कांग्रेस हाई कमान के द्वारा अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने के फैसले के विरोध में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने मोर्चा खोल दिया है। चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों की मांग है कि उनके नेता को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी जानी चाहिए।

कांग्रेस हाई कमान पंजाब में चल रही इस गुटबाजी को शांत करने में जुटा है लेकिन ऐसा नहीं है कि पंजाब कांग्रेस में पहली बार गुटबाजी हुई है।

पंजाब कांग्रेस गुटबाजी से जूझती रही है।

अमरिंदर सिंह बनाम राजिंदर कौर भट्ठल

शुरुआत करते हैं साल 2002 से। 2002 से 2007 तक जब अमरिंदर सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे, तब वरिष्ठ नेता और पंजाब की पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्ठल के साथ उनकी सियासी लड़ाई पंजाब के अखबारों में लगातार छपती रहती थी। उस वक्त हालात इतने खराब हो गए थे कि साल 2005 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री के पद से हटाने की मांग को लेकर राजिंदर कौर भट्ठल ने दिल्ली में डेरा डाल दिया था।

भट्ठल लगभग एक महीने से भी ज्यादा वक्त तक अपने समर्थकों के साथ दिल्ली में डटी रही थीं। यह लड़ाई तब थोड़ा सा रुकी जब, कांग्रेस हाईकमान ने भट्ठल को उपमुख्यमंत्री बनाया। उस दौरान और उसके बाद भी कैप्टन अमरिंदर सिंह और भट्ठल के बीच कई बार तीखी बहस हुई। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ और 2007 में अकाली दल पंजाब की सत्ता में आ गया।

अमरिंदर सिंह बनाम प्रताप सिंह बाजवा

इसके बाद साल 2015 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उस वक्त प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा के खिलाफ सियासी जंग छेड़ दी थी। अमरिंदर सिंह की मांग थी कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए। अमरिंदर सिंह के जोरदार विरोध के बाद पार्टी को बाजवा को हटाना पड़ा।

हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष के पद पर अमरिंदर सिंह की ताजपोशी की और इस कदम का फायदा कांग्रेस को मिला। कांग्रेस ने 2017 में पंजाब में एक बार फिर अपनी सरकार बनाई।

अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू की भिडंत

अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए उस वक्त प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू उनके खिलाफ खड़े हो गए थे। नवजोत सिंह सिद्धू आए दिन अमरिंदर सिंह की सरकार को कटघरे में खड़ा करते थे। इस वजह से कांग्रेस की न सिर्फ राज्य में बल्कि इससे बाहर भी काफी फजीहत हो रही थी क्योंकि अमरिंदर सिंह जैसे अनुभवी नेता को बीजेपी से पार्टी में आए नवजोत सिंह सिद्धू लगातार ललकार रहे थे।

सिद्धू की बगावत को देखते हुए कांग्रेस हाई कमान ने 2022 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही अमरिंदर सिंह को हटा दिया और चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। नवजोत सिंह सिद्धू यहीं नहीं रुके और उन्होंने चरणजीत सिंह चन्नी की भी घेराबंदी शुरू कर दी। 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान नवजोत सिंह सिद्धू खुद को सीएम के चेहरे के तौर पर पेश करते रहे।

संगठन और सरकार की इस लड़ाई का सीधा खामियाजा कांग्रेस ने भुगता और उसे 2022 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 18 सीटें ही मिली। 2022 की करारी हार के बाद कांग्रेस की केंद्रीय लीडरशिप ने पंजाब में युवा चेहरे अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाया लेकिन पिछले लगभग डेढ़ साल से चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थक राजा वड़िंग को हटाने की मांग उठा रहे हैं।

चन्नी के समर्थकों का कहना है कि राजा वड़िंग के नेतृत्व में 2027 में राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकती और इसलिए चन्नी को या तो प्रदेश कांग्रेस का प्रधान बनाया जाना चाहिए या फिर मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाना चाहिए।

इस तरह अगर आप देखें तो पिछले 20 सालों से ज्यादा वक्त से पंजाब में कांग्रेस के सियासी क्षत्रप आपस में लड़ते-भिड़ते रहे हैं और इसका सीधे तौर पर राजनीतिक नुकसान कांग्रेस को हुआ है। अब जब विधानसभा के चुनाव बिल्कुल नजदीक आ गए हैं तो चरणजीत सिंह चन्नी और राजा वड़िंग आमने-सामने हैं।

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए इस लड़ाई को रोकना बहुत जरूरी है। कांग्रेस को अगर आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर करना है तो उसे दिखाना होगा कि पार्टी के नेता पूरी तरह एकजुट हैं और तभी वह राज्य की सत्ता में वापसी का सपना देख सकती है।

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पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नजर अंदाज किए जाने पर कांग्रेस हाई कमान के प्रति अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की है। चन्नी के समर्थकों ने साफ कर दिया है कि वे अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को राज्य इकाई का प्रमुख बनाए रखने के फैसले से नाखुश हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।