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बिहार चुनाव: वर्चुअल प्रचार समय की जरूरत, ऑनलाइन वोटिंंग पर विचार नहीं: मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त सुनील अरोड़ा

Chief Election Commissioner Sunil Arora Interview: कोरोना-काल में पहला बड़ा चुनाव कराने जा रहे भारत निर्वाचन आयोग के मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त सुनील अरोड़ा से जनसत्‍ता.कॉम ने कई सवाल किए। उन्‍होंने जो जवाब दिए, उसे यहां पेश किया जा रहा है।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा का कहना है कि वोटिंंग के किसी नए विकल्‍प पर अभी कोई विचार नहीं चल रहा है। (Photo By Narender)

Chief Election Commissioner Sunil Arora Interview: मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त सुनील अरोड़ा ने कहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव समय पर कराने के लिए निर्वाचन आयोग हर स्‍तर पर तैयारी कर रहा है। उन्‍होंने वर्चुअल चुनाव प्रचार को समय की जरूरत बताया, लेकिन ऑनलाइन या मोबाइल के जरिए वोटिंग के विकल्‍प पर अभी सोचने की बात से इनकार किया। ‘ई-मेल इंटरव्‍यू’ में अरोड़ा ने जनसत्‍ता.कॉम के कई सवालों केे जवाब दिए:

सवाल: अगर बिहार में समय पर चुनाव हुए तो निश्चित रूप से यह कोरोना काल में पहला और बड़ा चुनाव होगा। ऐसे में आयोग के सामने क्या चुनौतियां रहने वाली हैं और किस तरह इसके लिए तैयारी हो रही है?

जवाब: बिहार विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया 29.11.2020 तक पूरी करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग, बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और जिला स्तर पर आवश्यक तैयारियां चल रही हैं। वैश्विक महामारी के दौरान मतदाताओं और ड्यूटी पर तैनात मतदानकर्मियों की सुरक्षा के लिए निर्वाचन प्रक्रियाओं में जरूरी बदलाव किया जा रहा है, ताकि शारीरिक दूरी, सेनेटाइजेशन और मास्क/ग्लॅव्ज (gloves) आदि की पर्याप्‍त व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। कुछ कदम ये हैं:

(i) मतदान केंद्र (Polling Station) पर मतदाताओं की संख्‍या अधिकतम एक हजार (मौजूदा 1500 की सीमा के मुकाबले) तक सीमित की जाएगी। इसके लिए अतिरिक्त मतदान केंद्र बनाए जाएंगे। बिहार के लिए 33797 अतिरिक्त मतदान केंद्र बनाए जा रहे हैं। इसी हिसाब से सुरक्षा बलों, मतदान उपकरणों, मशीनरी और मतदानकर्मियों की व्यवस्था की जाएगी।

(ii) 80 वर्ष से ज्‍यादा उम्र के बुजुर्ग, दिव्यांग, अनिवार्य सेवाओं में ड्यूूटी दे रहे और कोरोना के चलते घर या अस्‍पताल में क्‍वांरटीन रहने वाले मतदाताओं को वैकल्पिक डाक मतपत्र की सुविधा दी जाएगी।

(iii) प्रचार में भी कोरोना से जुड़े सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना होगा और यह सुनिश्‍चित कराने की जिम्‍मेदारी राजनीतिक दलों, उम्‍मीदवारों और इससे संबंधित सभी पक्षों पर होगी।

(iv) चुनाव से जुड़े काम के लिए फील्‍ड में तैनात या आगे तैनात किए जाने वाले अफसरों को कोविड-19 से संबंधित सावधानियों के बारे में जागरूक बनाया जा रहा है। इस संबंध में प्रशिक्षण और जरूरी उपलब्‍धता सुनिश्‍चित कराने की तैयारियां कुछ हफ्तों से चल रही हैं।

कोविड-19 के मद्देनजर मतदाता दिशानिर्देशिका को भी अपडेट किया जा रहा है। इसमें कोरोना से जुड़े जरूरी दिशानिर्देशों को शामिल किया जाएगा। हर माध्‍यम से इन्‍हें मतदाताओं तक पहुंचाया जाएगा। डिजिटल माध्‍यमों के प्रयोग पर विशेष जोर रहेगा।

(v) चुनाव आयोग की संस्था भारतीय अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र और निर्वाचन प्रबंधन संस्थान (IIIDEM) ने बिहार में प्रमुख प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण दे दिया है। फिलहाल, राज्य में रिटर्निंग अधिकारियों के प्रशिक्षण का काम चल रहा है।

(vi) आयोग के निर्देशों का पालन हो, इसके लिए राजनीतिक दलों से संपर्क भी जारी है। सीईओ, बिहार ने 26 जून को सभी संबंधित मान्यता प्राप्त राजनितिक दलों के साथ बैठक की है।

(vii) वोटर लिस्‍ट अपडेट करने का काम भी चल रहा है।

सवाल: कोरोना के चलते जो चुनौतियां आई हैं, उनके मद्देेनजर क्या आयोग को लगता है कि अब ऑनलाइन वोटिंग या मोबाइल से वोटिंग जैसे तरीकों पर बात करने का वक़्त आ गया है?

जवाब: आयोग ने ऑनलाइन मतदान के विकल्प पर विचार नहीं किया है। कोविड-19 के चलते पेश आईं चुनौतियों के मद्देनजर चुनाव का प्रचार-प्रसार भी आसान नहीं होगा। आयोग इस बारे में राष्ट्रीय और संबंधित राज्य स्‍तरीय मान्यता प्राप्त दलों की भी राय ले रहा है।

सवाल: वर्चुअल रैलियों पर चुनाव आयोग का क्या रुख है? क्या इसके जरिये प्रत्येक उम्मीदवार प्रत्येक वोटर तक पहुँच सकता है?

जवाब: इस संबंध मेंं आयोग ने 17 जुलाई को सभी मान्यताप्राप्त राष्ट्रीय और राज्यस्‍तरीय राजनीतिक दलों को 31 जुलाई तक अपनी राय भेजने के लिए लिखा है। सीईओ, बिहार ने जन प्रचार के संबंध में अनेक राजनीतिक दलों के विचार भेजे हैं। इन पर मंथन चल रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कोई भी कर सकता है। स्वास्थ्य संबंधी सरोकारों को देखते हुए वर्चुअल चुनाव प्रचार भी समय की जरूरत बन सकता है।

सवाल: पेड न्‍यूज, सोशल मीडिया का दुरुपयोग और इसके जरिए भ्रामक प्रचार जैसी समस्याओं से निपटने का क्‍या प्‍लान है?

जवाब: जहां तक पेड न्‍यूज का प्रश्न है, सभी राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी, जिला व राज्य स्तर पर MCMC (मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी) का गठन करते हैं। यह समिति मीडिया में चलने वाली ख़बरों पर नज़र रखती है। अगर इसे लगता है कि कोई खबर ‘पेड न्‍यूज’ है तो समिति उसका ब्यौरा निर्वाचन अधिकारी को देती है। इसके बाद नियमित प्रक्रिया के तहत सम्बंधित प्रत्याशी को इसके बारे में नोटिस भेजा जाता है। यदि इस खबर को ‘पेड न्‍यूज’ की श्रेणी में माना जाता है, तो इसका खर्चा, सम्बंधित प्रत्याशी के चुनाव खर्च में जोड़ा जाता है |

सोशल मीडिया पर चुनाव प्रचार से जुड़े मुद्दों की गंभीरता को समझते हुए कई कदम उठाए हैं। कुछ प्रमुख कदम ये हैंं-

– सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म / इंटरनेट वेबसाइट्स को इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया मानते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13.04.2004 को दिए गए आदेश के दायरे मेें लाया गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह इन प्लैटफार्म पर भी सभी राजनीतिक विज्ञापनों के लिए MCMC से मंजूरी अनिवार्य कर दिया गया है।

– सोशल मीडिया पर राजनीतिक उम्मीदवारों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए, नामांकन दाखिल करने के समय उम्मीदवारों को अपने सोशल मीडिया खातों के बारे में जानकारी देनी होती है।

– सोशल मीडिया, वेबसाइट आदि डिजिटल माध्यम से चुनाव प्रचार पर किए गए खर्च को भी उम्मीदवार के चुनाव खर्च में शामिल किया जाता है। इसमें अन्य बातों के अलावा, इंटरनेट कंपनियों को किया गया भुगतान और प्रचार अभियान से संबंधित सोशल मीडिया एकाउंट्स चलाने पर हुआ खर्च भी शामिल है।

– आदर्श आचार संहिता के प्रावधान उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा सोशल मीडिया/इंटरनेट पर पोस्ट की जा रही सामग्री पर भी लागू होते हैं।

2019 के लोकसभा चुनाव के वक्‍त प्रमुख सोशल मीडिया प्लैटफार्म द्वारा स्वैच्छिक आचार संहिता (Voluntary Code of Ethics) भी लागू की गई थी। यह भी एक अहम पहल है।

सवाल: जाति, धर्म से जुड़े और भड़काऊ बयान प्रचार का हिस्सा ना बने, इसके लिए इस बार आयोग क्या सोच रहा है? क्या आपको लगता है कि यह सुनिश्चित करने के लिए आयोग को और अधिकार की जरूरत है या किसी मौजूदा नियम में बदलाव किए जाने की जरूरत है?

जवाब: 1960 के दशक में आदर्श आचार संहिता को लेकर चर्चा शुरू हुई और 1968 में यह मूूर्त रूप मेंं आई। आदर्श आचार संहिता के तहत किसी भी उम्मीदवार से यह अपेक्षा की जाती है कि जाति, धर्म और भड़काऊ बयानों को प्रचार का हिस्सा न बनाएं। इस पर अमल के लिए आयोग समय-समय पर कार्रवाई भी करता है। यहां तक कि स्टार प्रचारकों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।

हमारे संविधान में हमें स्‍वतंत्र व निष्‍पक्ष चुनाव सुनिश्‍चित कराने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। मौजूदा प्रावधानों के तहत हमें पर्याप्‍त शक्‍तियां मिली हुई हैं और आयोग इस ताकत का सही इस्‍तेमाल भी करता रहा है।

सवाल: क्या चुनाव नतीजे घोषित हो जाने के बाद जनादेश का सम्मान हो, यह सुनिश्चित कराना भी चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी के दायरे में आना चाहिए? आपकी निजी राय इस पर?

जवाब: यह सवाल चुनाव आयोग से सम्बंधित नहीं है। आयोग की सम्मिलित यही राय रही है कि इस विषय को आयोग के दायरे में लाना भी नहीं चाहिये।

सवाल: चुनाव खर्च सरकार दे ( State Funding of Elections) और पूरे देश में एक बार ही चुनाव हो (Simultaneous Polls या One Nation, One Poll) जैसे मुद्दों पर आयोग का क्‍या रुख है?

जवाब: चुनाव में अमूमन दो प्रकार के खर्च होते हैं-

(1) प्रक्रिया संबंधी- इसमें चुनाव संपन्‍न कराने की प्रक्रिया, सुरक्षा इंतजाम, ईवीएम से जुड़ा खर्च आदि आते हैं। लोकसभा चुनाव में केंद्र और विधानसभा चुनाव में संबंधित राज्‍य सरकार यह पूरा खर्च उठाती है। एक साथ होने वाले दोनों चुनाव में केंद्र और राज्य सरकारें आधा-आधा खर्च उठाती हैं।

(2) प्रचार संबंधी- प्रत्येक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को प्रचार हेतु सरकारी मीडिया में मुफ्त एयर टाइम दिया जाता है। State Funding व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता है।

जहां तक एक साथ चुनाव करानेे का प्रश्‍न है, देश में चार आम चुनाव ऐसे हुए। फिर कतिपय कारणों से यह तालमेल नहीं रहा। इसे लागू करने के लिए कानून बनाना होगा, राजनीतिक सहमति की जरूरत होगी।

सवाल: चुनाव सुधारों की बात आती है तो ये दो बड़ी बातें भी आती हैं- निर्वाचन रद्द कराने का विकल्‍प (Right to Recall) जनता को मिले और सर्वाधिक मत को विजय का आधार मानने के बजाय, न्‍यूनतम मतदान प्रतिशत अनिवार्य बनाया जाए। क्या आयोग के स्तर पर इन पर कुछ पहल हुई है? आयोग का इस पर क्या रुख है?

जवाब: फिलहाल इन दो पहलुओं पर चर्चा नहीं हुई है। ये दोनों विषय संसद के कार्यक्षेत्र में हैं। अतः इन पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

सवाल: आप Association of World Election Bodies (A-WEB) के प्रमुख हैं। हमें बाकी देशों के कुछ उन चुनाव व्यवस्थाओं या प्रावधानों को बताएं, जिनसे आप प्रभावित हुए हों?

जवाब: भारत साल 2021 तक Association of World Election Bodies (A-WEB) का अध्यक्ष है। यह अनुभव बांटने के लिए एक मंच है और एक-दूसरे से सीखने का अवसर भी देता है। कोविड महामारी के चलते डोमिनिकन रिपब्लिक, श्रीलंका आदि पचास से अधिक देशों ने अपने यहां चुनाव स्थगित करने का निर्णय लिया। दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, क्रोएशिया, मंगोलिया आदि कई देशों ने कोरोना-काल होते हुए भी चुनाव करवाए। हम इन गतिविधियों पर नजर रखे हुुुए हए हैं और जो सीख अपने यहां अमल में ला सकते हैं, उस पर भी विचार करते हैं।

भारत में भी हमने Covid महामारी की चुनौती के बीच राज्य सभा चुनाव करवाए। जिन देशों में इस दौरान चनाव हुुए, उन सभी देशों में मतदाताओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई थी। यही वजह है कि निर्वाचन प्रक्रियाओं और निर्वाचन परिपाटियों में बदलाव करना जरूरी हो गया है।

हमें यह भी याद रखना होगा कि प्रत्येक देश की निर्वाचन प्रणाली अलग होती है। अन्य देशों से हम जो कुछ भी सीखते हैं, उसके बारे में हमें यह देखना होगा कि अपने देश के माहौल में उसकी उपयोगिता कितनी है? दक्षिण कोरिया में 14,330 मतदान केंद्रों पर चुनाव हुए, जबकि हमारे यहां बिहार में ही एक लाख छः हज़ार से ज्यादा मतदान केंद्र बन रहे हैं।

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