Chinese Infiltration: भारतीय सेना के उप प्रमुख (रणनीति) जनरल राजीव घई ने चीन को लेकर अहम बात कही और बताया कि कैसे चीन लगातार भारतीय सीमा के पास अपनी सक्रियता को विस्तार दे रहा है। उन्होंने कहा कि चीन ने पूर्वोत्तर के राज्यों में सबसे ज्यादा 72 प्रतिशत शियाओकांग यानी समृद्ध गांवों का निर्माण किया है। इनमें से 90 प्रतिशत गांव अरुणाचल प्रदेश में बने हैं। उन्होंने आगे कहा कि इनमें से कई बस्तियां उन क्षेत्रों में भी हैं जिन पर दोनों देशों के बीच विवाद है।
जनरल राजीव घई ने इसके साथ ही बांग्लादेश का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के साथ संबंधों की “अनिश्चित दिशा” ने भारत के रणनीतिक सिलीगुड़ी गलियारे की समस्या को और बढ़ा दिया है, जो तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में चुंबी घाटी के निकट होने के कारण असुरक्षित रहा है। हालांकि उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत ने इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास के मामले में भी अच्छी प्रगति की है।
डोकलाम के पास स्थित है चुंबी घाटी
चुंबी घाटी रणनीतिक दृष्टि से भारत के लिए सबसे अहम है, यह डोकलाम के निकट स्थित है। यहीं पर साल 2017 में भारत और चीन के बीच सीमा विवाद हुआ था। यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया (यूएसआई) के सहयोग से आयोजित असम राइफल्स के वार्षिक सेमिनार को संबोधित करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल घई चीन की साजिशों को लेकर अहम तथ्य रखे। इस सेमिनार का थीम ‘पूर्वोत्तर के लिए सुरक्षा चुनौतियां: आकलन और आगे का रास्ता’ था।
राजीव घई ने कहा कि पिछले दो दशकों में चीन ने सड़कों, रेल, पुलों और बांधों का अभूतपूर्व गति से विकास किया है। उन्होंने कहा कि उत्तरी सीमाओं पर स्थित लगभग 600 गांवों की शियाओकांग परियोजना का जिक्र तो करना ही नहीं चाहिए लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन 628 गांवों में से लगभग 72% पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित हैं। मतलब ये कि लगभग 450 गांव बसाए गए हैं, जिनमें से लगभग 90% अरुणाचल प्रदेश राज्य के सामने हैं। यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसा क्यों है।
चिकेन नेक भारत के लिए सबसे अहम
सिलिगुड़ी कॉरिडोर जो कि पश्चिम बंगाल में स्थित 22 किलोमीटर चौड़ी और 60 किलोमीटर लंबी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जमीन है, जो कि भारत के उत्तर-पूर्व को शेष भारत से जोड़ती है। इसे चिकेन नेक भी कहा जाता है। चिकन नेक का जिक्र करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कहा कि चुंबी घाटी के निकट होने के कारण इसकी भेद्यता और भी बढ़ जाती है।
उन्होंने कहा कि यह बात किसी से छिपी नहीं है। इसलिए हाल के दिनों में बांग्लादेश के साथ हमारे संबंधों की अनिश्चित दिशा ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है, जो उत्तरी प्रतिद्वंद्वी (चीन) के संदर्भ में पहले से ही मौजूद है। उन्होंने कहा कि इसलिए कॉरिडोर को सुरक्षित करना अत्यंत आवश्यक है और मुझे लगता है कि यह जानकर सभी को प्रोत्साहन मिलेगा कि इस दिशा में काफी काम और विचार-विमर्श चल रहा है।
उन्होंने कहा है कि कॉरिडोर के पास काफी संख्या में बल तैनात हैं। बुनियादी ढांचे की बात करें तो, सड़क, रेल और भूमिगत बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में काफी काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में अनेक सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद यह क्षेत्र अग्रणी बन रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि हमने प्रगति की है, शायद उतनी तेज़ी से नहीं जितनी हमारे उत्तरी प्रतिद्वंद्वी ने की है। लेकिन हमने काफ़ी काम किया है।
भारत ने शुरू की हैं कई रणनीतिक परियोजनाएं
लेफ्टिनेंट जनरल घई ने आगे कहा कि पूर्वोत्तर में कई रणनीतिक अवसंरचना परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इसमें सेला सुरंग, ब्रह्मपुत्र पर बने पुल, असम में रेल और सड़क मार्ग से चलने वाला बोगीबील पुल लोहित नदी पर बना पुल और मोरन राजमार्ग पर आपातकालीन लैंडिंग सुविधा है। उन्होंने कहा कि ये केवल विकास परियोजनाएं ही नहीं हैं। यह एक दोहरे उपयोग वाली संपत्ति है जो रसद संबंधी कमजोरियों को कम करती है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत करते हुए बलों को तैनात करने की हमारी क्षमता को बढ़ाती है।
अनिश्चितता का साया हावी
कॉरिडोर में भूमिगत रेल कनेक्टिविटी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमने पहले चरण में 24 किलोमीटर लंबी सुरंग की परिकल्पना की है और यह लगभग 62 किलोमीटर तक जाएगी। इससे रेल लाइन सिलीगुड़ी कॉरिडोर के नीचे से गुजरेगी। लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई ने कहा कि जमीनी चुनौतियों के बावजूद भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने का काम चल रहा है और अगले पांच वर्षों में यह बाड़ काफी हद तक बनकर तैयार हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि यह विशेष रूप से फायदेमंद होगा क्योंकि घुसपैठ और नशीले पदार्थों की तस्करी सीमा पर प्रमुख चुनौतियों में से हैं।
असम राइफल्स के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेरा ने कहा कि भूगोल, भूभाग, सामाजिक विविधता और लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाएं मिलकर इस क्षेत्र को देश के बाकी हिस्सों से अलग बनाती हैं। उन्होंने आगे कहा कि हालात थोड़े अस्पष्ट इसलिए हो गए हैं क्योंकि पहले, लड़ाई की रेखाएं स्पष्ट रूप से खींची हुई थीं। लेकिन आज, पूर्वोत्तर के संपूर्ण सुरक्षा और रणनीतिक परिदृश्य पर अनिश्चितता का साया हावी है।
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बांग्लादेश ने मार्च की शुरुआत में अपने खुफिया एजेंसी प्रमुख को भारत भेजा था। बीएनपी के चुनाव जीतने और तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद बांग्लादेश से भारत की यह पहली उच्च स्तरीय यात्रा थी। सूत्रों के अनुसार, खुफिया प्रमुखों ने 2 मार्च 2026 को डिनर पर मुलाकात की, जहां खुफिया जानकारी साझा करने और सुरक्षा साझेदारी पर विस्तृत चर्चा हुई। क्लिक करके पढ़िए पूरी खबर…
