हिमाचल प्रदेश में व्यास नदी का उफान, 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2023 में सिक्किम की ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), असम में कई दशकों में आई विनाशकारी बाढ़ या फिर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में कुछ घंटों की बारिश के बाद सड़कों का दरिया बन जाना- पिछले कुछ सालों में भारत में ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। इन सभी घटनाओं में एक समान बात है कि बहुत कम समय में इतनी अधिक बारिश हुई कि नदियां, नाले और ड्रेनेज सिस्टम उसका दबाव नहीं झेल सके।

वैज्ञानिक मानते हैं कि हर फ्लैश फ्लड के लिए केवल जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार नहीं होता। स्थानीय भूगोल, नदियों का स्वरूप, शहरीकरण और मानव गतिविधियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की Sixth Assessment Report (AR6) स्पष्ट करती है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण बहुत ज्यादा बारिश की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। यही कारण है कि दुनिया के कई हिस्सों की तरह भारत भी अब अधिक बार अचानक आने वाली बाढ़ का सामना कर रहा है।

फ्लैश फ्लड क्या होती है?

फ्लैश फ्लड ऐसी बाढ़ होती है जो भारी बारिश, बादल फटने, ग्लेशियल झील के टूटने (Glacial Lake Outburst Flood-GLOF) या किसी जलाशय से अचानक बड़े पैमाने पर पानी निकलने के कारण कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों के भीतर आ जाती है। सामान्य बाढ़ की तुलना में इसमें लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का समय बहुत कम मिलता है। इसलिए इसका नुकसान भी ज्यादा होता है।

गर्म होती धरती और बदलता बारिश का पैटर्न

फ्लैश फ्लड को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि बढ़ता तापमान बारिश को कैसे प्रभावित करता है। वायुमंडलीय विज्ञान का Clausius-Clapeyron Relation बताता है कि तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर हवा लगभग 7 प्रतिशत अधिक जलवाष्प धारण कर सकती है। जब वातावरण में नमी ज्यादा होती है तो बादलों में भी पानी की मात्रा बढ़ जाती है। IPCC AR6 के अनुसार यही अतिरिक्त नमी कई क्षेत्रों में कम समय में बहुत ज्यादा बारिश का कारण बन रही है। यानी पहले जितनी बारिश कई दिनों में होती थी, अब उसका बड़ा हिस्सा कुछ घंटों में ही गिर सकता है।

समुद्र का बढ़ता तापमान क्यों है चिंता का विषय?

भारत का मानसून हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से मिलने वाली नमी पर निर्भर करता है। Indian Institute of Tropical Meteorology (IITM) पुणे के कई अध्ययनों में बताया गया है कि हाल के दशकों में अरब सागर तेजी से गर्म हुआ है। गर्म समुद्री सतह वातावरण में अधिक नमी और ऊर्जा उपलब्ध कराती है जिससे कम दबाव वाले सिस्टम (Low Pressure Systems) ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं। यही सिस्टम जब तटीय या पर्वतीय इलाकों में पहुंचते हैं तो कम समय में अत्यधिक बारिश करा सकते हैं।

IITM के वैज्ञानिकों का मानना है कि मध्य भारत में हाल के वर्षों में बढ़ी बहुत ज्यादा बारिश की घटनाओं के पीछे अरब सागर का असामान्य रूप से गर्म होना एक महत्वपूर्ण कारण है।

मौसम प्रणालियां एक जगह क्यों ठहर जाती हैं?

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार कई बार बारिश कराने वाली प्रणालियां सामान्य गति से आगे बढ़ने के बजाय किसी एक क्षेत्र के ऊपर अधिक समय तक बनी रहती हैं। इससे एक ही इलाके में लगातार भारी बारिश होती रहती है।

IPCC AR6 और World Meteorological Organization (WMO) का कहना है कि जलवायु परिवर्तन वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इस विषय पर अभी भी शोध जारी है लेकिन कई अध्ययनों में यह संकेत मिले हैं कि कुछ परिस्थितियों में मौसम प्रणालियां लंबे समय तक सक्रिय रह सकती हैं जिससे अत्यधिक वर्षा का जोखिम बढ़ जाता है।

भारत में क्यों बढ़ रही हैं फ्लैश फ्लड की घटनाएं?

जलवायु परिवर्तन इसके पीछे एक बड़ा कारण है लेकिन अकेला कारण नहीं।

1.मानसून का बदलता स्वरूप
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के दीर्घकालिक आंकड़े बताते हैं कि देश के कई हिस्सों में बारिश के दिनों की संख्या घट रही है जबकि कम समय में बहुत अधिक बारिश होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका मतलब यह है कि मानसून का कुल पानी कम समय में गिर रहा है जिससे नदियों और शहरों के ड्रेनेज सिस्टम पर अचानक दबाव बढ़ जाता है।

2.हिमालय में बढ़ता GLOF का खतरा
IPCC AR6, ISRO और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के अनुसार हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियल झीलों की संख्या और उनका आकार बढ़ रहा है। यदि इनमें से कोई झील टूटती है तो कुछ ही मिनटों में नीचे बसे गांवों और कस्बों में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।

साल 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनाक (South Lhonak) झील के टूटने से आई बाढ़ इसका प्रमुख उदाहरण है। वहीं 2013 की केदारनाथ आपदा में अत्यधिक वर्षा, बादल फटना और चोराबाड़ी झील से जुड़े जलप्रवाह ने मिलकर भारी तबाही मचाई थी।

3.पहाड़ों पर बढ़ता निर्माण
हिमालय एक युवा और भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पर्वत श्रंखला है। नीति आयोग (NITI Aayog) की Indian Himalayan Region रिपोर्ट और NDMA की गाइडलाइंस में कहा गया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े निर्माण कार्यों से पहले क्षेत्र की Carrying Capacity और Climate Risk Assessment का आकलन जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क चौड़ीकरण, सुरंगों, हाइड्रोपावर परियोजनाओं और अनियोजित निर्माण से प्राकृतिक ढलानों और जल निकासी मार्गों पर दबाव बढ़ता है। भारी बारिश के दौरान यही स्थिति भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का जोखिम बढ़ा देती है।

4.शहर भी अब सुरक्षित नहीं
फ्लैश फ्लड अब केवल पहाड़ी राज्यों की समस्या नहीं रह गई है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी कुछ घंटों की बारिश के बाद व्यापक जलभराव देखने को मिलता है।

Central Water Commission (CWC), NDMA और UN-Habitat की रिपोर्टें बताती हैं कि कंक्रीटीकरण, नालों पर अतिक्रमण, खराब ड्रेनेज और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों के खत्म होने से शहरों की पानी सोखने की क्षमता लगातार घट रही है। इसलिए पहले जितनी बारिश सामान्य मानी जाती थी, वही अब कई शहरों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर देती है।

क्या कहती हैं लेटेस्ट रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन और फ्लैश फ्लड के बढ़ते खतरे को लेकर अलग-अलग संस्थानों की रिपोर्टें लगभग एक जैसी तस्वीर पेश करती हैं। हालांकि हर रिपोर्ट का फोकस अलग है लेकिन निष्कर्ष यही है कि भारत को भविष्य में अधिक तेज व अनिश्चित बारिश के लिए तैयार रहना होगा।

IPCC: दक्षिण एशिया में बढ़ेगा चरम बारिश का खतरा
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की Sixth Assessment Report (AR6) के अनुसार, दक्षिण एशिया उन क्षेत्रों में शामिल है जहां बढ़ते वैश्विक तापमान के साथ बहुत ज्यादा बारिश (Extreme Rainfall Events) की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट कहती है कि गर्म वातावरण अधिक नमी धारण करता है जिससे कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं पहले की तुलना में अधिक सामान्य हो सकती हैं।

IITM: अरब सागर बना बड़ा फैक्टर
IITM पुणे के वैज्ञानिकों के शोध बताते हैं कि हाल के दशकों में अरब सागर अपेक्षाकृत तेजी से गर्म हुआ है। इसके कारण मानसूनी मौसम के दौरान वातावरण में अतिरिकत नमी उपलब्ध हो रही है जिससे मध्य और पश्चिमी भारत में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं का जोखिम बढ़ा है।

IMD: बारिश का पैटर्न बदल रहा है
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) लगातार अपनी मौसमी रिपोर्टों में बता रहा है कि देश के कई हिस्सों में बारिश का वितरण पहले जैसा नहीं रहा। कई क्षेत्रों में लंबे सूखे अंतराल के बाद अचानक बहुत तेज बारिश देखने को मिल रही है। यही बदलाव फ्लैश फ्लड और शहरी बाढ़ दोनों के लिए चुनौती बन रहा है।

CWC: भारत का बड़ा हिस्सा बाढ़ के खतरे में
केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission-CWC) के अनुसार, भारत की लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि, यानी देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 12 प्रतिशत हिस्सा, बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन के साथ अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ने पर इस जोखिम के और बढ़ने की आशंका जताई जाती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारी बारिश किसी प्राकृतिक नदी, जंगल या खुले पानी वाले एरिया में होती है तो उसका असर अपेक्षाकृत कम हो सकता है। लेकिन जब वही बारिश ऐसे क्षेत्र में होती है जहां नालों पर कब्जा हो, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई हो या शहर पूरी तरह कंक्रीट में बदल चुके हों तब नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। यानी क्लाइमेट चेंज खतरे को बढ़ा रहा है जबकि अनियोजित विकास उस खतरे को आपदा में बदल रहा है।

समाधान क्या हो सकते हैं?

1.बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम
IMD और NDMA पिछले कुछ वर्षों में पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत कर रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी और तटीय क्षेत्रों में डॉपलर वेदर रडार (DWR) का नेटवर्क और विस्तृत होना चाहिए ताकि लोगों को फ्लैश फ्लड की चेतावनी समय रहते मिल सके।

2.शहरों को ‘स्पंज सिटी’ बनाना
UN-Habitat और कई शहरी नियोजन विशेषज्ञों का सुझाव है कि शहरों में पार्क, झील, वर्षा जल संचयन, पारगम्य (Permeable) सड़कें और खुले जल निकासी मार्ग बढ़ाए जाएं। इससे बारिश का पानी जमीन में समा सकेगा और अचानक जलभराव कम होगा।

3.हिमालय में वैज्ञानिक विकास नीति
नीति आयोग और NDMA दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में किसी भी बड़े निर्माण कार्य से पहले Carrying Capacity और Climate Risk Assessment किया जाए। इससे ऐसे इलाकों की पहचान की जा सकती है जहां बड़े प्रोजेक्ट भविष्य में आपदा का कारण बन सकते हैं।

4.नदियों के प्राकृतिक रास्ते बचाना
विशेषज्ञ मानते हैं कि नदियों के फ्लडप्लेन पर अतिक्रमण और निर्माण रोकना बेहद जरूरी है। नदी को उसका प्राकृतिक बहाव क्षेत्र मिलने पर बाढ़ का दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।

स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारी
फ्लैश फ्लड में सबसे महत्वपूर्ण चीज समय होती है। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित मॉक ड्रिल, सामुदायिक प्रशिक्षण और स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाएं लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

फ्लैश फ्लड अब केवल मानसून की सामान्य घटना नहीं रह गई है। IPCC, IITM, IMD, CWC और NDMA जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएं अधिक तीव्र होती जा रही हैं। वहीं अनियोजित शहरीकरण, पहाड़ों पर बढ़ता निर्माण, नदियों के प्राकृतिक बहाव में हस्तक्षेप और कमजोर ड्रेनेज सिस्टम इस खतरे को और बढ़ा रहे हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर बाढ़ के लिए केवल क्लाइमेट चेंज जिम्मेदार है। लेकिन यह जरूर है कि बदलती जलवायु अब प्राकृतिक आपदाओं को पहले से अधिक खतरनाक बना रही है। इसलिए भविष्य की चुनौती केवल राहत और बचाव तक सीमित नहीं है। भारत को अपने शहरों, पहाड़ों और बुनियादी ढांचे को जलवायु-अनुकूल (Climate Resilient) बनाना होगा। यही आने वाले सालों में जान-माल के नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी रास्ता होगा।

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