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गावों में घटकर शहरों में बढ़ बाल विवाह का चलन

बाल विवाह, विशेषकर कन्याओं का विवाह भारत के ग्रामीण इलाकों में घटा है लेकिन शहरी इलाकों में बढ़ा है।
Author June 13, 2017 17:50 pm
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक है।

बाल विवाह, विशेषकर कन्याओं का विवाह भारत के ग्रामीण इलाकों में घटा है लेकिन शहरी इलाकों में बढ़ा है। बड़ी बात यह है कि लड़कों की तुलना में नाबालिग लड़कियों की शादियां अधिक हो रही हैं। इसके कारण हालांकि स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन पितृसत्तात्मक समाज तथा परंपरा को इसका जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जनसंख्या आंकड़ों के नए विश्लेषण से यह जानकारी सामने आई है। प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से महाराष्ट्र देश का तीसरा सबसे अमीर राज्य है। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) तथा यंग लाइव्स इंडिया के अध्ययन के मुताबिक, बाल विवाह के मामले में देश के 20 शीर्ष जिलों में से 16 जिले महाराष्ट्र के हैं, जहां बाल विवाह विकराल रूप ले रहा है।

गरीबी के मामले में देश में नौवें पायदान पर खड़े राजस्थान में अधिकांश लड़कियों की शादी 10-17 साल की उम्र में, जबकि लड़कों की शादी 10-20 साल की आयु में हो जाती है, जबकि शादी की कानूनी उम्र क्रमश: 18 तथा 21 साल है। राज्य के सभी जिलों में बाल विवाह में कमी आई है, लेकिन इसके 13 जिले रैंकिंग में शामिल हैं। यंग लाइव्स इंडिया की निदेशक रेणु सिंह ने कहा, “सबसे ज्यादा चिंता करने वाली बात यह है कि साल 2001 से 2011 की जनगणना के बीच नाबालिग (शादी के लिए कानूनी उम्र से पहले) लड़कियों की शादी के मामले शहरी इलाकों से अधिक आ रहे हैं।”

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, 10 साल से कम आयु में कोई शादी नहीं मिली है। देश में 2001 से 2011 के बीच औसतन कुछ ही बच्चों की शादी हुई। 21 साल से कम उम्र में लड़कों की शादी में 2.54 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जबकि 18 साल से पहले लड़कियों की शादी में 2.51 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। महाराष्ट्र के पूर्वोत्तर भंडारा जिले में राज्य के 16 जिलों की तुलना में शादी की कानूनी उम्र से पहले लड़कियों की शादी में पांच गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई। भंडारा जिले में कानूनी उम्र से पहले लड़कों की शादी में 21 गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई।

सभी भारतीय राज्यों की अपेक्षा राजस्थान में कानूनी उम्र से पहले सर्वाधिक लड़कियों (10 से 17 साल के बीच 8.3 फीसदी) तथा सर्वाधिक लड़कों (10-20 साल के बीच 8.6 फीसदी) की शादी होती है। अध्ययन के मुताबिक, भारत के 13 राज्यों के 70 जिलों में कानूनी उम्र से पहले शादियां होती हैं, जो देश भर में होने वाले बाल विवाह का 21 फीसदी है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, इन 70 जिलों में लड़कियों के बाल विवाह का आंकड़ा 21.1 फीसदी, जबकि लड़कों के बाल विवाह का आंकड़ा 22.5 फीसदी है। ये जिले आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, बंगाल, बिहार, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के हैं।

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, 10-17 साल के बीच लड़कियों की शादी के मामले में शीर्ष 20 में राजस्थान के सात जिलों में भीलवाड़ा शीर्ष स्थान पर है, जहां 37 फीसदी लड़कियों की शादी 10-17 साल की उम्र में होती है, जबकि ग्रामीण जिलों में 40 फीसदी लड़कियों की शादी 10-17 साल की उम्र में होती है। जहां तक कानूनी उम्र से पहले लड़कों की शादी की बात है, तो राजस्थान की हालत बद्तर है। इसके नौ जिले शीर्ष 20 में शामिल हैं। भीलवाड़ा में 20 फीसदी लड़कों की शादियां 10-20 साल की आयु में होती हैं।

एक दशक में हालांकि बाल विवाह में कमी दर्ज की गई है, लेकिन राजस्थान के 13 जिलों में से एक बांसवाड़ा इस रैंकिंग में शामिल है।
अध्ययन के मुताबिक, बाल विवाह को लेकर शीर्ष 70 जिलों में शहरी जिले भी शामिल हैं और 2011 की जनगणना के मुताबिक इन जिलों में 25.8 फीसदी बाल विवाह हुए। इन शहरी जिलों में 10-17 साल की हर पांच में से एक लड़की की शादी हो गई। लड़कों के बाल विवाह के मामले में शीर्ष 20 शहरी जिलों में गुजरात के सात जिले शामिल हैं, जहां 10-20 साल उम्र के लड़कों की शादी हुई। इस सूची में बंगाल के छह जिले शामिल हैं।

अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि देश में कानूनी उम्र से पहले लड़के तथा लड़कियों की शादी में अपार विविधता देखी गई है और इसका द्वितीयक विश्लेषण इस प्रवृत्ति का खुलासा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अध्ययन के मुताबिक, “इन प्रवृत्तियों को समझने के लिए हमें जमीनी स्तर पर तथ्यों को इकट्ठा करने की जरूरत है, जिसमें यह पता चला कि किसी खास जिले/जगह में आखिर हो क्या रहा है।”

अध्ययन में कई तथ्यों तथा पहले के शोधों को सामने रखा गया है, जिनमें पाया गया कि माना जाता है कि लड़कियां रजस्वला होने के फौरन बाद शादी के लिए परिपक्व हो जाती हैं, गरीबी, शिक्षा की कमी, जाति, परिवार का आकार, पितृसत्तात्मक समाज तथा शिक्षा, रोजगार, लैंगिकता तथा यौन व्यवहार के मामलों में सांस्कृतिक लिंग भेदभाव शामिल हैं। (आंकड़ा आधारित, गैर लाभकारी, लोकहित परोपकारी मंच इंडिया स्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत। ये इंडिया स्पेंड के निजी विचार हैं)

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