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संपादकीय: वार्ता और विवाद

पिछले साल मई में गलवान घाटी में चीनी सैनिकों की घुसपैठ से उपजे तनाव को कम करने के लिए चीन भारत के साथ वार्ताएं तो कर रहा है, लेकिन साथ ही उसके सैनिक अभी भी भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिशों से बाज नहीं आ रहे।

Updated: January 26, 2021 7:57 AM
भारत- चीन सीमा पर तैनात सुरक्षा बल। फाइल फोटो।

ऐसे में वार्ताओं के साथ-साथ घुसपैठ और विवाद खड़े करने की चीनी सेना की रणनीति शांति के प्रयासों में बाधा बन रही है। अगर चीन का यही रवैया रहा तो किसी भी तरह की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। पिछले हफ्ते भी सिक्किम के ना कुला में चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा क्षेत्र में घुसने की कोशिश की, लेकिन भारतीय सैनिकों ने तत्परता दिखाते हुए उन्हें खदेड़ दिया था। दोनों पक्षों में तनातनी होने की खबरें भी आर्इं। गलवान की घटना के बाद ऐसा कई बार हो चुका है।

इससे चीन की इस नीयत का पता चलता है कि वह भारत को विवादों में घसीटने के लिए कोई न कोई उकसाने वाली हरकत करने से बाज नहीं आने वाला। हैरानी की बात यह है कि सिक्किम की घटना ऐसे वक्त में हुई जब चार दिन बाद ही दोनों देशों के बीच नौवें दौर की बातचीत होनी थी। ऐसी घटनाएं सुलह की वार्ताओं को पटरी पर से उतार सकती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन का इरादा ऐसा ही रहा हो!

इस वक्त पूर्वी लद्दाख में हालात सामान्य नहीं हैं। दोनों देशों के एक लाख सैनिक मोर्चे पर डटे हैं। हर बार की तरह ही इस बार भी वार्ता में भारत ने चीनी पक्ष से साफ-साफ कहा कि वह अपने सैनिकों को पीछे हटाना शुरू करे, तभी इलाके में तनाव कम करने के प्रयास सार्थक हो सकेंगे। लेकिन चीन ऐसा करेगा, इसको लेकर संदेह है।

ढाई महीने पहले भी आठवें दौर की बातचीत में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की संख्या घटाने को लेकर सहमति बनी थी और चीन ने संकेत दिया था कि वह इस दिशा में जल्द कदम उठाएगा। लेकिन उसके बाद भी उसने इस सहमति पर अमल नहीं किया। ऐसे में चीन पर कैसे भरोसा किया जाए? वह इस बात पर अड़ा है कि पहले भारत अपने सैनिकों को हटाना शुरू करे।

जबकि रणनीतिक लिहाज से महत्त्वपूर्ण ठिकानों से सैनिकों की संख्या कम करने का काम दोनों देशों को समान रूप से करना है। लेकिन चीन इस जिद पर अड़ा है कि पहले भारत अपने सैनिकों को हटाए। अगर भारत ने अपने सैनिकों को पहले हटा लिया तो चीन का मनोबल और बढ़ेगा और ऐसे में वह पीछे हटने के बजाय हालात को खराब कर सकता है। ऐसा कर वह भारत को घेरना चाहता है।

दोनों देशों के बीच अब तक नौ दौर की बातचीत हो चुकी है। कुछ महीने पहले मास्को में दोनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्री भी मिले थे और हालात सामान्य बनाने के लिए पांच सूत्रीय योजना पर सहमति बनी थी। लेकिन इन सबका अब तक कोई सकारात्मक परिणाम आता नहीं दिखा। बल्कि चीन दूसरे इलाकों में जिस तरह की गतिविधियां जारी रखे हुए है, वे और तनाव पैदा करने वाली हैं।

हाल में अरुणाचल प्रदेश में भारत के कब्जे वाले इलाके में गांव बसाने की चीनी साजिश का खुलासा हुआ। साथ ही, अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर विवादास्पद बयान दे दिया कि वह इसे भारत का हिस्सा नहीं मानता। अगर चीन इसी तरह से विवादों को बढ़ाता रहेगा तो भविष्य में टकराव के खतरे और बढ़ेंगे। वार्ताएं तभी कामयाब हो सकती हैं जब संबंधित पक्ष उन पर ईमानदारी के साथ अमल करें, जो कि चीन की तरफ से होता नहीं दिख रहा है।

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