घातक होता है दोहरा रवैया

अक्सर हम दूसरों के बारे में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी रखते हैं। दूसरे व्यक्ति में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी एक ओर हमारा सुख-चैन छीन लेती है तो दूसरी ओर हमारी प्रवृत्ति की गंभीरता को भी कम करती है।

behavior
सांकेतिक फोटो।

अक्सर हम दूसरों के बारे में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी रखते हैं। दूसरे व्यक्ति में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी एक ओर हमारा सुख-चैन छीन लेती है तो दूसरी ओर हमारी प्रवृत्ति की गंभीरता को भी कम करती है। इस तरह हम एक ऐसी राह पर आगे बढ़ने लगते हैं जहां हर तरफ खुराफात की बेल उगी होती है। हम खुराफात की बेल को हरियाली मानकर प्रसन्न होते रहते हैं लेकिन यह झूठी हरियाली हमारे जीवन में कांटे बो देती है। इस माहौल में कई बार दूसरों के बारे में अनाप-शनाप बातें उड़ाने में हमें मजा आने लगता है। जब हम दूसरों की जगह स्वयं को रखकर देखते हैं तो हमारा पैमाना बदल जाता है।

एक पुरानी घटना याद आ रही है। एक व्यक्ति कई बार वह महिलाओं के संबंध में बहुत हल्की और अशोभनीय टिप्पणियां भी कर देता था। कुछ समय बाद जब उसके यहां एक कन्या ने जन्म लिया तो उसकी मानसिकता बदल गई और वह महिलाओं को सम्मान देने लगा। हम दूसरों पर अशोभनीय टिप्पणियां करने में एक पल भी नहीं लगाते हैं लेकिन जब मामला स्वयं से जुड़ा हो तो हमारा रवैया बदल जाता है। हमारे रवैये में यह बदलाव प्रदर्शित करता है कि समय आने पर इंसान अपने स्वार्थ के लिए अपने विचार भी बदल सकता है।

विचारों में बदलाव इंसान के उस मूल चरित्र की तरफ भी संकेत करता है जो निरन्तर ढुलमुल व्यवहार करता रहता है। दरअसल हममे से ज्यादातर लोगों का व्यक्तित्व दोहरा होता है। दोहरा व्यक्तित्व हर जगह अपना सामंजस्य बैठाने की कोशिश करता रहता है। सामंजस्य बैठाने की इस प्रक्रिया में हम अपना सम्मान और भरोसा दोनों खो देते हैं। इस दोहरे व्यक्तित्व के कारण हमारा व्यवहार भी पाखंड से भरा होता है। हमारा व्यवहार पाखंड से भरा जरूर होता है लेकिन हम स्वयं को ईमानदार दिखाने की भरपूर कोशिश करते हैं।

दरअसल जब हम अपने व्यक्तित्व को इस तरह प्रदर्शित करते हैं जो हम वास्तव में होते नहीं हैं तो स्थिति और दयनीय हो जाती है। हम पूरी जिंदगी अपने वास्तविक व्यक्तित्व पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहते रहते हैं। अपने व्यक्तित्व पर पर्दा डालने की यह कोशिश हमें स्वयं से ही दूर कर देती है। जब हम स्वयं से ही दूर हो जाते हैं तो हम दोगुनी ऊर्जा के साथ अपने वास्तविक व्यक्तित्व पर आवरण चढ़ाने की कोशिश करते है। आवरण चढ़ाने की कोशिश यह सिद्ध करती है कि हमें अपने व्यक्तित्व पर भरोसा नहीं है। दोहरा व्यक्तित्व हमारी जिंदगी को भी दोहरी बना देता है। ऐसी स्थिति में हम दो नावों पर सवारी कर रहे होते हैं। एक नाव आदर्शवादी व्यवहार की होती है और दूसरी नाव पाखंड से भरे व्यवहार की।

जिंदगी के इस सफर में हम अपनी सुविधानुसार पाला बदलते रहते हैं। दो नावों पर सवार होने के कारण ही हम समाज में अपना भरोसा स्थापित नहीं कर पाते हैं। आज समाज में भरोसे की जितनी कमी महसूस की जा रही है, उतनी पहले कभी महसूस नहीं की गई। हमारे समाज में विभिन्न तरह की समस्याएं इसलिए बढ़ती जा रही हैं क्योंकि हमारा पाखंड में रचा पगा व्यवहार हमारे आदर्शवादी व्यवहार पर भारी पड़ता है। हम आदर्शवादी रूप से बहुत कुछ अच्छा सोचते हैं लेकिन जब वास्तविक जिंदगी में इस सोच को आगे बढ़ाने की बात आती है तो हम हथियार डाल देते हैं। ऐसा करते ही हम कमजोर साबित हो जाते हैं।

जब हमारे कमजोर दिमाग को हमारा ही स्वार्थ अपने शिकंजे में ले लेता है तो हमारा व्यवहार भी स्वार्थ साधने में लग जाता है। हालांकि हमारा दिमाग स्वयं को कमजोर नहीं बल्कि चालाक मानता है। लेकिन जब यह चालाकी पकड़ में आ जाती है तो अन्तत: हम कमजोर ही सिद्ध होते हैं। दरअसल हमारा दोहरा रवैया एक तरह से हमारी कमजोरी को ही प्रदर्शित करता है। इसलिए अपनी जिंदगी को मजबूत बनाने के लिए हमें अपना दोहरा रवैया समाप्त करना होगा। हो सकता है कि इस प्रक्रिया में हमें कुछ हानि भी उठानी पड़े। लेकिन इस अल्पकालिक हानि से हम दीर्घकालिक लाभ कमा सकते हैं। दोहरे रवैये के कारण समाज में नहीं बल्कि परिवार में भी हमारे अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराते रहते हैं। जब हमारे अस्तित्व को ही गंभीरता के साथ न देखा जाए तो जिंदगी के लिए हमारी सारी भागदौड़ और प्रयास बेमानी साबित हो जाते हैं।

पढें राष्ट्रीय समाचार (National News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट