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बलात्कार से जन्मी संतान जैविक पिता की संपत्ति में हकदार: अदालत

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि बलात्कार के परिणामस्वरूप पैदा हुई सन्तान का अपने असल पिता (बलात्कारी) की जायदाद में वारिसाना हक होगा..

Author लखनऊ | November 4, 2015 11:33 PM
इलाहाबाद उच्च न्यायालय (फाइल फोटो)

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में व्यवस्था देते हुए कहा है कि बलात्कार के कारण पैदा हुई संतान का अपने असल पिता (बलात्कारी) की जायदाद में वारिसाना हक होगा। न्यायमूर्ति शबीहुल हसनैन और न्यायमूर्ति डीके उपाध्याय की पीठ ने मंगलवार को यह अहम फैसला देते हुए कहा कि बलात्कार के कारण जन्मी संतान को दुराचार के अभियुक्त की नाजायज औलाद माना जाएगा और उसका उसकी संपत्ति पर हक होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे बच्चे को कोई और व्यक्ति या दंपति अगर गोद ले लेता है तो उसका अपने असल पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रह जाएगा।

अदालत ने कहा- जहां तक उत्तराधिकार का मामला है तो संबंधित संतान का जन्म किन हालात में हुआ, यह मायने नहीं रखता। उत्तराधिकार का मसला संबंधित पर्सनल लॉ से तय होता है। यह बात अप्रासंगिक है कि नवजात शिशु बलात्कार का नतीजा है या फिर आपसी सहमति से बने यौन संबंधों का परिणाम। अदालत ने कहा कि बलात्कार के कारण जन्मी औलाद को कोई व्यक्ति या दंपति गोद नहीं लेता है तो उत्तराधिकार के लिए उसे अदालत के किसी निर्देश की जरूरत नहीं होगी। वह संबंधित पर्सनल लॉ के जरिए अपने असल पिता की संपत्ति में हिस्सा पाने की हकदार होगी।

पीठ ने कहा कि असल पिता की संपत्ति पर वारिसाना हक का मामला जटिल पर्सनल लॉ से जुड़ा है जो या तो कानून या परंपरा से संचालित होता है। न्यायपालिका के लिए बलात्कार के नतीजे में पैदा हुई औलाद के लिए वारिसाना हक से संबंधित कोई सिद्धांत या नियम तय करना संभव नहीं होगा। न्यायालय का ऐसा कोई भी कदम कानूनी शक्ल पा जाएगा और उसे भविष्य में फैसलों के लिए उद्धृत किया जाएगा। लिहाजा ऐसा कुछ करना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह आदेश एक बलात्कार पीड़िता 13 साल की लड़की के बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी चाइल्ड वेलफेयर सोसाइटी को सौंपते हुए दिया। याची ने अदालत से अपने अच्छे भविष्य की व्यवस्था और बच्चे को गोद देने की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश देने का आग्रह किया था। याची का कहना है कि वह और उसका पिता नवजात बच्चे को अपने साथ रखने को तैयार नहीं हैं।

अदालत ने राज्य सरकार को बलात्कार पीड़िता को स्नातक तक मुफ्त शिक्षा दिलाने और पहले मिले तीन लाख रुपए के अलावा 10 लाख रुपए का अतिरिक्त मुआवजा देने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा कि इन रुपयों को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट किया जाए। लड़की जब 21 साल की हो जाएगी तब वह पूरी धनराशि की हकदार होगी। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए हैं कि राज्य सरकार बलात्कार पीड़िता की पढ़ाई पूरी होने के बाद उसे नौकरी भी देगी। न्यायालय ने बलात्कार पीड़िता के नवजात बच्चे की अस्पताल में समुचित देखभाल के निर्देश भी दिए हैं। चाइल्ड वेलफेयर सोसाइटी न्याय मित्र की निगरानी में उसे गोद देने की प्रक्रिया पूरी करेगी। गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली 13 साल की लड़की इस साल के शुरू में बलात्कार के कारण गर्भवती हो गई थी। परिजनों को सात महीने बाद इसका पता लगा था। तब तक सुरक्षित गर्भपात के लिए निर्धारित समय वक्त बीत चुका था।

फिर लड़की के परिजन गर्भपात की इजाजत देने के लिए अदालत गए। अदालत के निर्देश पर बनाए गए डाक्टरों के एक पैनल ने जांच कर बताया कि सात महीने के भ्रूण को गिराने से गर्भवती लड़की की मौत हो सकती है। बाद में उसने एक बच्ची को जन्म दिया था।

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