छत्तीसगढ़ के स्कूलों में ‘गायत्री मंत्र’ के खिलाफ दायर याचिका को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य द्वारा सहायता प्राप्त स्कूलों में हिंदू भजनों के पाठ को अनिवार्य बनाने से सरकार को रोकने के आदेश की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि सरकारी आदेश अनिवार्य नहीं है और संवैधानिक प्रावधान किसी भी सांप्रदायिक सिद्धांतों से अलग नैतिक शिक्षा पर प्रतिबंध नहीं लगाते हैं। यह याचिका राज्य शिक्षा विभाग द्वारा सुबह की सभाओं में ‘गायत्री मंत्र’ और अन्य हिंदू प्रार्थनाओं को अनिवार्य बनाने के बाद दायर की गई जिसे विपक्ष ने शिक्षा का भगवाकरण करार दिया है।

राज्य सरकार के वकील ने याचिका को राजनीति से प्रेरित बताया

राज्य के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बताया। राज्य सरकार के वकील ने कहा कि आदेश में न तो धार्मिक शिक्षा शामिल है और न ही धर्मांतरण और यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (NEP 2020) के पूरी तरह अनुरूप है।” राज्य सरकार ने कहा, “सरकारी आदेश में इस्तेमाल ‘अनिवार्य’ और ‘सुनिश्चित करना’ शब्द पूरी तरह से विद्यालय के आंतरिक प्रशासन और अनुशासन से संबंधित हैं और इनमें किसी भी प्रकार का धार्मिक दबाव शामिल नहीं है।”

श्लोकों का पाठ न करने पर सजा नहीं

छत्तीसगढ़ सरकार ने आगे कहा, “सुबह की दिनचर्या का एकमात्र उद्देश्य छात्रों में एकता और एकाग्रता को बढ़ावा देना है। आदेश में ऐसे किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंड या अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं है जो इन श्लोकों का पाठ न करने का विकल्प चुनता है।” राज्य ने तर्क दिया कि पारंपरिक श्लोक प्राचीन भारतीय दर्शन हैं जो सार्वभौमिक कल्याण, पारिस्थितिक संतुलन और कृतज्ञता को बढ़ावा देते हैं। सरकार ने कहा कि इनमें से किसी भी आह्वान में कोई धार्मिक हठधर्मिता, सांप्रदायिक प्रचार या सांप्रदायिक अनुष्ठान शामिल नहीं है।

पिछले गुरुवार को दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने याचिका को खारिज कर दिया। ऐसा करते हुए न्यायाधीश ने कहा, “12.6.2026 के विवादित आदेश का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने पर पता चलता है कि इसमें ऐसा कोई अनिवार्य या बाध्यकारी निर्देश नहीं है जो छात्रों को उनके धार्मिक विश्वासों, अंतरात्मा या आस्था के विपरीत कार्य करने के लिए बाध्य करता हो। विवादित आदेश से ऐसा कुछ प्रकट नहीं होता है जो छात्रों को किसी ऐसी गतिविधि में भाग लेने के लिए बाध्य करता हो जो उनकी संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करती हो।”

न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या किसी व्यक्ति को हानि पहुंचाने के लिए कोई भी रिकॉर्ड पेश करने में विफल रहे हैं।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा कि बाल विवाह पर प्रतिबंध सभी धर्मों पर लागू होता है। उच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ सहित कोई भी व्यक्तिगत कानून, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 द्वारा लाए गए बाल विवाह पर प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं कर सकता है। खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें