तक राज्य का सब्सिडी बिल 67,936 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। वहीं पूरे साल के पूंजीगत व्यय लक्ष्य में 19% की कमी रह गई।
बात सिर्फ मुफ्त बिजली की नहीं है।
TVK के चुनावी वादों को पूरा करने में कितना खर्च?
इंडियन एक्सप्रेस ने 6 मई की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि TVK के घोषणापत्र में किए गए सभी वादों को पूरा करना- जैसे परिवार की महिला मुखिया को हर महीने 2500 रुपये, हर परिवार को साल में छह मुफ्त LPG सिलेंडर और 10 लाख बेरोजगार स्नातकों को हर महीने 4,000 रुपये की सहायता, नई सरकार के कल्याणकारी खर्च को सालाना करीब 1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा सकता है।
यह 2025-26 में पिछली DMK सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं और सब्सिडी पर खर्च किए गए 65,000 करोड़ रुपये की तुलना में 52% से अधिक की बढ़ोतरी होगी।
तमिलनाडु के लिए राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारना इसलिए भी बेहद जरूरी माना जा रहा है क्योंकि राज्य की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने राज्यों के 2025-26 बजट पर अपनी जनवरी में जारी रिपोर्ट में कहा था कि 2026 तक केरल और तमिलनाडु उस ‘एजिंग कैटेगरी’ में पहुंच जाएंगे जहां राज्य की 15% से अधिक आबादी 60 वर्ष से ऊपर होगी।
RBI के अनुसार, ”बूढ़ी होती आबादी वाले राज्यों में वृद्ध आश्रित अनुपात (Old-age Dependency Ratio) बढ़ रहा है और सामाजिक क्षेत्र पर खर्च का दबाव भी लगातार बढ़ेगा।”
RBI ने यह भी कहा कि बढ़ती उम्रदराज आबादी से पैदा हो रहे वित्तीय दबावों और सार्वजनिक वित्त की स्थिरता बनाए रखने के लिए व्यापक नीतिगत रणनीति की जरूरत होगी।
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तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय से दो ही चेहरे निर्णायक माने जाते रहे हैं- DMK और AIADMK। लेकिन पिछले कुछ सालों में राज्य की राजनीति में एक ऐसा नाम उभरा जिसने इस पारंपरिक समीकरण को चुनौती दे दी। यह नाम है अभिनेता से राजनेता बने विजय का। फिल्मों में ‘थलापति’ के नाम से लोकप्रिय विजय अब तमिलनाडु की नई राजनीतिक धारा के प्रमुख चेहरे बन चुके हैं। पढ़ें पूरा किस्सा…
