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माउंट एवरेस्ट : कोरोना काल में ऊंचाई क्यों माप रहा चीन

माउंट एवरेस्ट को लेकर चीन और नेपाल के बीच लंबे समय तक सीमा विवाद चला था। यह विवाद 1960 में सुलझ गया था, जिसमें माउंट एवरेस्ट को दोनों देशों की सीमा के बीच में दर्शाया गया। एवरेस्ट का उत्तरी सिरा चीन के तिब्बत में है और दक्षिणी सिरा नेपाल की तरफ।

Author Published on: June 2, 2020 4:44 AM
माउंट एवरेस्ट पर काम करते चीन तकनीकी विशेषज्ञ।

चीन के सरकारी टीवी चैनल चाइना ग्लोबल टेलीविजन नेटवर्क (सीजीटीएन) की आधिकारिक वेबसाइट ने माउंट एवरेस्ट की कुछ तस्वीरें जारी की हैं। साथ में ट्वीट किया है, ‘माउंट चोमोलुंगमा (चीनी भाषा) या माउंट कोमोलांग्मा (तिब्बती भाषा) पर सूर्य की रोशनी का शानदार नजारा। इसे माउंट एवरेस्ट भी कहा जाता है।

दुनिया की यह सबसे ऊंची चोटी चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित है।’ इस ट्वीट के जरिए चीन ने अपने इरादे साफ कर दिए। दुनिया कोरोना विषाणु के संक्रमण से जूझ रही है और चीन ने अपनी भौगोलिक हसरतों को बेलगाम कर दिया है। चीनी सर्वेक्षण टीम माउंट एवरेस्ट पर 27 मई को पहुंची। उसके बाद चीन ने दावा किया कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर नहीं बल्कि 8844 मीटर है।

इसे मापने की चीन की कवायद नई नहीं है। लेकिन वह हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पर सैन्य मोर्चाबंदी बढ़ाने और उसका नाम माउंट चोमोलुंगमा करने की कवायद में जुटा है। माउंट चोमोलुंगमा इस पर्वत का तिब्बती नाम है। चीन ने माउंट एवरेस्ट पर अप्रैल में अपना 5जी नेटवर्क स्थापित किया है। चीन की कंपनी हुआवेई का दावा है कि 6500 मीटर ऊंचाई पर लगे इस 5जी टावर की रेंज माउंट एवरेस्ट की चोटी तक होगी, लेकिन इस तकनीक का फायदा सिर्फ वही पर्वतारोही उठा पाएंगे जो तिब्बत से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करेंगे।

रक्षा विशेषज्ञ इससे चिंतित हैं। यह एक विवादास्पद कदम है। कई देशों ने आपत्ति की है। इस नेटवर्क से पूरे हिमालय क्षेत्र का संचार चीन के नियंत्रण में आ सकता है। इस 5जी नेटवर्क का सैन्य पहलू भी है। इस नेटवर्क के जरिए चीन भारत, बांग्लादेश और म्यांमा पर नजर रख सकता है। आने वाले दिनों में वह हिमालय क्षेत्र में अपनी इस तकनीक का फायदा उठा सकता है।

एवरेस्ट पर अधिकतर अभियान और पर्यटन गतिविधियां नेपाल की तरफ से होती हैं। अब चीन ने तकनीक की मदद से तिब्बत की तरफ स्थित एवरेस्ट के हिस्से का विकास करना शुरू कर दिया है। सरकारी टीवी चैनल की वेबसाइट में एवरेस्ट को अपना बताकर चीन ने अपने मंसूबे साफ कर दिए हैं। चीनी समाचार एजंसी शिन्हुआ के मुताबिक, ‘माउंट कोमोलांग्मा के सर्वेक्षण के लिए भेजी गई टीम के साथ ही एक सड़क निर्माण टीम भी काम कर रही है, जो 8300 मीटर की ऊंचाई से एवरेस्ट की चोटी तक रास्ता बनाने में जुटी है।’

सर्वे टीमें माउंट एवरेस्ट के उत्तरी और दक्षिणी सिरों से चढ़ाई में लगने वाले समय का भी आकलन कर रही है। माउंट एवरेस्ट नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र की सीमा पर है। महत्त्वपूर्ण है कि चीन माउंट एवरेस्ट पर अपनी तरफ के इलाके में स्थित बेस कैंप पर 2016 में ही सड़क बना चुका था। अब वह बेस कैंप से आगे की सड़क परियोजना पर काम कर रहा है।

माउंट एवरेस्ट को लेकर चीन और नेपाल के बीच लंबे समय तक सीमा विवाद चला था। यह विवाद 1960 में सुलझ गया था, जिसमें माउंट एवरेस्ट को दोनों देशों की सीमा के बीच में दर्शाया गया। एवरेस्ट का उत्तरी सिरा चीन के तिब्बत में है और दक्षिणी सिरा नेपाल की तरफ। 2005 में भेजे गए सर्वेक्षण मिशन के बाद से ही चीन ने माउंट एवरेस्ट पर अपना उपग्रह निगरानी केंद्र स्थापित कर दिया था। साल 1949 से लेकर अब तक छह बार चीन इस पर्वत चोटी पर अपनी पैमाइश टीम भेज चुका है।

उत्तरपूर्व में सरकने का दावा
वर्ष 2015 में आए नेपाल में भूकंप के बाद चीन ने दावा किया कि माउंट एवरेस्ट तीन सेंटीमीटर उत्तर-पूर्व में खिसक गया है। एवरेस्ट चार सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से 10 साल में 40 सेंटीमीटर हटा है। एवरेस्ट के उत्तर या उत्तर-पूर्व में सरकने का मतलब है चीन की हद में आना। अभी तक चीन ने एवरेस्ट शिखर के अपनी सीमा में होने का दावा नहीं किया है, लेकिन उसके इरादे स्पष्ट हैं।

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