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…वरना दो हफ्ते में खारिज कर देंगे केस- अपने यहां दर्ज 750 मुकदमों पर चीफ जस्‍टिस का अल्‍टीमेटम

इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस वक्त सबसे ज्यादा 7,26,000 मामले लंबित हैं। इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट में 4 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं।

supreme courtसुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों पर जतायी नाराजगी। (file pic)

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ऐसे मामलों को लेकर नाराजगी जतायी है, जो छोटी गलतियों के कारण काफी समय से अदालत में लंबित पड़े हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के सामने ही ऐसे 750 केस लंबित हैं। मंगलवार को चीफ जस्टिस ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इन मामलों में अगले 2 हफ्ते में सुधार नहीं किया गया तो वह इन सभी मामलों को निरस्त कर देंगे। चीफ जस्टिस ने कहा कि ये मामले 2010,2011,2012 से लंबित चल रहे हैं। बता दें कि कई मामले ऐसे होते हैं, जिनमें छोटी-छोटी गलतियां होती हैं। जिनके नोटिस में आने पर अदालत इन गलतियों में सुधार करने के निर्देश देती है। इन गलतियों को सुधारने की एक तय प्रक्रिया है। लेकिन कई मामलों में पक्षों द्वारा इन गलतियों में सुधार ही नहीं किया जाता। जिसके चलते ये मामले लंबे समय से अदालतों में लंबित चल रहे हैं।

ऐसे लंबित मामलों को लेकर चीफ जस्टिस की नाराजगी को इस बात से समझा जा सकता है कि साल 2015 तक सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की अदालतों में 3 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं। पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने तो इसे लेकर गहरी चिंता जाहिर की थी और कहा था कि स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही है। बिजनेस टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन 3 करोड़ से ज्यादा लंबित मामलों में 2.84 करोड़ मामले अधीनस्थ अदालतों में, 43 लाख मामले विभिन्न हाईकोर्ट और करीब 60 हजार मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

लाइव मिंट की एक खबर के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस वक्त सबसे ज्यादा 7,26,000 मामले लंबित हैं। इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट में 4 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। खबर के अनुसार, विभिन्न हाईकोर्ट में जजों के कई पद खाली हैं। दिसंबर, 2018 में देशभर के हाईकोर्ट में जजों के 1079 पद भरने की स्वीकृति दी गई थी। लेकिन मौजूदा वक्त में तय सीमा के सिर्फ 37% पद ही भरे हैं, बाकी पदों पर अभी भी जजों की नियुक्ति की जानी है। ऐसे में अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के पीछे जजों की नियुक्ति ना होना भी एक बड़ा कारण है। वहीं अधीनस्थ अदालतों में स्थिति और भी खराब है। हालात ये हैं कि इन अदालतों में तो साल 1951 के मामले भी अभी तक लटके हुए हैं।

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