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CIC ने सरकार, रक्षा मंत्रालय और नेवी से पूछा- क्यों बढ़ाई रूस से खरीदे गए विमानवाहक पोत ‘एडमिरल गोर्शकोव’ की कीमत

राजग सरकार ने इस विमानवाहक पोत के लिए वर्ष 2004 में 97.4 करोड़ डॉलर में सौदा किया था। लेकिन वर्ष 2010 में खरीद के समय इसकी अंतिम कीमत बढ़कर 2.35 अरब डॉलर कर दी गई थी।

Author नई दिल्ली | May 22, 2017 4:15 AM
सबसे बड़े विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य (File Photo)

भारतीय नौसेना के लिए रूस से खरीदे गए विमानवाहक युद्धपोत की कीमत बढ़ाए जाने पर केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने सरकार व नौसेना से जवाबतलबी की है। आयोग ने सरकार, रक्षा मंत्रालय और भारतीय नौसेना से पूछा है कि खरीदने के समय विमान वाहक पोत ‘एडमिरल गोर्शकोव’ की कीमत बढ़ाने की रूस की मांग पर भारत क्यों राजी हुआ? इसके पीछे क्या कारण रहे? आयोग ने कहा कि इन सवालों के जवाब भारत सरकार को देने चाहिए और उन कारणों का खुलासा करना चाहिए, जिसकी वजह से देश ने नया विमानवाहक पोत खरीदने के बजाय उन्नत किए गए युद्ध पोत को खरीदने का फैसला किया। रूस से मंगाने के बाद इसे भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया गया है और पोत का नाम बदल कर आइएनएस विक्रमादित्य कर दिया गया। तत्कालीन राजग सरकार ने इस विमानवाहक पोत के लिए वर्ष 2004 में 97.4 करोड़ डॉलर में सौदा किया था। लेकिन वर्ष 2010 में खरीद के समय इसकी अंतिम कीमत बढ़कर 2.35 अरब डॉलर कर दी गई थी। आयोग ने भारतीय नौसेना को निर्देश दिया है कि वह अब 30 वर्ष पुराने हो चुके इस पोत की ‘अंतिम कुल कीमत’, उन्नत किए जाने पर खर्च, नवीकरण और नए सिरे से उसे बनाने पर हुए खर्च का खुलासा करे और यह भी बताए भारत ने इसके लिए कब-कब भुगतान किया।

यह मामला सूचना के अधिकार के तहत आरटीआइ कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल की ओर से दायर अर्जी से जुड़ा है। उन्होंने 44,500 टन वजनी इस विमानवाहक के अधिग्रहण से संबंधित कई सूचनाएं मांगी थीं। नौसेना ने जवाब में आयोग से कहा कि यह सूचना रक्षा मंत्रालय देगा। लेकिन रक्षा मंत्रालय ने कहा कि सभी फाइलें नौसेना मुख्यालय के पास हैं और सूचना मुहैया कराने के लिए उसे ही कहा जाना चाहिए। इस मामले की सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त अमिताव भट्टाचार्य ने पाया कि नौसेना इस बाबत जानकारियां देने की जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय पर डाल रही है। जबकि, मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि इसका जवाब नौसेना ही देगी। इसके बाद ही अपने आदेश में सीआइसी भट्टाचार्य ने नौसेना को निर्देश दिया कि वह फाइलों का ब्योरा, संवाद और रूसीपक्ष द्वारा कीमत में बदलाव करने मांग को स्वीकार करने संबंधी दस्तावेजों का खुलासा करे। आयोग ने पाया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नौसेना और मंत्रालय ने जो सूचनाएं दबा रखी हैं, उससे ‘बड़ा जनहित’ जुड़ा है। भट्टाचार्य ने मंत्रालय को उन कारणों का खुलासा करने का भी निर्देश दिया, जिसके तहत भारत ने नए पोत की जगह उन्नत किए गए युद्धपोत को खरीदने का फैसला किया।इस युद्धपोत को तत्कालीन सोवियत संघ ने अपनी नौसेना में 20 दिसंबर, 1987 को शामिल किया था और 1996 में इसे सेवा मुक्त कर दिया गया। उसके बाद इसे बेचने के लिए रूस और भारत में लंबी वार्ता चली। भारत ने 2004 में इसकी खरीद का सौदा किया और रूस ने इसे मरम्मत के बाद जरूरी सुधार कर उन्नत किया। यह पोत आइएनएस विक्रमादित्य के नाम से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। इस पोत का डेक 284 मीटर लंबा है जिस पर मिग 29के जैसे लड़ाकू विमान उड़ान भर सकते हैं। 20 मंजिली इमारत जितने ऊंचे इस पोत पर एक साथ 30 लड़ाकू विमान रखे जा सकते हैं। भारतीय नौसेना ने इस पोत पर मिग 29के, कामोव 31, कामोव 20, सी किंग विमान और ध्रुव और चेतक हेलिकॉप्टर तैनात कर रखे हैं। 22 डेक वाले इस पोत पर 1600 नौसैनिक तैनात हैं। यह पोत 13 हजार किलोमीटर समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा करने में सक्षम है और समुद्र में लगातार 45 दिनों तक रह सकता है।

 

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