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छत्तीसगढ़ में अपने लिए ही ‘काल’ बन रही Congress? UPA काल में आए NIA कानून के खिलाफ बघेल सरकार ने खटखटाया SC का दरवाजा

छत्तीसगढ़ सरकार ने अनुच्छेद 131 के तहत यह वाद दायर किया है। अनुच्छेद 131 के अंतर्गत केन्द्र के साथ विवाद के मामले में राज्य सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है।

Author नई दिल्ली | Updated: January 16, 2020 8:44 AM
छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल।

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार अपने लिए ही काल बनती हुए नजर आ रही है। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार ने बुधवार (15 जनवरी, 2020) को उच्चतम न्यायालय (SC) में एक वाद पेश कर UPA सरकार के कार्यकाल में बनाए गए राष्ट्रीय जांच एजेंसी कानून, 2008 को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध किया है। राज्य सरकार का दावा है कि इस कानून से राज्य की प्रधानता प्रभावित होती है और यह केन्द्र को निर्बाध अधिकार प्रदान करता है। डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले की घटना के बाद यह कानून बनाया था और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम उस समय देश के गृह मंत्री थे। यह कानून राष्ट्रीय जांच एजेंसी को राज्य से किसी स्पष्ट अनुमति के बगैर ही देश के किसी भी हिस्से में आतंकी हमले की जांच का समवर्ती अधिकार प्रदान करता है। एनआईए पिछले एक दशक से इस तरह के सभी मामलों की जांच कर रहा है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने अनुच्छेद 131 के तहत यह वाद दायर किया है। अनुच्छेद 131 के अंतर्गत केन्द्र के साथ विवाद के मामले में राज्य सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है। राष्ट्रीय जांच एजेन्सी कानून को चुनौती देने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है। केरल सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत नागरिकता संशोधन कानून, 2019 को चुनौती दिए जाने के एक दिन बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने इसी अनुच्छेद के तहत एनआईए कानून को चुनौती दी है। एनआईए कानून के खिलाफ इस तरह की याचिका दायर करना महत्वपूर्ण है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस के भूपेश बघेल की सरकार ने दलील दी कि राज्य की सूची में शामिल अपराधों की जांच का काम पुलिस का है।

राज्य सरकार का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने संसद द्वारा पारित उस कानून को चुनौती दी है जब केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी। राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि राष्ट्रीय जांच एजेन्सी कानून संविधान के अनुरूप नहीं है और यह संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर है क्योंकि यह कानून राज्य पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच के लिए केन्द्र को एक जांच एजेन्सी के सृजन का अधिकार देता है जबकि यह संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य का विषय है।

राज्य सरकार द्वारा अधिवक्ता सुमेर सोढी के माध्यम से दायर इस वाद को वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तंखा ने अंतिम रूप दिया है। इस वाद में कहा गया है कि मौजूदा स्वरूप में एनआईए कानून न सिर्फ पुलिस के माध्यम से जांच कराने का (राज्य) अधिकार छीनता है बल्कि यह केन्द्र को ‘निरंकुश, स्वंय निर्णय लेने का मनमाना अधिकार देता है। याचिका में कहा गया है कि इन अधिकारों के इस्तेमाल के बारे में कोई नियम नहीं है जिसकी वजह से केन्द्र को किसी भी समय कोई कारण बताये बगैर ही इसके अधिकारों के इस्तेमाल की छूट प्रदान करता है।

राज्य सरकार का कहना है कि एनआईए कानून के प्रावधानों में तालमेल के लिये अथवा केन्द्र द्वारा राज्य सरकार से किसी भी प्रकार की सहमति लेने के बारे में कोई व्यवस्था नहीं है जो निश्चित ही संविधान में परिकल्पित राज्य की प्रधानता के विचार के खिलाफ है। इसमें कहा गया है कि एनआईए कानून इस तरह का है कि एक बार यह प्रभावी हो जाने पर यह उन अपराधों की जांच करने के वादी के अधिकार को पूरी तरह अपने पास ले लेता है जिन्हें एनआईए कानून के तहत अपराधों की श्रेणी में रखा गया है और जो राज्य के अधिकार क्षेत्र में हुए हैं।

वाद में यह भी कहा गया है कि पुलिस संविधान में राज्य की सूची के विषयों की सूची-कक का मामला है और यह केन्द्र के मामलों से संबंधित सूची-क का विषय नहीं है। इसमे कहा गया है कि राष्ट्रीय जांच एजेन्सी कानून संविधान के अनुरूप नहीं है और यह संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र से बाहर है, इसलिए यह संविधान के अधिकार से परे है।

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