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छत्तीसगढ़ नसबंदी मामला: ‘भेड़-बकरियों की तरह ढकेलते हुए ले गए उन्हें’

आशुतोष भारद्वाज बिलासपुर। बिलासपुर में नसबंदी शिविर से कुछ दिन पहले नेम बाई ने एक बच्चे को जन्म दिया था। उसका परिवार नहीं चाहता था कि वह ऑपरेशन कराए। लेकिन स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के दबाव के आगे वह मजबूर हो गई और ऑपरेशन के बाद अब वह इस दुनिया में नहीं है। चंदाकली पुणे में […]

Author November 12, 2014 8:48 AM
डॉक्टरी लापरवाही की शिकार बनी महिलाओं के परिजनों ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में साफ तौर पर कहा कि स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों ने शिविर में जाने के लिए महिलाओं को किया बाध्य (एक्सप्रेस फोटो)

आशुतोष भारद्वाज

बिलासपुर। बिलासपुर में नसबंदी शिविर से कुछ दिन पहले नेम बाई ने एक बच्चे को जन्म दिया था। उसका परिवार नहीं चाहता था कि वह ऑपरेशन कराए। लेकिन स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता के दबाव के आगे वह मजबूर हो गई और ऑपरेशन के बाद अब वह इस दुनिया में नहीं है।

चंदाकली पुणे में अपमे पति के साथ मजूरी करती थी। वह यहां अपने घर आई थी। घर वाले नहीं चाहते थे कि वह नसबंदी कराए। लेकिन बाद में वे राजी हो गए। ये दोनों उन ग्यारह बदनसीब महिलाओं में हैं, जिनकी नसबंदी ऑपरेशन के कारण अब तक मौत हो चुकी है। हालांकि वे कभी नहीं चाहती थीं कि वे यह ऑपरेशन कराएं। इनके अलावा कई अन्य महिलाएं, जो चिकित्सकीय लिहाज से ऑपरेशन के लायक नहीं थीं, अब भी मौत और जिंदगी के बीच झूल रही हैं। इस समय पचास महिलाएं ऑपरेशन के कारण अस्पताल में दाखिल हैं।

मंगलवार को चंदाकली की बेटियां सत्यवती और सरस्वती छत्तीसगढ़ के अस्पताल के शवगृह के बाहर बैठी अपनी मां की पार्थिव देह का इंतजार कर रही थीं। चंदाकली का पति पुणे से चल पड़ा था।

हालांकि छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल ने इस बात से इनकार किया कि नसबंदी ऑपरेशन के लिए इन महिलाओं को प्रलोभन दिया गया। लेकिन डॉक्टरी लापरवाही की शिकार बनी महिलाओं के परिजनों ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में साफ तौर पर कहा कि स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों ने शिविर में जाने के लिए महिलाओं को बाध्य किया। हर महिला को नसबंदी के लिए 600 रुपए दिए जाने थे। स्वास्थ्य कर्मी को प्रति महिला के हिसाब के हिसाब से डेढ़ सौ रुपए मिलते हैं। सर्जन को 75 रुपए और एनस्थीसिया देने वाले को प्रति ऑपरेशन 25 रुपए मिलते हैं। अगर कोई एनस्थीसिया वाला नहीं आता तो पूरा पैसा सर्जन की जेब में जाता है।

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नेम बाई के देवर महेश सूर्यवंशी ने बताया कि उसे बिना हमसे पूछे ले गए। हमने बार-बार कहा कि उसने हाल में बच्चे को जन्म दिया है। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं सुनी। बोले-कुछ नहीं होगा। छोटा-सा ऑपरेशन है। भेड़-बकरियों की तरह ढकेलते हुए उन्हें ले गए।

नेम बाई का परिवार बिलासपुर के भराड़ी गांव में रहता है। महेश ने बताया कि जिस समय वे लोग उसे ले गए, उसकी तबीयत ठीक नहीं थी। जब वह लौटी तो उसकी हालत और बिगड़ चुकी थी।

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लोगों ने बताया कि आॅपरेशन के लिए जिन महिलाओं को ले जाया गया, उनमें से कई की सेहत ठीक नहीं थी। कुछ को शुगर की बीमारी थी। कुछ को दमा था और कुछ दिल की मरीज थीं। चिकित्सा के किसी कायदे या मापदंड का पालन नहीं किया गया।

हालांकि अभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है और मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी मौतों का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है। उनका कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति साफ हो पाएगी। लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि पहली नजर में लगता है कि ये महिलाएं शारीरिक कमजोरी के कारण नसबंदी के लायक नहीं थीं और ऑपरेशन के बाद उनकी चिकित्सकीय देखभाल ठीक से नहीं हो पाई।

 

 

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