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छत्तीसगढ़ एनकाउंटर: जुडिशल पैनल की जांच में सुरक्षाबलों पर लगा दाग, गांववालों के माओवादी होने के भी नहीं मिले सबूत

सारकेगुडा एनकाउंटर की जांच के लिए एक सदस्यीय ज्यूडिशियल कमीशन बनाया गया था। इस कमीशन की अध्यक्षता मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस वीके अग्रवाल ने की।

Author नई दिल्ली | December 1, 2019 9:36 AM
chhattisgarhसारकेगुडा एनकाउंटर में 17 लोगों की मौत हुई थी। (फाइल फोटो)

जून 2012 में छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले हुए चर्चित सारकेगुडा एनकाउंटर की रिपोर्ट सामने आयी है। सारकेगुडा एनकाउंटर में सुरक्षाबलों के जवानों के साथ हुई मुठभेड़ में 17 स्थानीय लोग मारे गए थे। मारे गए लोगों में 6 बालिग भी थे। रिपोर्ट के अनुसार, गांव वालों द्वारा कोई भी फायरिंग नहीं की गई थी। इसके साथ ही इस बात के भी सबूत नहीं मिले हैं कि वो लोग माओवादी थे। रिपोर्ट के अनुसार, गांव वालों को प्रताड़ित किया गया और फिर बाद में उन्हें मार दिया गया। रिपोर्ट में बताया गया है कि सुरक्षाबलों ने शायद घबराकर फायरिंग कर दी थी, वहीं एक पीड़ित को सुबह के वक्त गोली मारी गई।

सारकेगुडा एनकाउंटर की जांच के लिए एक सदस्यीय ज्यूडिशियल कमीशन बनाया गया था। इस कमीशन की अध्यक्षता मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस वीके अग्रवाल ने की। कमीशन ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी है। संडे एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को रिव्यू किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षाबलों के जो 6 जवान इस एनकाउंटर के दौरान घायल हुए, वो संभवतः साथी जवानों द्वारा की गई क्रॉस फायरिंग में घायल हुए हैं।

गौरतलब है कि रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि ‘गांव वालों का दावा था कि वह एक त्योहार पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए थे, यह भी काफी संदेहास्पद है।’ बता दें कि 28 जून, 2012 की रात को सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस की टीम को सिलगर में माओवादियों के होने की सूचना मिली थी। जिस पर सुरक्षाबलों ने माओवादियों की गिरफ्तारी के लिए ऑपरेशन चलाया। इनमें से दो टीम बासेगुडा से चलकर सारकेगुडा पहुंची। गांव से 3 किलोमीटर दूर गांववाले एक मीटिंग कर रहे थे।

रिपोर्ट में कहा गया कि गांव वालों ने फायरिंग की, जिस पर सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फायरिंग की। वहीं गांववालों का कहना है कि वह ‘बीज पंडुम’ त्योहार पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए थे। इसी दौरान सुरक्षाबलों ने उन्हें घेरकर फायरिंग कर दी, जिसमें 17 लोगों की जान चली गई।

11 जुलाई, 2012 को तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने इस घटना के न्यायिक जांच के आदेश दिए थे। छत्तीसगढ़ सरकार के एक अधिकारी ने बताया कि अब रिपोर्ट आने के बाद इस रिपोर्ट को कैबिनेट में रखा जाएगा, जहां से मंजूरी मिलने के बाद इसे विधानसभा में पेश किया जाएगा।

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