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मिजोरम और मेघालय में गूंजे CHRISTMAS के मंगलगान

क्रिसमस का त्योहार आने के साथ ही मिजोरम में क्रिसमस कैरल्स (मंगलगीत) की धुन हर घर में गूंज रही है। ईसाई बहुल राज्य में अभी भी त्योहार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे पारंपरिक सामुदायिक भोज का आयोजन होता है। गांवों या आसपास के इलाकों से आए लोग एकत्रित होते हैं और एकसाथ मिलकर इस तरह के […]

Author December 25, 2014 11:06 AM

क्रिसमस का त्योहार आने के साथ ही मिजोरम में क्रिसमस कैरल्स (मंगलगीत) की धुन हर घर में गूंज रही है। ईसाई बहुल राज्य में अभी भी त्योहार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे पारंपरिक सामुदायिक भोज का आयोजन होता है। गांवों या आसपास के इलाकों से आए लोग एकत्रित होते हैं और एकसाथ मिलकर इस तरह के भोज का आयोजन करते हैं जिसमें मुर्गे, मछली, हरी सब्जियों और सलाद के अलावा पोर्क (सूअर का मांस) और बीफ (गाय का मांस) का बना व्यंजन परोसा जाता है।

दक्षिणी एजल के वेनघानुई इलाके से आए सी रेमतलुआंगा ने बताया कि ग्रामीण खुद भोजन तैयार करते हैं। ऐसे भोजन बनाने वाले खानसामों को ‘फातूस’ कहा जाता है जो अपने तरीके से इन व्यंजनों को बनाने में विशेषज्ञ होते हैं और सालों से वे अपनी इस कला को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपते आ रहे हैं। भोज के लिए भोजन मुख्य रूप से पुरुष ही तैयार करते हैं जबकि लड़कियां और विवाहित स्त्रियां सब्जियां काटने, चाय देने में उनकी मदद करती हैं। इस तरह के भोज के लिए खास तौर पर युवा लोगों को बुजुर्ग और प्रशिक्षित ‘फातूस’ प्रशिक्षण देते हैं।

ज्यादातर घरों में वैसे तो भोजन बनाने के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल होता है। लेकिन इस तरह के भोज के लिए लकड़ी जलाकर भोजन पकाया जाता है। भोजन केले के पत्तों पर परोसा जाता है और पेय पदार्थों को बांस से बने कपों में दिया जाता है। मिजो लोगों में क्रिसमस आयोजनों का जो अन्य निराला अंदाज देखने को मिलता है वह गीत का समय है, जिसे खासतौर पर गांव के किसी हॉल या घर में आयोजित किया जाता है और वहां पाती, कमलाला, दमहॉहा जैसे मिजो संगीतकारों के पारंपरिक धुनों पर तैयार गीतों को गाया जाता है।

वैसे तो घर-घर जाकर समूह में मंगलगीत गाना अब गुजरे जमाने की बात हो गई है हालांकि मिजोवासी संगीत और गीत में खासी रुचि रखते हैं और क्रिसमस और अन्य त्योहार चाहे वे धार्मिक हों या पारंपरिक, में गीत संगीत का खासा महत्व देखा जाता है। ईसाई धर्म को मानने वाले अन्य लोगों की तरह ही मिजोवासियों के लिए क्रिसमस का त्योहार उपहार का समय होता है। दोस्तों, संबंधियों के बीच उपहार का आदान-प्रदान आम चलन है। सरकारी विभाग, गैर सरकारी संगठन, गिरजाघर और लोग खुद भी अनाथालयों, जेलों, सुधार गृहों, पुनर्वास केंद्रों और अस्पतालों में जाकर लोगों को उपहार देते हैं ताकि ऐसे लोग भी इस त्योहार का आनंद ले सकें। अपने प्रियजनों को संदेश भेजने के लिए अब क्रिसमस कार्ड्स की जगह टेक्स मैसेजेज और सोशल नेटवर्किंग साइट ने ले लिया है।

मिजोवासियों ने पहली बार दक्षिण मिजोरम के पुकपुई गांव में 1901 में क्रिसमस का त्योहार मनाया था और लोगों के समूह की अध्यक्षता रीव एडविन रॉलैंड्स ने की थी जिसे मिजोवासी ‘जोसपथारा’ के नाम से बुलाते हैं। उस समय पुकपुई गांव में केवल 47 धर्मांतरित ईसाई थे। मिजो धरती पर पहली बार 1872 में क्रिसमस का आयोजन किया गया था तब ब्रिटिश सैन्यकर्मियों ने मिजोरम में सशस्त्र अभियान शुरू किया था (तब इसे लुशाई देश के रूप में जाना जाता था)। उन्होंने क्रिसमस का त्योहार मणिपुर की सीमा पर स्थित तुईवाई नदी के तट पर मनाया था। इतिहासकारों का कहना है कि मिजो लड़ाकों ने हमलावर सैनिकों पर जवाबी हमले के लिए गुरिल्ला युद्ध शुरू किया था जिससे क्रिसमस के त्योहार में रंग में भंग पड़ गया था।

दूसरी ओर नववर्ष और बड़े दिन के अवसर पर मेघालय के उस सौ साल पुराने चीड़ के पेड़ को विशेष तौर पर सजाया गया है जो 1897 में असम में आए भूकंप को झेल चुका है। आॅल सैंट्स कैथेड्रल के प्रमुख रेव पीबी लिंगदोह ने बुधवार को बताया कि आॅल सैंट्स कैथेड्रल के सामने के प्रांगण में स्थित चीड़ का यह पेड़ 80 फुट लंबा है और पूर्वी भारत में सबसे पुराना और सबसे ऊंचा पेड़ है। इस पेड़ को हमेशा सजाया जाता है। यह लोगों को क्रिसमस का संदेश देता है और हर शाम सैकड़ों लोग इस विशाल शंकुधारी पेड़ को देखने आते हैं। इसी तरह शहर के अन्य चर्चों और पूजास्थलों में भी चीड़ के पेड़ को सजाया गया है। प्रकाश और रंगों के अलावा आदिवासी ईसाइयों की बस्तियों में क्रिसमस कैरल का संगीत भी सुनाई दे रहा है।

 

 

 

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